7 एकान्त कहीं नहीं - No alone anywhere

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दक्षिण भारतके प्रतिष्ठित संत स्वामी वादिराजजीके अनेकों शिष्य थे किंतु स्वामीजी अपने अन्त्यज शिष्य कनकदासपर अधिक स्नेह रखते थे। उच्चवर्णके शिष्योंको यह बात खटकती थी। 'कनकदास सच्चा भक्त है' यह गुरुदेवकी बात शिष्योंके हृदयमें बैठती नहीं थी। स्वामी वादिराजजीने एक दिन अपने सभी शिष्योंको एक-एक केला देकर कहा -'आज एकादशी है। लोगोंके सामने फल खानेसे भी आदर्शक प्रति समाज में अश्रद्धा बढ़ती है। इसलिये जहाँ कोई न देने के
स्थानमें जाकर इसे खा लो। थोड़ी देरमें सब शिष्य केले खाकर गुरुके सी आ गये। केवल कनकदासके हाथमें केला ग्यों-का- त्यों रखा था। गुरुने पूछा- क्यों कनकदास! तुम्हें कहीं एकान्त नहीं मिला? कनकदासने हाथ जोड़कर उत्तर दिया-'भगवम्। वासुदेव प्रभु तो सर्वत्र हैं, फिर एकान्त कहीं कैसे मिलेगा,

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