सत्कथाओं के मूल स्रोत और संतों के परम ध्येय-कविता-Satkatha Ank-1

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सत्कथाओंके मूल स्रोत और संताक परम ध्येय
(नवनियुञ्जमें न्यामा व्याम)-
1
रजनिधान पावन इंद्रावन रवि तनया तर सोहै.
नित नूनन निज मुन्न नुपमा नौ नुर-नर-मुनि-मन मेहै ।
सेष सारदा ह 4 जाकी सोभा बरनि न जाई,
सह पावल वसंत पानिक शूनु संनत हैं लुभाई।
2
जहाँ बेलि-जून-नन-समूह के संन मान्छ-सुन्ध बारें,
विलित कुटुन सरिस नैनन सौ स्यामा स्याम निहारें ।
था श्रृंत्रायन बीत्र नंशु इक नबन्द्र निकुंज बिराजै,
जामी स्याममयी सुपमा लखि नंदन कोटिक लाजे ।
3
मध्य मनोहर वा निकुंज के एक कदव सुहावै,
निज अनुपम अनल्प महिमा सौ पादप कल्प लजावै ।
डाल-डाल अरु सघन पात विच कुसुमित कुसुम घनेरे,
कै सुरराज जुगल छवि हेरत सहस नैन करि नेरे ॥
4
नीचे वा कदंव तरुवर के कोटि मदन छवि हारी
ठाढ़े ललित त्रिभंगी छवि सौ वृंदाविपिन-विहारी ।
वाई ओर मदनमोहन के श्रीवृपभानुकिसोरी,
चितवति स्याम विनत चितवन सौ मानौ चंद चकोरी ॥
5
मोर-मुकुट स्वर्नाभ सुघर सिर श्रीहरि के छवि पावै,
सील चंद्रिका भानुसुता के भानु-विमा वगरावै।
पेखि स्याम द्युति पीत प्रिया को पीत वसन तन धारें,
पिय के रंग सम नील-स्याम पट स्यामा अंग सँवार ।
6
कुंडल लोल अमोल नवन विच वक्ष विमल बनमाला,
मुरली मधुर वजाइ विस्व को मन मोहत नंदलाला ।
घट नैक उठाइ हाथ सौं पिय छवि निरखति प्यारी,
रूप-सुधा को दान पाइ त्यौ हिय हरषत बनवारी ।।
7
विविध बरन आभरन विभूपित रसिक-राय गिरिधारी,
झीन बसन भूपन कंचुक पट सोभित भानु-दुलारी ।
दोउन के दृग द्वै चकोर बनि दोउ मुखचंद निहारें,
प्रेम विवस दोऊ दोउन पै तन-मन-सरवस वार ॥
8
परम प्रेम फलरूप, कोटि-सत रति-मन्मथ छवि छीने,
संत-हृदय-संपति दंपति नव लसत प्रनय-रस-भीने ।
दारति चँवर जुगल प्रीतम को स्नेहमयी कोउ वामा,
अरपन कर सौ करति पान को वीरो कोउ अभिरामा ॥
9
सेवा-रत सहचरी-बूंद जुत स्याम और स्यामा की,
जाके हिय विच वसति सदा यह भुवत्तमोहनी झाँकी ।
सोइ तापस गुलवंत संत सुचि, सोइ ध्यानी,
सोइ ज्ञानी सोई लाह लह्यौ जीवन को भावुक भगत अमानी ॥
(पाण्डेय रामनारायणदत्त शास्त्री राम)

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