आपद्धर्म- Satkatha ank-9

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आपद्धर्म
एक समय कुरुदेश में ओलोंकी बड़ी भारी वर्षा ही इससे सारे उगते हुए पौधे नष्ट हो गये और नक अकाल पड़ गया। दुष्कालसे पीड़ित प्रजा के अभावसे देश छोड़कर भागने लगी। वहीं एक स्ति नामके ब्राह्मण भी रहते थे। उनकी स्त्रीका नाम पोटिकी था। वह अभी बालिका ही थी। उसे लेकर स्ति भी देश छोड़कर इधर-उधर भटकने लगे। भटकते-भटकते वे दोनों एक महावतोंके ग्राममें पहँचे।। के मारे बेचारे उषस्ति उस समय मरणासन्न दशाको हो रहे थे। उन्होंने देखा कि एक महावत उबाले हए उड़द खा रहा है। वे उसके पास गये और उससे
कुछ उड़द देनेको कहा। महावतने कहा—'मैं इस वर्तनमें रखे हुए जो उड़द खा रहा हूँ, इनके अतिरिक्त मेरे पास और उड़द हैं ही नहीं, तब मैं कहाँसे दूँ ?' उषस्तिने कहा—'मुझे इनमेंसे ही कुछ दे दो।' इसपर महावतने थोड़े-से उड़द उपस्तिको दे दिये और सामने जल रखकर कहा कि 'लो, उड़द खाकर जल पी लो।' उषस्ति बोले-'नहीं, मैं यह जल नहीं पी सकता; क्योंकि इसके पीनेसे मुझे उच्छिष्ट-पानका दोष लगेगा।' ___महावतको इसपर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा कि 'ये उड़द भी तो हमारे गूंठे हैं; फिर जलमें ही क्या रखा है जो इसमें गूंठनका दोष आ पड़ा?' - उषस्तिने कहा-'भाई! मैं यदि यह उड़द न खाता तो मेरे प्राण निकल जाते। प्राणोंकी रक्षाके लिये आपद्धर्मकी व्यवस्थानुसार ही मैं उड़द खा रहा हूँ। पर जल तो अन्यत्र भी मिल जायगा। यदि उड़दकी तरह
ही मैं तुम्हारा गूंठा जल भी पी लूँ, तब तो वह स्वेच्छाचार हो जायगा। इसलिये भैया! मैं तुम्हारा जल नहा पीऊँगा।' यों कहकर उपस्तिने कुछ उडद स्वयं पा लिये और शेष अपनी पत्नीको दे दिये। ब्राह्मणीको पहले ही कुछ खानेको मिल गया था; इसलिये उन दाको उसने खाया नहीं, अपने पास रख लिया। दूसरे दिन प्रात:काल उषस्तिने नित्यकृत्यके बाद - स्त्रीसे कहा-'क्या करूँ मझे जरा-सा भी अन्न कहाँसे खानेको मिल जाय तो मैं अपना निर्वाह होने | लायक कुछ धन प्राप्त कर लँ: क्योंकि यहाँसे समीप| हा एक राजा यज्ञ कर रहा है, वह ऋत्विकके कार्यमें | मेरा भी वरण कर लेगा।' । इसपर उनकी स्त्री आटिकीने कहा-'मेरे पास - कलके बचे हुए उड़द हैं; लीजिये, उन्हें खाकर आप यज्ञमें चले जाइये।' भूखसे सर्वथा अशक्त उपस्तिने उन्हें | खा लिया और वे राजाके यज्ञमें चले गये। वहाँ जाकर | वे उद्गाताओंके पास बैठ गये और उनकी भूल देखकर | बोले-'प्रस्तोतागण! आप जानते हैं जिन देवताकी | आप स्तुति कर रहे हैं, वे कौन हैं? याद रखिये, आप | यदि अधिष्ठाताको जाने बिना स्तुति करेंगे तो आपका | मस्तक गिर पड़ेगा।' और इसी प्रकार उन्होंने उद्गाताओं | एवं प्रतिहर्ताओंसे भी कहा। यह सुनते ही सभी ऋत्विज्अपने-अपने कर्म छोड़कर बैठ गये। राजाने अपने ऋत्विजोंकी यह दशा देखकर उषस्तिसे | पूछा-'भगवन् ! आप कौन हैं? मैं आपका परिचय | जानना चाहता हूँ।' उषस्तिने कहा-'राजन्! मैं चक्रका | पुत्र उपस्ति हूँ।' राजाने कहा, 'ओहो, भगवन्, उषस्ति | आप ही हैं? मैंने आपके बहुत-से गुण सुने हैं। | इसीलिये मैंने ऋत्विज्के कामके लिये आपकी । बहुत खोज करवायी थी; पर आप न मिले और मुझे दूसरे ऋत्विजोंको वरण करना पड़ा। यह मेरा बड़ा सौभाग्य है, जो आप किसी प्रकार स्वयं पधार गये।
अब ऋत्विज्सम्बन्धी समस्त कर्म आप ही करनेकी कृपा करें।' उषस्तिने कहा-'बहुत अच्छा ! परंतु इन ऋत्विजोंको हटाना नहीं, मेरे आज्ञानुसार ये अपना-अपना कार्य करें और दक्षिणा भी जो इन्हें दी जाय, उतनी ही मुझे देना (न तो मैं इन लोगोंको निकालना चाहता हूँ और न दक्षिणामें अधिक धन लेकर इनका अपमान ही
करना चाहता हूँ। मेरी देख-रेखमें ये सब काम करते रहेंगे)।' तदनन्तर सभी ऋत्विज् उपस्तिके पास जाकर
तत्त्वोंको जानकर यज्ञकार्यमें लग गये और विधिपूर्वक वह यज्ञ सम्पन्न हुआ।

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