मूर्तिमान् सत्- Satkatha Ank-2

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मूर्तिमान् सत्- Satkatha Ank

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥
(मुखपृष्ठका बहुरंगा चित्र देखिये)
जिनके जीवनका प्रत्येक कण और प्रत्येक क्षण सर्वथा और सर्वदा 'सत्' से ओतप्रोत है, जो 'सत्' के परम आदर्श और मूर्तिमान् स्वरूप हैं, जिनका श्रीविग्रह 'सत्' स्वरूप श्रीराम-प्रेमसे ही बना हुआ है- 'राम प्रेम मूरति तनु आही।'
-असत्का जिनके जीवनमें कभी स्वप्रमें भी संस्पर्श नहीं है, जो परम 'सत्स्वरूप' रामके भी स्मरण तथा जपके विषय हैं-
( 'सुमिरत जिनहि राम मन माहीं।'
'जगु जप रामु रामु जप जेही।'
-जिनका दर्शन करके भरद्वाज मुनि प्रयागवासियोंके साथ अपनेको भाग्यवान् मानते हैं और उनके दर्शनको
रामदर्शनका फल बतलाते हैं-
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥
सब साधन कर सुफल सुहावा।लखन राम सिय दरसनु पावा॥
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा।सहित पयाग सुभाग हमारा॥
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥
_ 'सुनो भरत! हम वनवासी तपस्वी हैं, उदासीन हैं-हमारा कहीं राग-द्वेष या अपना-पराया नहीं है, न हमें कुछ चाहिये ही। हम किसी हेतुसे तुमसे बनावटी बात नहीं कहते-हम झूठ नहीं कहते। हमें तुमसे कुछ भी लेना-देना नहीं है। हम सत्य कहते हैं कि हमारे समस्त साधनोंका सुन्दर फल तो यह हुआ कि हमने सीता-लक्ष्मणसहित रामका दर्शन प्राप्त किया और उस रामदर्शनका महान् फल है तुम्हारा दर्शन। समस्त प्रयागके साथ हमारा यह सौभाग्य है। भरत! तुम धन्य हो। तुम्हारे यशने जगत्को जीत लिया।' यह कहकर मुनि भरद्वाज प्रेममग्न हो गये।
-जिनके महत्त्वका दिग्दर्शन कराते हुए परम सिद्ध ज्ञानी जनक महाराज सजल-नेत्र और पुलकित-शरीर होकर मुदित मनसे एकान्तमें अपनी धर्मपत्नीसे कहते हैं-
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि।
भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू।
इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥
सो मति मोरि भरत महिमाही।
कहै काह छलि छुअति न छाँही॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी।
जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं।
सब कर भल सब के मन माहीं॥
देबि परंतु भरत रघुबर की।
प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥
भरतु अवधि सनेह ममता की।
जद्यपि रामु सीम समता की॥
परमारथ स्वारथ सुख सारे।
भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्धि राम पग नेहू ।
मोहि लखि परत भरत मत एहू॥
'हे सुमुखि! सुनयनी! सावधान होकर सुनो।
भरतजीकी कथा भवबन्धनसे मुक्त करनेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार-इन तीनों विषयोंमें अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी गति है। (अर्थात् इनके सम्बन्धमें मैं कुछ जानता हूँ और अपनी सम्मति दे सकता हूँ।)
पर मेरी वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश पायी हुई) बुद्धि भरतकी महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल
करके भी उसकी छायातकको नहीं छू पाती।' । _ 'रानी! भरतजीकी अपरिमित महिमा है। उसे एक श्रीरामजी ही जानते हैं, पर वे भी उसका वर्णन नहींकर सकते।' ___ 'लक्ष्मणजी लौट जाएँ और भरतजी वनको जायँ, इसमें सभीका भला है और सबके मनमें भी यही है। परंतु देवि! भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका प्रेम और एक-दूसरेका विश्वास हमारी बुद्धिके तर्कमें नहीं आते। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समताकी सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममताकी सीमा हैं। भरतजीने (श्रीरामके अनन्य प्रेमको छोड़कर) समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखोंकी ओर स्वपमें भी नहीं ताका है। श्रीरामके चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो बस, भरतजीका यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है।'

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