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भजन भरोसा एक बल - Bhajan trust - a force

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ओशो गंगा/ Osho Ganga
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
दरिया कहे शब्द निरवाना--प्रवचन-03
भजन भरोसा एक बल—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 23 जनवरी 1979 ;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सारसूत्र :
बेवाह के मिलन सों, नैन भया खुसहाल।
दिल मन मस्त मतवल हुआ, गूंगा गहिर रसाल।।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।।
है खुसबोई पास में, जानि परै नहिं सोय।
भरम लगे भटकत फिरे, तिरथ बरत सब कोय।।
जंगम जोगी सेपड़ा पड़े काल के हाथ।
कह दरिया सोइ बाचिहै, सत्तनाम के साथ।।
बारिधि अगम अथाह जल, बोहित बिनु किमि पर।
कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मंजधार।


निर्वाण की सुगंध उनके ही शब्दों में हो सकती है जो समग्ररूपेण मिट गए; जो नहीं है। जिन्होंने अपने अहंकार को पोंछ डाला। जिनके भीतर शून्य विराजमान हुआ है। उसी शून्य से संगीत उठता है निर्वाण का। जब तक बोलने वाला है तब तक निर्वाण की गंध नहीं उठेगी। जब बोलने वाला चुप हो गया, तब फिर असली बोल फूटते हैं। जब तक बांसुरी में कुछ भरा है, स्वर प्रकट नहीं होंगे। बांसुरी तो पोली हो, बिलकुल पोली हो,तो ही स्वरों की संवाहक हो पाती है।
दरिया बांस की पोली पोंगरी है। शब्द निर्वाण से उनसे झर रहे हैं--उनके ही हैं, परमात्मा के हैं। क्योंकि निर्वाण का शब्द परमात्मा के अतिरिक्त और कौन बोलेगा? और कोई बोल नहीं सकता है। और जहां से तुम्हें निर्वाण के शब्दों की झंकार मिले, वहां झुक जाना। फिर अपनी अपेक्षाएं छोड़ देना। लोग अपेक्षाएं लिए चलते हैं, इसलिए सदगुरुओं से वंचित रह जाते हैं। तुम्हारी कोई अपेक्षा के अनुकूल सदगुरु नहीं होगा। तुम्हारी अपेक्षाएं तुम्हारे अज्ञान से जन्मी है। तुम्हारी अपेक्षाएं तुम्हारे अज्ञान का ही हिस्सा है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपेक्षाओं के अनुकूल गुरु को खो जात है। गुरु तो सदा मौजूद है--पृथ्वी कभी-कभी इतनी अभागी नहीं रही कि गुरु मौजूद न हों--लेकिन हमारी अपेक्षाएं!
अब जैसे तुमने अगर अलहिल्लाज मंसूर को अपना गुरु समझा और तुम खोजने निकले, तो तब तक किसी को गुरु न मानोगे जब तक उसके हाथ-पैर न कटें, और जबान न काटी जाए और गर्दन न गिरायी जाए--तब तक तुम किसी को गुरु न मानोगे। अगर जीसस को तुम गुरु मान बैठे हो, तो जब तक किसी को सूली न लगे तब तक तुम उसे गुरु न मानोगे। लेकिन जिसे सूली लग गयी, वह तुम्हारे किस काम का? तुम जा चुके गुरुओं से अपनी अपेक्षाएं पैदा कर लेते हो। तो कोई महावीर को खोज रहा है--नहीं मिलेंगे उसे गुरु। बस महावीर एक बार होते हैं। कोई बुद्ध को खोज रहा है--नहीं मिलेंगे उसे गुरु। बुद्ध बस एक बार होते हैं। इस जगत में कुछ भी पुनरुक्त नहीं होता। यह जगत प्रत्येक को अनूठा व्यक्तित्व देता है।
गुरु तो सदा मौजूद है, और ऐसा भी नहीं है कि खोजने वाले नहीं है, लेकिन खोज कुछ बुनियाद से गलत हो जाती है।
बरसरे-दार खिंचे या न खिंचे वोह लेकिन
जो कहे कलमए-हक तू उसे मंसूर समझ।।
फिर चाहे फांसी पर लटकाया गया हो या न लटकाया गया हो, जो कहे निर्वाण का शब्द, जो कहे सत्य की बात, जिसके पास सत्य की भनक हो, जिसके पास बैठकर सत्य की सुर तुम्हारे तन-प्राण को मस्त करने लगे, मंसूर समझ।
बरसरे-दार खिंचेया न खिंचे वोह लेकिन
जो कहे कलमए-कह तू उसे मंसूर समझ।।
जहां भी यह उदघोषणा हो--अहं ब्रह्मास्मि--वहां जरा जागकर, अपेक्षाओं को छोड़कर, शांत होकर, मौन होकर, विचार से रिक्त होकर संबंध जोड़ना, संबंध बांधना, सत्संग बनाना, क्योंकि सत्संग ही सेतु है। दरिया कहै सब्द निरबाना! मगर तुम सुनोगे? सवाल तुम्हारे सुनने का है। सदगुरु कहते हैं, कहते रहे हैं, मगर अधिकतर तो वज्रबधिर कानों पर उनके शब्द पड़ते हैं और खो जाते हैं।
जीसस ने कहा है, जैसे कोई बीज फेंके, कुछ बीज रास्ते पर पड़ जाएं तो कभी पनपेंगे नहीं। दिन-रात लोग रास्तों पर चलते रहते हैं--बीजों को पनपने का मौका कब मिलेगा? कुछ बीज खेत की मेंड़ों पर पड़ जाएं, पनपेंगे तो जरूर लेकिन जल्दी ही मर जाएंगे, क्योंकि मेंड़ों से लोग निकलते हैं--कभी-कभार निकलते हैं, रास्ते जैसे नहीं, मगर फिर भी निकलते हैं। कुछ बीज पत्थरों पर पड़ जाए, वहां से कोई भी नहीं निकलता, लेकिन पत्थरों में कहीं बीज फूटे हैं? हां, कुछ बीज जो ठीक-ठीक भूमि में पड़ जाएंगे आर्द्र भूमि में पड़ जाएंगे, वे उगेंगे, वह बड़े वृक्ष बनेंगे, उनकी शाखाएं आकाशों में फैलेंगी, उनके मस्तक चांदत्तारों को छुएंगे, उनमें फूल खिलेंगे, उनसे फूल झरेंगे।
सदगुरु तो फेंकते हैं वचनरूपी बीत, पर तुम कहां लोगे उन्हें? अगर तुमने अपने सिर में लिया तो वह चलता हुआ रास्ता है; वहां इतने विचारों की भीड़ चल रही हैं, वहां ऐसा ट्रैफिक है कि वहां कोई बीज पनप नहीं सकता। जब तक कि तुम अपने हृदय की गीली भूमि में बीजों को न लो, तब तक फसल में वंचित रहोगे। और जिंदगी बड़ी उदास है। और जिंदगी इसीलिए उदास है कि जिन बीजों से तुम्हारी जिंदगी हरी होती, फूल खिलते, गंध बिखरती, उन बीजों को तुमने कभी स्वीकार नहीं किया है। और अगर तुम पूजते भी हो तो तुम मुर्दों को पूजते हो। अगर तुम फूल भी चढ़ाते हो पत्थरों के सामने चढ़ाते हो। अगर तुम तीर्थयात्राओं पर भी जाते हो, बाहर की तीर्थयात्राओं पर जाते हो। तीर्थयात्रा तो बस एक है--उसका नमा अंतयात्र्रा है। और सदगुरु तो केवल जीवित हो तो ही सार्थक है।
तुम मुर्दा मांझी की नाव में तो न बैठोगे! और वह कितना ही बड़ा मांझी क्यों न रहा हो जब जिंदा था, मगर अब उसके हाथ में पतवार किसी अर्थ की नहीं है। वह नाव को खे न सकेगा।
जहां तक भी नजर जाती, धुआं ही हाथ आता है,
कहीं भी जल नहीं है, सिर्फ रेगिस्तान गाता है,
कही भी घुंघरू की गूंज का धोखा नहीं होता
 मरण के खौफ से जीवन यहां खुलकर नहीं रोता,
यही से हां, यही से जिंदगी आरंभ होती है!
तुम्हें अगर स्मरण आ जाए कि तुम सावन होने को पैदा हुए थे और तुम क्या होकर रह गए हो? यह जलती दुपहरी ग्रीष्म की! कि तुम्हारे भीतर कोयल की कूक गूंजनी थी, कि पपीहे का गीत उठना था, और तुम क्या होकर रह गए हो? ये बांझ विचारों की भीड़, यह व्यर्थ विचारों की भीड़ यह कूड़ा-कर्कट! इससे तुमने अपने प्राणों के उस पात्र को भर लिया है जिसमें अमृत भरा जा सकता था। तुम पैदा हुए थे उपवन होने को और मरुस्थल होकर समाप्त हो रहे हो, यह स्मरण आ जाए तो--यहीं से हां, यही से जिंदगी आरंभ होती है! इसी स्मरण के साथ जिंदगी का प्रारंभ होता है। क्योंकि इसी स्मरण के साथ सदगुरु की तलाश शुरू होती है। तो खोजें उसे, कि जिसके वचन बीज की तरह पड़ें तुम्हारे हृदय पर...दरिया कहै सब्द निरबाना...कि जिसके निर्वाण का रस तुम्हें भी बांध लो, कि जिसके निर्वाण की आवाज तुम्हें भी पुकार दे, चुनौती बन जाए, कि जिसके साथ तुम भी हो लो अनंत की यात्रा पर, अज्ञात की यात्रा पर, कि परमात्मा की खोज तुम्हारी खोज बन जाए।
जहां तक भी नजर जाती, धुआं ही हाथ आता है,
कहीं भी जल नहीं है, सिर्फ रेगिस्तान गाता है,
कहीं भी घुंघरू की गूंज का धोखा नहीं होता,
मरण के खौफ से जीवन यहां खुलकर नहीं रोता,
यहीं से हां, यही से जिंदगी आरंभ होती है!
खड़ी हैं बांह फैलाए हुए मजबूत चट्टानें,
गुजरती आंधियां अपनी कमाने हाथ में ताने,
गजब का एक सन्नाटा, कहीं पत्ता नहीं हिलता,
किसी कमजोर तिनके का समर्थन तक नहीं मिलता
कभी उन्माद हंसता है, कभी उम्मीद रोती है।
बराए नाम जीते हैं, बराए नाम मरते हैं,
उनींदी आंख से टूटे हुए सपने गुजरते हैं,
उजाले के हमारे बीच का पर्दा नहीं उठता,
सुबह आए न आए रात से पीछा नहीं छुटता,
उदासी साथ चलती है, उदासी साथ सोती है।
बनाने के लिए हमने स्वयं किस्मत बनाई है,
विफलता एक पूजी है, निराशा ही कमाई है,
जलन से दोस्ती है, उलझनों से आशनाई है,
लड़ाई है अगर अस्तित्व से अपनी लड़ाई है,
स्वयं पतवार कश्ती को किनारे पर डुबोती है।
खुशी अक्सर सिमाने में हमें आवाज देती है,
रुकावट दायरा बनकर हमेशा घेर लेती है,
कभी मो लगा रहता पुकारों का, खयालों का,
कभी उत्तर नहीं मिलता बड़े भोले सवालों का,
हमारा हाथ खाली, आंख में ही एक मोती है।
हमें जागा हुआ पाकर हमेशा रात हंसती है,
शरद की चांदनी में आग अंबर से बरसती है,
जिसे भी देख दें हम वह सितारा टूट जाता है,
अगर धारा पकड़ते हैं किनारा छूट जाता है,
कली हंसकर हमारी आंख में कांटे चुभोती है।
कभी शमशान की धमकी, कभी तूफान की गाली,
हमारी उम्र का प्याला कभी गम से नहीं खाली,
मरुस्थल पर सुबह से शाम तक बादल बरसते हैं,
समंदर में बसे हैं, हम मगर जल को तरसते हैं,
हमारे ओंठ आकर मृत्यु चुंबन से भिगोती है!
भंवर में डूब जाते हैं अगर तो तर गए हैं हम,
जिलाने के लिए तस्वीर को खुद मर गए हैं हम,
किसी बारात में शामिल हमारा दिल नहीं होता,
हमारी राह का कोई सिर मंजिल नहीं होता,
समझ सिंदूर हमको मांग में पीड़ा संजोती है।
जहां तक भी नजर जाती, धुआं ही हाथ आता है,
कहीं भी जल नहीं है, सिर्फ रेगिस्तान गाता है,
कहीं भी घुंघरू की गूंज का धोखा नहीं होता,
मरण के खौंफ से जीवन यहां खुलकर नहीं रोता,
यही से हां, यहीं से जिंदगी आरंभ होती है!
जिस क्षण तुम्हें इस बात का स्मरण आता है कि तुम अकारण व्यर्थ हुए जा रहे हो, कि जीवन का यह महाअवसर ऐसे ही खोया जाता है, यहां बहुत कुछ हो सकता था, यहां सब कुछ हो सकता था और कुछ भी नहीं हो रहा है; यहां परमात्मा को सकता था, और तुम खाली हाथ आए और खाली हाथ ही चले जाओगे! यह कैसी नादानी! यह कैसा बचकानापन है! यह कैसी मूढ़ता है! इसे तोड़ो! दरिया कहै सब्द निरबाना। सुनो दरिया के शब्द, यह शब्द तुम्हारे लिए नौकाएं बन सकते हैं। यह शब्द तुम्हें चौंकाएंगे, जगाएंगे, झकझोरेंगे; यह शब्द तुम्हें पार भी लगा सकते हैं। निर्वाण की याद भी आ जाए, उस किनारे का मन में थोड़ा स्वप्न भी जग जाए, तो यह किनारा फिर ज्यादा देर तुम्हें बांधे नहीं रख सकता। इस किनारे से तुम्हारी जंजीरें टूटनी शुरू हो जाएंगी।
बेवाहा के मिलन सों, नैन भया खुसहाल।
बेवाहा दरिया के भक्तों का ओंकार को दिया गया नाम है। जैसे नानक कहते--एक ओंकार सतनाम। जैसे उन्होंने ओंकार को सतनाम कहां। जैसे हिंदू राम और मुसलमान अल्लाह और जैन नमोकार और बौद्ध बुद्ध की शरण में जाने की घोषणा को मंत्र कहते हैं; या जैसे गायत्री, या जैसे जपुजी। छोटे मंत्र हैं, बड़े मंत्र हैं, मगर सारे मंत्रों का एक ही प्रयोजन है कि तुम्हारे भीतर जो संगीत सोया पड़ा है वह छिड़ जाए। फिर नमोकार से छिड़े, कि गायत्री से छिड़े, कि कुरान की कोई आयत उसे जगा दे, इससे भेद नहीं पड़ता।
वीणा तुम्हारे भीतर है। वीणा को छूना है, किस अंगुली से छुओगे, अंगुली में हीरे की अंगूठी होगी कि सोने की अंगूठी होगी कि अंगूठी होगी ही नहीं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। अंगुली गोरी होगी कि काली होगी, लंबी होगी कि छोटी होगी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस भीतर के तार छिड़ जाएं, झंकार आ जाए--तुम नहा जाओ उस झंकार में!
दरियापंथी अपने महामंत्र को बेवाहा करते हैं। बेवाहा सोया पड़ा है तुम्हारे भीतर, तुम उसे जन्म से लेकर आए हो, वह तुम्हारे रोम-रोम में भिदा पड़ा है, मगर जब तक जगाओगे नहीं तब तक तुम वंचित रहोगे प्रकाश से और वंचित रहोगे अर्थ से और वंचित रहोगे आनंद से। दरिया कहते हैं: बेवाहे  मिलन सो...और जिसका उस पर संगीत से, उस अनाहत नाद से मिलन हो गया, उस ओंकार में जिसकी डुबकी लग गयी...नैन भया खुसहाल...उसकी आंखें आनंद हो जाती। समझो--
जबां पै जिक्र तेरा उज्र-ख्वाह दीदएतर
यही वजू है, इसी को नमाज कहते हैं
नाम क्या है, इसमें फर्क नहीं पड़ता। राम है कि रहीम है, कि कृष्ण है कि बुद्ध है, कोई भी नाम तुम दे लो उसे। नाम तो बहाना है उसे याद करने का। नाम तो ऐसे है जैसे घर से तुम बाजार जाते हो कुछ खरीदने, कहीं भूल न जाओ तो कुर्ते के छोर में गांठ बांध लेते हो। गांठ का कोई मूल्य नहीं है। और गांठ ऐसी बांधी कि वैसी बांधी, इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। बाएं तरफ बांधी कि दाएं तरफ बांधी, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। गांठ का मूल्य कुछ भी नहीं अपने-आप में, पर गांठ का प्रयोजन जरूर है। गांठ तुम्हें याद दिलाती रहेगी; चलोगे रास्ते पर, याद दिलाती रहेगी; तुम्हें याद भी न आए तो दूसरे याद दिला देंगे--कुर्ते में गांठ क्यों बांधी है? याद आती रहेगी कि कुछ खरीदकर घर लौटना है। बाजार कुछ खरीदने आए हैं। कोई प्रयोजन है जो पूरा करना है। फिर राम की गांठ, कि कृष्ण की गांठ, कि गायत्री, कि नमोकार, कि बेवाहा, कुछ फर्क नहीं पड़ता। कोई भी गांठ चाहिए जो स्मरण दिलाती रहे। चौबीस घंटे सतत स्मरण दिलाती रहे।
जबां पै जिक्र उज्र-ख्वाह दीदएतर
बस जबान पर तेरी याद रहे, आंखों में एक ही अभीप्सा रहे, कि तुझे देखना है! जबान आंखों को याद दिलाती रहे कि देखना है, आंखें जबान को याद दिलाती रहें कि उसका गुणगान जारी रहे।
जबां पै जिक्र तेरा उज्र-ख्वाह दीदएतर
यही वजू है, इसी को नमाज कहते हैं
यही प्रार्थना, यही आराधना, यही नमाज। और जिसकी आंखें उसके दर्शन की प्यासी हो गयी और जिसकी जुबान पर उसकी याद सघन होने लगी, तो क्रांति घटती है।
भरे हुए निगाहों में हुस्न के जलवे।
यह क्या मजाल जहां मैं हूं और बहार न हो।।
जिसकी आंखों में परमात्मा को देखने की अभीप्सा जग गयी, उसके चारों तरफ बहार नाचने लगती है। आ गया मधुमास! वसंत ही वसंत है फिर! प्रभु के स्मरण में डूबे व्यक्ति को एक ही ऋतु का पता होता है--वसंत। उसकी ऋतुएं नहीं बदलती। उसकी ऋतु तो फिर थिर हो जाती। उसके लिए समय के परिवर्तन शून्य हो जाते हैं। उसके लिए समय के परिवर्तन विदा हो जाते हैं। उसके भीतर तो अपरिवर्तनीय शाश्वत का नाद होने लगता है। उसकी एक ही ऋतु है--वसंत। फूल ही झरते हैं उसमें। मधु ही पीता है वह।
भरे हुए हैं निगाहों में हुस्न के जलवे...
और उसकी आंखों में उस प्यारे के सौंदर्य का प्रतिबिंब पकड़ सकते हो तुम। उसकी आंखें सौंदर्य से ही अभिभूत रहती हैं। उसकी आंखें सौंदर्य से ही डबडबाई रहती हैं।
भरे हुए हैं निगाहों में हुस्न के जलवे।
यह क्या मजाल जहां मैं हूं और बहार न हो।।
ऐसा व्यक्ति जहां बैठे मधुमास, जहां बैठे वहां मधुशाला; जहां उठे-चले, जहां उसके चरण पड़ें, वहां-वहां तीर्थ निर्मित होते हैं।
मेरी फिजाए जिस्त पर नाज से छा गया कोई।
आंखों में आंखें डाल के बंदा बना गया कोई।।
और तुम परमात्मा को देखना चाहो, बस तुम परमात्मा को देखना चाहो, बात घट जाती--क्योंकि परमात्मा तो तुम्हें देख ही रहा है। उसकी आंख तो तुम पर गड़ी है। इसीलिए तो हम कहते हैं, उसकी हजार आंखें हैं, क्योंकि हर-एक पर उसकी आंख गड़ी है। बस तुम आंख बचा रहे। तुम यहां-वहां देखते हो। तुम उसकी याद करो तो तुम्हारी आंखों से जुड़ जाए। और जहां आंखें चार होती, वहां चमत्कार होता है।
मेरी फिजाए जिस्त पर नाज से छा गया कोई।
आंखों में आंखें डाल के बंदा बना गया कोई।।
दिल से पर्दा जो उठा हो गई रोशनी आंखें।
दिल में वह पर्दानशी था मुझे मालूम न था।।
और जिस दिन तुम उसे दुख लोगे, उस दिन चौंकोगे, हंसोगे भी, रोओगे भी। इसलिए भक्तों को लोगों ने पागल समझा। क्योंकि हंसना और रोना साथ-साथ सिर्फ पागलों को ही होता है। समझदार आदमी अगर जरूरत हो तो हंसता है और अगर जरूरत हो तो रोता है। मगर ऐसा तो कभी नहीं होता है कि रोए भी और हमें भी साथ-साथ। कि ओंठ हंसें और आंखें रोएं। कि एक आंख हंसे और एक आंख रोए। यह तो विक्षिप्तता के लक्षण है।
इसलिए भक्तों को लोगों ने पागल कहा। मगर भक्तों को समझो। अगर भक्त पागल है तो पागलपन ही पाने जैसी चीज हैं। और अगर जो भक्त नहीं है वे समझदार हैं, तो समझदारी दो कौड़ी की है, उससे छुटकारा कर लेना। भक्तों को पागलपन तुम्हारे तथाकथित समझदारों की समझदारी से लाख गुना बहुमूल्य है।
लेकिन यह क्यों घटना है कि भक्त हंसता भी है और रोता भी है? हंसता इसलिए है कि यह भी खूब रही; यह भी खूब मजाक रही कि तुम भीतर बैठे थे और तुम्हें जन्म-जन्म न मालूम कहां-कहां खोजता फिरा! कि तुम यहां भीतर थे कि चलने की जरूरत भी न थी, एक कदम न उठाना था और तुम मिल जाते, और मैंने कितनी-कितनी यात्राएं की! कितनी धूल, कितनी गर्द-गुबार झेली! कहां चांदत्तारों के किनारे तुम्हें खोजता फिरा और तुम मेरे भीतर बैठे थे! तो हंसता भी है कि यह भी खूब रही, यह भी मजाक आखिरी रहा! और रोता भी है--रोता है कि कितने दिन गंवाए तुम्हारे बिना, रोता है कि कितने दुर्दिन देखे तुम्हारे बिना, रोता है कि अब तक सारा जीवन सिर्फ दुर्घटना के और कुछ भी न रहा।
बेवाहा के मिलना सों, नैन भया खुसहाल।
यह बात समझता। यह बात कीमती है। नैन भया खुशहाल। तुमने खीझें तो देखी हैं, जो आनंद देती हैं, लेकिन तुम्हारे पास ऐसी आंख नहीं है जो आनंद बरसाए। हां, देखा कभी सुबह सूरज ऊगता और कहा--खूब सुंदर है। और कभी देखा गुलाब का फूल खिला और कहा--बहुत सुंदर है। और कभी कोई देखा सुंदर चेहरा और कहा--बहुत सुंदर है। मगर यह तो बाहर है सौंदर्य। तुम्हारी आंख अभी इतनी कुश नहीं कि चीजों को सुंदर बना दे। कि तुम जो देखो, वही सुंदर हो जाए। अभी तो कुछ सुंदर होता है तो सुंदर मालूम पड़ता है। तुम्हारी आंख कोरी है, खाली है। सिर्फ खबर देती है। तुम्हारी आंख भी सृजनात्मक नहीं है। तुम्हारी आंख केवल बिंब उतारती है। जैसा होता है, बता देती है। तुम्हारी आंख निष्क्रिय है। तुम्हारी आंख का काम अभी नकारात्मक है--जो है, बता देती हैं। लेकिन तुम्हारी आंख में अभी सृजन की क्षमता नहीं है कि जिसे देखे, वह सुंदर हो जाए। कि जहां तुम्हारी आंख पड़े, वहां गीत जन्मे। कि तुम जिसे देख लो, वह गरिमा को उपलब्ध हो जाए, महिमा को उपलब्ध हो जाए। यही संतों की आंख की खूबी है।
बायजीद ने लिखा है: मैं अपने गुरु के पास बारह वर्ष रहा। तीन वर्ष तक तो वे मुझसे बोले ही नहीं। मैं बैठा रहा, बैठ रहा, ऐसे जैसे मैं हूं ही नहीं। औरों से बोलते थे, बात करते थे, न मेरी तरफ देखते थे, न बोलते थे। तीन वर्ष बाद उन्होंने मेरी तरफ देखा। और उस देखने में ही मेरा जन्म हुआ। बस उनकी आंख मुझ पर पड़ी कि मैं जन्मा। सब बदल गया उसी क्षण।
फिर तीन साल बीत गए और एक दिन वह मुझसे बोले। और वह बोल, और ऐसी मधुरिमा तन-प्राण में छा गयी, ऐसा स्वाद, ऐसी मस्ती, जो किन्हीं शराबों में नहीं हो सकती। फिर तीन साल बीत गए और एक दिन उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मेरी पीठ थपथपायी। और वह स्पर्श और जैसे लोहा सोना हो जाए! और तीन वर्ष बीत गए और एक दिन उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा कि बायजीद, अब तू तैयार है! अब तू जा, सोयों को जगा! अब तू जा, लोगों की आंख में झांक; उनकी पीठ थपथपा, उनसे बोल, उनको गल लगा! और साधना पूरी हो गयी। बस बारह वर्ष बैठे-बैठे ही पूरी हो गयी।
सदगुरु जिसकी तरफ देख दे, उसके देखते ही तुम्हारे भीतर कूड़ा-कर्कट जल जाता है। तुम्हारा अंधेरा छंट जाता है।
एक ऐसी आंख भी है जिसका स्वभाव आनंद को पैदा करना है। और तुम दूसरी इससे विपरीत आंख से परिचित हो, इसलिए बात तुम्हें समझ में आ जाएगी, ऐसी आंखें हैं जो तुम्हारी तरफ देखे तो तुम एकदम कीड़े-मकोड़े हो जाते हो। तुम्हारे तथाकथित साधु-संत, जिनकी तुम पूजा करते हो, जिसको तुम समादर देते रहे हो, कभी उनके पास जाकर देखना! उनकी आंखें तुम्हें ऐसे देखते हैं--ऐसी आलोचना से, ऐसी निंदा से--कि उनके देखते ही तुम चाहते हो, जमीन फट जाती और हम समा जाते। उनकी आंखें तुममें नारकीय कीड़े देखती हैं। उनकी आंखों में तुम्हारा भविष्य दिखायी पड़ता है कि सड़ोगे नर्क में, कि जलाए जाओगे कड?ा हो में उबलते तेल के। उनकी आंखों में नर्क है, वही नर्क वह तुम में देखते हैं। और उनकी आंखों में निंदा है, सम्मान नहीं, सत्कार नहीं। यह बच्चे संतों का लक्षण नहीं।
सच्चे संतों की आंखों में तो स्वर्ग होता। वहां तो जादू होता। पापी से पापी आदमी भी सच्चे संत के सामने खड़ा हो जाए तो पुण्यात्मा हो जाता है। खड़े होने से पुण्यात्मा हो जाता है। कुछ और करना नहीं पड़ता। उसकी नजर काफी है--और क्या चाहिए? उसकी नजर का जादू काफी है--और क्या चाहिए? उसकी नजर की कीमिया काफी है--और क्या चाहिए? सदगुरु तुम्हारा हाथ हाथ में ले ले, बस बहुत हो गया, अंतिम बात हो गयी।
सदगुरु निंदा नहीं करता। सदगुरु की खूबी ही यही है कि तुम्हारे गलत को भी रूपांतरित करता है शुभ में। तुम्हारा कामवासना को राम की वासना बना देता है। तुम्हारे क्रोध को करुणा बना देता है। तुम्हारे लोभ को दान में रूपांतरित कर देता है। तुम्हारी देह को, मांस-मज्जा मिट्टी की बनी देह को मंदिर का ओहदा दे देता है। बिरहिनी मंदिर दिया ना बार...यारी ठीक कहते हैं कि देह तुम्हारा मंदिर है, शरीर तुम्हारा मंदिर है। क्यों रातें हो, इस मंदिर में दिए को जलाओ! आतिथेय बनो, अतिथि को पुकारी, आएगा इसी मंदिर में, इसी देह में। इस देह को मिट्टी कह कर इंकार मत करना, क्योंकि यह अमृत का वास है। अमृत ने इस अपने घर की तरह चुना है। इस चुनाव में ही मिट्टी अमृत हो गयी, मिट्टी मिट्टी न रही।
संत की पहचान यही है कि तुम पापी की तरह जाओ और पुण्यात्मा की तरह लौटो, कि तुम रोते हुए जाओ और हंसते हुए लौटो; कि तुम जाओ ऐसे कि जैसे पहाड़ों का बोझ ढो रहे हो और आओ ऐसे कि तुम्हें पंख लग गए हैं। जहां ऐसी घटना घटती हो, चूकना मत फिर! फिर पकड़ लेना पैर, कि गह लेना बांह, फिर आ गयी घड़ी अपने को निछावर कर देने की।
बेवाहा के मिलन सौं, नैन भया खुसहाल।
मगर यह आंखें तभी पैदा हैं जब भीतर के अंतर्नाद से मिलन हो जाए। ओंकार में जब कोई नहा जाता है, तभी यह आंखें उपलब्ध होती हैं--यह जादू भरी आंखें, जो जिसको छू दें उसको किसी दूसरे लोक का वासी बना दें। जिनका स्पर्श पारस का स्पर्श है।
ऐसी घटना घटी।
विवेकानंद राजस्थान के एक रजवाड़े में मेहमान थे। खेतरी के महाराजा के मेहमान थे। अमरीका जाने के पहले। अब महाराज तो महाराजा! अब विवेकानंद का स्वागत कैसे करें? और अमरीका जाता है संन्यासी, पहला संन्यासी, स्वागत से विदा होनी चाहिए! तो हर एक की अपनी भाषा होती है, अपने सोचने का ढंग होता है, महाराजा और क्या करता, उसने देश की सबसे बड़ी जो खयातिनाम वेश्या थी, उसको बुलवा भेजा। बड़ा जलसा मनाया। वेश्या का नाच रखा। यह भूल ही गए कि किसके लिए यह स्वागत-समारोह हो रहा है। विवेकानंद के लिए!
और जब विवेकानंद को आखिरी घड़ी पता चला--सब साज बैठ गए, वेश्या नाचने को तत्पर है, दरबार भर गया, तब विवेकानंद को बुलाया गया कि अब आप आएं, अब उन्हें पता चला कि एक वेश्या का नृत्य हो रहा है उनके स्वागत में! विवेकानंद की दशा समझ सकते हो! बड़े मन को चोट लगी कि यह कोई बात हुई! संन्यासी के स्वागत में वेश्या! इंकार कर दिया जाने से। साधारण भारतीय संन्यासी की धारणा यही है! इंकार कर दिया जाने से। अपमानित किया अपने को अनुभव। यह तो असम्मानजनक है।
वेश्या बड़ी तैयार होकर आयी थी। संन्यासी का स्वागत करना था, कभी किया नहीं था संन्यासी के स्वागत में कोई नाच-गान, बहुत तैयार होकर आयी थी, बहुत पद याद करके आयी थी--कबीर के, मीरा के, नरसी मेहता के। बहुत दुखी हुई कि संन्यासी नहीं आएंगे। मगर उसने एक गीत नरसी मेहता का गाया--बहुत भाव से गाया, खूब रोकर गाया, आंखों में झर-झर आंसू बहे और गाया। उस भजन की कड़ियां विवेकानंद के कमरे तक आने लगी। और विवेकानंद के हृदय पर ऐसी चोट पड़ने लगी जैसे सागर की लहरें किनारे से टकराएं, पछाड़ खाए। फिर मन में बड़ा पश्चात्ताप हुआ।
नरसी मेहता का भजन है कि एक लोहे का टुकड़ा तो पूजागृह में रखते हैं, एक लोहे का टुकड़ा बधिक के घर होता है, लेकिन पारस पत्थर को थोड़े ही कोई भेद होता है। चाहे बधिक के घर का लोहा ले आओ। जिससे काटता रहा हो जानवरों को, और चाहे पूजागृह का लोहा, ले आओ, जिससे पूजा होती रही हो, पारस पत्थर तो दोनों को छूकर सोना कर देता है। यह बात बहुत चोट कर गयी, घाव कर गयी। यह विवेकानंद के जीवन में बड़ी क्रांति की घटना थी।
मेरे अपने देखे, रामकृष्ण जो नहीं कर सके थे, उस वेश्या ने किया। विवेकानंद रोक न सके, आंख से आंसू गिरने लगे--यह तो चोट भारी हो गयी! अगर तुम पारस पत्थर हो, तो यह भेद कैसा? पारस पत्थर को वेश्या दिखाई पड़ेगी, सती दिखाई पड़ेगी? पारस पत्थर को क्या फर्क पड़ता है--कौन सती, कौन वेश्या! लोहा कहां से आता है, इससे क्या अंतर पड़ता है, पारस पत्थर के तो स्पर्श मात्र से सभी लोहे सोना हो जाते हैं।
रोक न सके अपने को। पहुंच गए दरबार में। सम्राट भी चौंका। लोग भी चौंके कि पहले मना किया, अब अया गए! और आए तो आंख से आंसू झर रहे थे। और उन्होंने कहा, मुझे क्षमा करना, उस वेश्या से कहा, मुझे क्षमा करना, मैं अभी कच्चा हूं, इसलिए आने से डरा। कहीं न कहीं मेरे मन में अभी भी वासना छिपी होगी, इसीलिए आने से डरा। नहीं तो डर की क्या बात थी? लेकिन तूने ठीक किया, तेरी वाणी ने मुझे चौंकाया और जगाया।
विवेकानंद उस घटना का बहुत स्मरण करते थे कि एक वेश्या ने मुझे उपदेश दिया। यह भेद! सच्चे ज्ञानी के पास अभेद है। पापी जाए तो पुण्यात्मा जाए तो, दोनों को छूता है, दोनों को स्वर्ण कर देता है। उसकी आंखों का जादू ऐसा है, उसके हृदय का जादू ऐसा है।
मगर यह संभव तभी होता है जब भीतर का अनाहत सुना गया हो। बेवाहा के मिलन सों, नैन भया खुसहाल। आंखें न केवल मस्त हो जाती है, बल्कि मस्ती देने वाली भी हो जाती हैं। और तभी जानना कि आंखें मस्त हुई, जब मस्ती देने वाली भी हो जाएं।
यह किसी आदल का आंसू है
जो ढल गया अधर पर मेरे:
बचपन से जो उदास थे वे
सोए सपने लगे महकने।
हार गया मैं खोज-खोजकर
कोई नहीं मिला अपने सा,
जाने कहां-कहां भटका हूं
गुमसुम आत्ममुग्ध सपने-सा।
यह किस पायल का सरगम है
जो भर गया कंठ में मेरे:
वर्षों से जो गीत मौन थे
वह कोकिल से लगे चहकने।
यह किस बादल का आंसू है
जो ढल गया अधर पर मेरे
बचपन से जो उदास थे वे
सोए सपने लगे महकने।
एक बूंद पड़ जाए अनाहत नाद की जीवन रूपांतरित हो जाता है। दुनिया वही होती है लेकिन तुम वही हनीं रह जाते। और जब तुम कही नहीं रह जाते तो दुनिया वही कैसे रह जाएगी? तुम्हारे देखने का ढंग बदला कि दिखायी पड़ने वाली सारी चीजें बदल जाती हैं। दृष्टि बदली तो सृष्टि बदली। आंख बदली तो जहान बदला। यही वृक्ष तुम देखोगे फिर अनाहत के नाद में डुबी हुई आंखों से और चकित हो जाओगे--यह वृक्ष सिर्फ वृक्ष नहीं हैं, यह पृथ्वी की आकाश को छूने की आकांक्षा हैं। यह वृक्ष भी सत्य की खोज में वैसे ही बढ़ रहे हैं आकाश की तरफ, जैसे तुम। इनका अपना ढंग है। इन वृक्षों पर भी फूल वैसे ही खिल रहे हैं, जैसे तुम्हारे भीतर प्रार्थनाएं उमग रही हैं। फूल इनकी प्रार्थनाएं हैं।
और यह पक्षी जो सुबह-सुबह गीत गा रहे हैं, यह भी उसके ही स्वागत का गान चल रहा है। यह सब उसी के महोत्सव का हिस्सा है। यह सारा जगत तल्लीन है उसी की प्रार्थना में, उसी की पूजा यह जो पहाड़ झुके हैं, यह उसी की नमाज में झुके हैं।और यह जो सागर तड़प रहे हैं, यह उसी की अभीप्सा में तड़प रहे हैं।
एक बार तुम्हें अपने भीतर के स्वर का बोध हो जाए, तुम्हें सारा जगत उसी के नाद से भरा हुआ मालूम पड़ेगा। हर वीणा पर तुम उसकी धुन सुनोगे। हर बांसुरी में तुम उसी का गीत सुनोगे। हर बांसुरी बजाने वाला कन्हैया हो जाएगा। और जब तक ऐसा न हो जाए, तब तक समझना--चूकते रहे, चूकते रहे, खोते रहे, खोते रहे।
दिल है किधर खिंचा हुआ, महब  है किसकी याद में?
क्या कहें इसकी वजह हम, तर्क हुई नमाज क्यों?
छोटी-मोटी नमाजे फिर छूट जाती है। जब बड़ी नमाज घटती है, जब उसकी याद घटती है, तो फिर कौन फिकर करता है कि मंदिर गए, गुरुद्वारा गए, चर्च गए, कहां गए--कौन फिकर करता है? गए या नहीं गए, यह भी कौन फिकर करता है?
एक सूफी फकीर जिंदगी भर मस्जिद जाकर पांचों बार नमाज पढ़ता रहा। कभी नहीं चूका। गांव नहीं छोड़ा उसने कभी कि कहीं दूसरे गांव जाऊं और मस्जिद न हो। सत्तर साल! गांव आदी ही हो गया था उसको मस्जिद में देखने का। बीमार हो तो भी जाता था। एक बार तो इतना बीमार था कि लोग उसे उठाकर ले गए--चल भी नहीं सकता था। लेकिन एक दिन सुबह वह मस्जिद नहीं पहुंचा; तो निष्कर्ष स्वाभाविक था कि गांव के लोगों ने समझा कि बूढ़ा रात मर गया। और तो बात हो ही नहीं सकती, जिंदा होता तो तो आता ही। मर ही गया होगा! तो सारे उसके झोपड़े पर गए। और वह क्या कर रहा था, मालूम है? मरा नहीं था। सच तो यह है, इतनी जिंदगी कभी किसी ने उसमें देखी नहीं, इतना जिंदा था! अपनी खंजड़ी बजा रहा था--वृक्ष के नीचे बैठकर--सूरज ऊग रहा था, पक्षी गीत गा रहे थे, वह अपनी खंजड़ी बजा रहा था। जैसे पक्षियों के गीत को ताल दे रहा हो। और ऐसा मस्त था और ऐसा डोल रहा था और आनंद के आंसू बह रहे थे। गांव के लोगों ने कहा कि अब मरते वक्त काफिर हो गए! यह क्या कुफ्र? आज मस्जिद क्यों नहीं आए, नमाज क्यों चूकी? उसने कहा, जब तक नमाज नहीं आती थी तब तक मस्जिद आता था, अब नमाज आ गयी। अब अपने से क्या फायदा? जब पीठ सीख लिया तो अब पाठशाला क्यों जाऊं? तुमसे सच कहता हूं, उस बूढ़े फकीर ने कहा, कि आज नमाज पैदा हुई है! आज प्रार्थना पैदा हुई है! अब कहां जाना, कहां आना? अब जहां हूं वहीं मस्जिद है।
दिल है किधर खिंचा हुआ, महब है किसकी याद में?
क्या कहें इसकी वजह हम, तर्क हुई नमाज क्यों?
नमाज क्यों छूट गयी इसकी वजह हम कैसे कहें? कौन समझेगा? इसीलिए छूट गयी कि नमाज पूरी हो गयी। ध्यान जब पूर्ण होता है तो छूट जाता है। ध्यान की पूर्णता ही समाधि है। जब ध्यान की जरूरत नहीं रह जाती, तब समाधि है। प्रेम जब पूर्ण होता है, तो मौन हो जाता है। कहने योग्य कुछ बचता नहीं। और जो है, अकथ्य है, अव्याख्य है।
बेवाहा के मिलन सौं, नैन भया सुखाहाल।
दिल मन मस्त मतवल हुआ, गूंगा गहिर रसाल।।
दरिया कहते हैं, दिल ही मस्त नहीं हुआ, मन भी मस्त हुआ। मन जरा मुश्किल से मस्त होता है! मस्त होना मन की आदत नहीं। लेकिन मन को भी मस्त होना पड़ता है जब दिल मस्त हो जाता है। मन यानी मस्तिष्क। दिल यानी हृदय। हृदय के लिए तो मस्त होना सरल है। मस्तिष्क के लिए मस्त होना कठिन है। क्योंकि मस्तिष्क है गणित, तर्क, विचार, हिसाब-किताब की दुनिया। हृदय तो मस्त हो जाता है बड़ी आसानी से। लेकिन दरिया ठीक कहते हैं, जब तक हृदय के साथ-साथ मन भी मस्त न हो जाए तब तक समझना कि मस्ती अभी अधूरी है, खंडित है। आधा-आधा हुआ। एक हिस्सा अभी अछूता रह गया, भींगा नहीं। यह वर्षा पूरी नहीं हुई। भींगना तो पूरा होना चाहिए। और ऐसा होता है। अगर हृदय पूरा डूब जाए मस्ती में, तो हृदय की मस्ती बह-बहकर मन को भी मस्त कर देती है। यह अपूर्व क्रांति है, जब मन भी मस्त हो जाता है। जब मन भी मस्ती के गीत गाता है। जब मन का गणित और तर्क भी मस्ती की सेवा में संलग्न हो जाता है। दिल मन मस्त मतवल हुआ...मतवाला हो गया। समग्रता तुम्हारी एक मतवालापन गयी।...गूंगा गहिर रसाल। और ऐसा स्वाद पाया,ऐसी शराब पी कि अब हाल गूंगे की हो गयी है। कह नहीं सकते क्या पिया? कह नहीं सकते क्या चखा? कह नहीं सकते क्या हुआ? गूंगा गहिर रसाल। रस तो बहुत हुआ है, अगर बड़ी गहनता हो गयी है गूंगेपन की, बोलते नहीं बनता।
प्राण, हमारी मधुर रागिनी जबत्तब गमनागम में;
गाओ प्रिय, फूले न समाओ यहां अगाध-अगम में।
आज कहीं से ज्योति आ बसी इन पलकों के भीतर;
समझ गई सब भेद पुतलियां अपने में, प्रियतम में।
फूटी कनकाभा, तो उड़कर डाली पर आ बैठे;
पड़े-पड़े अब सिहरो भोले, आज निविड़तम तम में।
वन-वन फूल चुनोगे तुम, तो कांटे किसे चुभेंगे?
जान-जान यों मेरे मोहन, खोए से विभ्रम में,
जोड़-जोड़ खर के तिनके मैं बैठा सुख दुख गाने,
प्रथम-प्रथम ही चंचु खुली थी, पहुंच गई पंचम में।
एक क्षण में हो जाती है ऐसी घटना कि बूंद सागर हो जाती है।
प्रथम-प्रथम ही चंचु खुली थी, पहुंच गई पंचम में।
प्राण, हमारी मधुर रागिनी जबत्तब गमनागम में;
गाओ प्रिय, फूले न समाओ यहां अगाध-अगम में।
आज कहीं से ज्योति आ बसी इन पलकों के भीतर,
समझ गई सब भेद पुतलियां अपने में, प्रियतम में।
ऐसी वर्षा होती अमृत की कि कहो तो कैसा कहो? बताओ तो कैसे बताओ? जिन्होंने जाना है, उन्होंने दूसरों के हाथ पकड़े और कहा, चलो हमारे साथ, तुम भी जान लोग तुम भी पी लो, और कोई उपाय नहीं है। इस संबंध का नाम ही शिष्यत्व है। जिसने जाना है, वह तुम्हारा हाथ पकड़ ले और ले चले तुम्हें उस दिशा में जो अवक्तव्य है, अनिर्वचनीय है। इसीलिए श्रद्धा के बिना शिष्यत्व नहीं घट सकता।
श्रद्धा का अर्थ समझते हो?
किसी ने जाना है, और जिसने जाना है वह बता भी नहीं सकता कि क्या जाना है, कह भी नहीं सकता कि क्या जाना है, प्रमाणित भी नहीं कर सकता कि क्या जाना है। ऐसे आदमी का हाथ पकड़ लेना मस्तों को ही काम हो सकता है, दीवानों का काम हो सकता है। और ऐसे आदमी के साथ ज्ञात को छोड़कर अज्ञात की यात्रा पर निकलना, जाने-माने तट को छोड़ना और उसकी नौका में बैठना और पता नहीं दूसरा किनारा हो या न हो, साहसी का, दुस्साहसी का ही काम हो सकता है! धर्म कायरों की बात नहीं है।
और अक्सर उलटा हो रहा है। मंदिरों में, मस्जिदों में तुम कायरों को इकट्ठा देखोगे। धर्म तो साहसियों की, दुस्साहसियों की बात है। धर्म भय से पैदा नहीं होता। और तुम्हारा तथाकथित भगवान तो सिर्फ भय का ही निर्माण है। असली भगवान भय से पैदा नहीं होता; असली भगवान तो अभय की यात्रा का अनुभव है।
श्रद्धालु से बड़ा इस जगत में कोई निर्भय व्यक्ति नहीं है। क्योंकि चल पड़ता है। अनजाने मार्गों पर, किसी पर भरोसा करके। और ऐसे व्यक्ति पर भरोसा करना है जो बिलकुल गूंगा है। जो सैनी-सैनी तो करता है, मगर कुछ बोलता नहीं। इसके पीछे जाने की हिम्मत केवल उनमें हो सकती है जो इसकी आंखों में झांकें, जो इसके पास आएं, जो इसके आसपास की तरंगों से आंदोलित होना सीखे। इसकी तरंगें ही समझा सकती हैं। इसका अस्तित्व ही तुम्हारे भीतर पुकार दे सकता है।
चांदनी अब की नई ही, है नई ही माधुरी!
राग के दीपक जले रे, प्रेम की जगमग पुरी!
आज के यह दिन सनम घर-घर पपीहा बोलता!
दूर मधु-मुरली बजी, वन-वन वियोगी डोलता!
यह अजब संध्या हुई, शंका हुई कि प्रभात है!
अब गजब की रात है कि दिया जले तो प्रात है!
गुल बनूं, बुलबुल बनूं, कोयल बनूं कि चकोर रे?
यह घटा नहीं भोर रे अलि, नाचता मन-मोर रे!
यह निशा, ऐसा नशा, अपनी दिशा मीरा चले।
रंग लाई है हिना, कुछ मन चले, कुछ दिल जले!
रंग ही कुछ और है वह जब फकीरा व्यस्त हो!
जग उदय या मस्त हो, धुन में कबीरा मस्त हो!
माघ में फागुन लगे, रिमझिम सनम, बरसात हो!
चांदनी इस पर लगी, पतझाड़ में फल-पात हो!
यह अनूठी चांदनी जो कर दे, जो कर न ले!
है छलकती गागरी, जो भर दे, जो भर न ले!
रंग क्या, अलि, राह में कब से खिले ये फूल है!
ढंग क्या, कहना किसी के पांव की ये धूल हैं!
धूल भी कुछ और ही ये, रत्न का अभिमान है!
है अभी देखा न जलवा, योगिनी नादान है!
शिष्य तो नादान है। उसे तो कुछ पता नहीं। और गुरु की वाणी अटपटी है। उलट-बांसुरी है। क्योंकि वह जो कहना चाहता है, किसी और लोक की बात है, इस लोक की भाषा में बंधती नहीं, अटती नहीं। वह किसी ऐसे लोक की बात है कि उसे इस लोक तक खींच-खींचकर लाओ, मर जाता है।
जैसे तुम हवाओं को पेटियों में बंद नहीं कर सकते। और न सूरज की किरण को झोलियों में बंद रख सकते हो। ऐसे ही बात है। आकाश को मुट्ठी में बंद नहीं कर सकते हो, ऐसी ही बात है। और जब घटना घटती है, तो एक तरफ तो आदमी बिलकुल गूंगा हो जाता है और एक तरफा बड़ी गुनगुन पैदा होती है। मगर गुनगुन भी बेबूझ होती है। गुल बनूं, बुलबुल बनूं, कोयल बनूं कि चकोर रे?...समझ में नहीं आता कि क्या करूं? फूल बनकर प्रकट कर दूं,बुलबुल बनकर गा दूं, कोयल बनूं-कू-कू करके शायद खबर पहुंच जो--कि चकोर बनूं?
गुल बनूं, बुलबुल बनूं, कोयल बनूं कि चकोर रे?
यह घटा की भोर रे अलि, नाचता मन-मोर रे!
यह निशा, ऐसा नशा, अपनी दिशा मीरा चले!
रंग लाई है हिना, कुछ मन चले, कुछ दिल जले!
अदभुत घटा है। मीरा नाचे? नाचकर कहे? गाकर कहे? और मीरा नाची भी खूब और मीरा गायी भी खूब, फिर भी जो अनकहा था, अनकहा है।
कहते है दरिया, दरिया कहै सब्द निरबाना...मगर कहां कह पाते हैं! बस गूंगे के इशारे।
रंग ही कुछ और है वह जब फकीरा व्यस्त हो!
जग उदय या मस्त हो, धुन में कबीरा मस्त हो!
माघ में फागुन लगे, रिमझिम समन, बरसात हो!
चांदनी इस पर लगी, पतझाड़ में फल-पात हो!
सब ऐसा उल्टा हो जाता है। इस जगत के नियम उस जगत के विपरीत हैं। उस जगत के नियम, उस जगत का गणित, उस जगत का तर्क इस जगत के विपरीत है। इसलिए अनुवाद नहीं हो सकता, भाषांतर नहीं हो सकता। हिंदू से अंग्रेजी करना आसान, अंग्रेजी से जापानी करना आसान, जापानी से रूसी करना आसान--अनुवाद हो सकते हैं, यद्यपि इनमें भी बड़ी कठिनाइयां होती हैं। लेकिन, उस मस्त के लोक की अनुभूति को इस दीन और दरिद्र मनुष्य के मनोविज्ञान में अनुवाद करना बहुत कठिन। उस प्रकाश के लोक को अंधों की भाषा मग अनुवादित करना बहुत कठिन। कठिन ही नहीं, असंभव।
आज के यह ये दिन सनम, घर-घर पपीहा बोलता!
दूर मधु-मुरली बजी, वन-वन वियोगी डोलता!
यह अजब संध्या हुई, शंका हुई कि प्रभात है!
अब गजब की रात है कि दिया जले तो प्रात है!
मगर जब घटती है, तो हालांकि गूंगा हो जाता है जिसे घटती है, मगर उसके गूंगेपन में भी बड़ी मुखरता है। वह नाचता है, गाता है, पुकारता है, चिल्लाता है। और जिनके पास थोड़ी भी समझ है, जिनके पास रत्ती भर भी बुद्धिमत्ता है, वह जरूर देख लेते हैं कि मिल गया इसे कुछ, कोई हीरा मिल गया है उसे जो कह नहीं पा रहा है।
यह अनूठी चांदनी जो कर न दे, जो कर न ले!
है छलकती गागरी, जो भर न दे, जो भर न ले!
रंग क्या, अलि, राह में कब से खिले ये फूल हैं!
ढंग क्या, कहना, किसी के पांव की ये धूल हैं!
और फिर भी यह जो सारी मस्ती है, यह जो सारा सागर उतर रहा है मधु का मदमाता, यह कुछ भी नहीं है; उस परमप्रिय के चरणों की धूल है। लेकिन उस जगत की धूल भी यहां के हीरे-मोतियों से ज्यादा बहुमूल्य है।
धूल भी कुछ और ही ये, रत्न का अभिमान है!
है अभी देखा न जलवा, योगिनी नादान है!
वह जो शिष्य है, उसने तो अभी देखा नहीं जलवा, जलवे की बातें कैसे समझे? इसलिए श्रद्धा। इसलिए भरोसा। जिस पर श्रद्धा आ जाए, उसके पीछे गल जाना। भटकना हो तो कोई फिकर नहीं, और भूल-चूक भी हो जाए तो घबड़ाना मत, बिना भूल-चूक के कोई सत्य के द्वार तक कभी पहुंचा भी नहीं है। बहुत होशियारी न करना। मेरे पास आकर लोग पूछते हैं, हम सदगुरु की पहचान कैसे करें? मैं उनसे कहता हूं, चलो; जिससे प्रेम लग जाए, उसके पीछे चलो! अगर सदगुरु हुआ तो ठीक है, अगर सदगुरु हुआ, तो सदगुरु को पहचानने के कुछ उपाय हाथ लगेंगे--कि असदगुरु कौन है, यह समझ में आ जाएगा। पहले से यह बैठकर सोचोगे, कौन सदगुरु, कौन असदगुरु, कभी जान न पाओगे। यह बातें जानने की हैं। जिससे प्रेम लग जाए, चल पड़ो। असदगुरु होगा, तो भी धन्यवाद देना कि चलो इतना तो समझ मग आया कि असदगुरु कौन होता है! यह भी काफी है । पचास प्रतिशत काम पूरा हो गया। अब असदगुरु की पहचान हो गयी तो सदगुरु की पहचान ज्यादा दूर नहीं है। जिसने अंधेरे को अंधेरे की तरह जान लिया, रोशनी की तरफ कदम उठा गया। और जिसने असत्य को असत्य की तरह पहचान लिया, अब सत्य ज्यादा दूर नहीं है।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम, सोइ संत बिबेकी दास।।
यह ऐसी मस्ती की बातें हैं कि बस एक ही बात काम आ सकती है: श्रद्धा। भजन भरोसा एक बल। यहां तो एक ही बल है कि नाचते हुए कबीर के साथ नाचना, गाती मीरा के साथ गाना, गुनगुनाते दरिया के साथ गुनगुनाना। भजन भरोसा एक बल, यह भजन तुम्हें पकड़ता रहे, पकड़ता रहे, डूबते जाओ तुम, डूबते जाओ, डूबते जाओ, बस एक दिन यही तुम्हारा बल हो जाएगा, क्योंकि यही तुम्हारा अनुभव हो जाएगा। मीरा के साथ नाचते-नाचते एक दिन तुम भी जान लोगे कि किस बांसुरी की धुन को सुनकर मीरा नाच रही। वह बांसुरी की धुन तुम भी मीरा की तरह नाचोगे तो सुनायी पड़ेगी। कबीर के साथ मस्त होते-होते एक दिन तुम्हें समझ में आ जाएगा कि कबीर को कौन सा स्रोत मिल गया है जिसके कारण ऐसी मस्ती है। और वह स्रोत तुम्हारे भीतर भी है। सिर्फ बोध की बात है।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
उस परम सत्य की खोज में तो श्रद्धा ही एकमात्र आशा है। और जिनके जीवन में श्रद्धा नहीं, उनके जीवन की कुल निष्पत्ति निराशा होगी और कुछ भी नहीं। वे व्यर्थ के ठीकरे जोड़ने में ही जिंदगी को बिता देंगे।
दहर में क्या-क्या हुई हैं इनकलाबाते-अजीम।
आस्मां बदला, जमीं बदली, न बदली खूए-दोस्त।।
इस दुनिया में सब बदलता रहा है, सिर्फ उस परम प्यारे के ढंग नहीं बदते हैं। उस प्यारे दोस्त की आदतें नहीं बदती हैं। वह अभी भी भजन से रीझ जाता है। वह अभी भी नाचने वालों के साथ नाचने लगता है।
दहर में क्या-क्या हुई हैं इनकलाबाते-अजीम...
जमीन पर कितनी क्रांतियां हो गयी, कितनी चीजें बदल गयी, सब बदल गया; अब न वे लोग हैं, न वे ढंग हैं, न व्यवस्थाएं हैं; बैलगाड़ियां कहां पहुंच गयी, चांदत्तारों की यात्रा करने वाले अंतरिक्षयान बन गए; छोटे-मोटे पत्थर के औजार कहां पहुंच गए, एटम और हाइड्रोजन बम बन गए; आदमी ने और बदल डाला है, जिंदगी में अब कुछ भी वैसा नहीं है जैसा बुद्ध के दिनों में था, या महावीर के दिनों में, या कृष्ण के दिनों में, या जरथुस्त्र के दिनों में, या लाओत्सू के दिनों में, अब वैसा कुछ भी नहीं है। लाओत्सू ने लिखा कि मेरे गांव में पास ही नदी बहती थी, नदी के उस पर कोई गांव है, यह हमें मालूम, क्योंकि रात के सन्नाटे में जब उस गांव के कुत्ते भौंकते थे तो हमें सुनाई पड़ते थे। और कभी सांझ जब उस गांव के चूल्हे जलते थे और आकाश में धुआं उठता था तो हमें पता चलता था। मगर हमारे गांव से कोई आदमी नदी पार करके उस गांव को देखने कभी नहीं गया था। एक जमाना यह था।!
अब जमाना यह है कि जमीन छोटी पड़ गयी--चौबीस घंटे में चक्कर मार लो! अब जमाना यह है कि आदमी के पैर चांदत्तारों पर पहुंच रहे हैं। सब बदल गया।
दहर में क्या-क्या हुए हैं इनकलाबाते-अजीम।
आस्मां बदला, जमीन बदली, न बदली खूए-दोस्त।।
सिर्फ उस परमप्रिय मित्र का स्वभाव नहीं बदला है। तो अभी भी तुम अगर घूंघर बांध लोगे पैर में--पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे--तो तुम उसे अभी भी राजी कर सकते हो। अभी भी तुम कृष्ण की बांसुरी बजाने लगोगे तो बंधा चला आएगा। प्रेम के कच्चे धागे में अभी भी वह बंधा चला आता है।
इस जग के परिवर्तनशील प्रवाह में एक परमात्मा ही अपरिवर्तित है, शाश्वत है, जैसे का तैसा है।
शाद यूं ही अहलेशक शक में पड़े रह जाएंगे।
हम इन्हीं आंखों से इक दिन देख लेंगे रूए-दोस्त।।
और जो संदेह में पड़े, वे संदेह में ही पड़े रह जाएंगे। शाद यूं ही अहले-शक शक में पड़े रह जाएंगे...वे जो बड़े बुद्धिमान बने बैठे हैं और बड़े संदेह में घिरे बैठे हैं और बड़े प्रश्नचिंह जिन्होंने अपनी आत्मा में लगा रखे हैं, वे समझदारी में ही डूब जाएंगे। उनकी मौत किनारों पर ही हो जोगी। वे मझधारों में डूबने के मजे न ले पाएंगे। और खयाल रखना, किनारे पर जो मरता है, बुरी तरह मरता है, कुत्ते की मौत मरता है। मझधारों में जो डूबता है, वह मरता ही नहीं, वह अमृत को उपलब्ध होता है।
शाद यूं ही अहले-शक शक में पड़े रह जाएंगे।
हम इन्हीं आंखों से इक दिन देख लेंगे रूए-दोस्त।।
लेकिन जिनके पास श्रद्धा की आंखें हैं, वे एक दिन उस परमात्मा को जरूर देख लेते हैं। यह शाश्वत नियम है। श्रद्धा उसे देखने का द्वार है। श्रद्धा को आंजो आंखों में, श्रद्धा का काजल बनाओ।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।।
दरिया कहते हैं, मैं तो उसी को विवेकवान कहता हूं, उसकी को बुद्धिमान कहता हूं, जिसके समझ में यह बात गयी। प्रीति। प्रतीति इस नाम पर, जिसका प्रेम उस एक के लिए है--एक ओंकार सतनाम--और जिसकी प्रतीति बस उस एक को ही खोज रही है, जिसकी अनुभूति, उसको ही मैं कहता हूं: सोइ संत बिबेकी दास। वही संत है, वही विवेक को उपलब्ध है।
ऐ शाद! और कुछ न मिला जब बराए-नज्र।
शरमिंदगी को ले के चले बारगाह में।।
हमारे पास है भी क्या जो हम परमात्मा को भेंट करने ले जाएं?
ऐ शाद! और कुछ न मिला जब बराए-नज्र...
ईश्वर को भेंट करने के लिए जब कुछ और न मिला...है क्या? हमारे तर्क थोथे, हमारे गणित व्यर्थ के, हमारा ऊहापोह सिर्फ उलझनें बढ़ाता है। कोई चीज सुलझती नहीं।
ऐ शाद! और कुछ न मिला जब बराए-नज्र।
शरमिंदगी को ले के चले बारगाह में।।
तो फिर उसके मंदिर में, ईश्वर के मंदिर में और क्या ले कर जाएं? अपनी बेबसी, अपनी शघमदगी, अपनी दीनता, अपना ना कुछ होना, अपना खाली पात्र लेकर ही चले। इतनी श्रद्धालु की ही हो सकती है कि खाली पात्र लेकर जाए। नहीं तो लोग ज्ञान लेकर जाते हैं, शास्त्र लेकर जाते हैं। श्रद्धालु खाली पात्र लेकर जाता है। और है भी क्या हमारे पास? आत्मा का खाली पात्र। और जिसने आत्मा का खाली पात्र उसके चरणों में रख दिया, वह भर गया है, भर दिया गया है। और तो सब बदल गया इस दुनिया में--
दहर में क्या-क्या हुए हैं इनकलाबाते-अजीम।
आस्मां बदला, जमी बदली, न बदली खूए-दोस्त।।
--बस उसका स्वभाव नहीं बदला है। जो शून्य होने को राजी है उसकी श्रद्धा में, वह पूर्ण हो जाता है।
हैज खुसबोई पास में, जानि परै नहिं सोय। और मजा यह है, विडंबना यह है कि जिसे हम खोज रहे हैं, वह बहुत पास है; जिस सुगंध की तलाश में हम चले हैं, वह हमारे भीतर है। कस्तूरी कुंडल बसै। और पागल हो जाता है कस्तूरा, और खोजता फिरता है जंगल में, भागता फिरता है दीवाने की तरह--उस कस्तूरी को जो उसके नाफे में है और जो गंध उसके भीतर से आ रही है।
सौंदर्य तुम्हारे भीतर। सत्य तुम्हारे भीतर। सच्चिदानंद तुम्हारे भीतर। तुम उससे आए हो, तुम उसके अंश हो, वह तुम्हारे भीतर आज भी छिपा है उतना ही। जरा बीज टूटे, जरा अहंकार टूटे। मगर यह अनुभवसिद्ध बात है कि जो चीज जितनी निकट हो, उतनी ही भूल जाती है। दूर की चीजें याद आती हैं।
तुमने मनुष्य का मन समझा?
जो पास होता है, स्मरण नहीं आता। जो दूर चला जाता है, स्मरण आता है। जो तुम्हारे पास है, उसमें तुम्हें कुछ मजा नहीं आता। जो दूसरे के पास है, उसमें तुम्हीं बड़ी वासना जगती है। और ऐसा नहीं है कि तुम्हें मिल जाएगा तो तुम बड़े आनंदित होओगे। दो-चार दिन रहेगा नए-नए मिलने का, बस फिर फीका हो जाता है। सुंदर से सुंदर स्त्री तुम्हारी पत्नी होकर फीकी हो जाती है। सुंदर से सुंदर पुरुष तुम्हारा पति होकर फीका हो जाता है। बड़े से बड़ा भवन मिलते ही व्यर्थ हो जाता है।
है खुसबोई पास में, जानि परै नहिं सोय।
परमात्मा इतने पास है, इसीलिए समझ में नहीं आ रहा है।
इंसान की बदबख्ती अंदाज बाहर है।
कम्बख्त खुदा होकर, बंदा नजर आता है।।
भरम लगे भटकत फिरे, तिरथ बरत सब कोय।। और एक ही भ्रम है दुनिया में कि हम जिसे खोजने चले हैं, वह हमारे भीतर है। हम सब कस्तूरे हैं। कस्तूरी मृग। सुवास भीतर और चले खोजने बाहर। एक ही भ्रम है जगत में, एक ही माया है कि जो भीतर है, उसे तुम बाहर खोजने चले हो। जो तुम्हें मिला ही है, उसे खोने चले हो। जो तुम्हें मिला ही है, उसे कितना ही खोजो कैसे खोज पाओगे? खोजे छुटे तो मिलन हो। दौड़ बंद हो तो मिलन हो। बैठे रहो तो मिल जाए। आंख बंद करो तो पा लो।
जंगम जोगी सेवड़ा, पड़े काल के हाथ।
कह दरिया सोइ बाचि है, सतनाम के साथ।।
और कितनी खोज चल रही है! हठयोगी हैं, शरीर को जला रहे हैं, तपा रहे हैं। कांटों पर सोए हैं, सिर के बल खड़े हैं। कोई हैं कि खड़े ही हैं वर्षों से। किसी ने कसम खा ली है आंख बंद न करेंगे। उन्होंने आंख की पलकें उखाड़ डाली हैं। किसी ने मुंह में भाले छेद लिए हैं। क्या-क्या मूढ़ताएं लोग कर रहे हैं? इसके तुम योग कहते हो। इससे अहंकार और भरता है, सघन है, दूरी और बड़ी हो जाती है।
जंगम जोगी सेवड़ा...
सेवड़ा कहते हैं जैन-मुनि को। बड़े व्रत-उपवास। बड़ा शरीर को सताना-गलाना। दरिया कहते हैं, जंगम जोगी सेवड़ा, पड़े काल के हाथ, यह सब मृत्यु के साथ में पड़ जाएंगे। इनका किया हुआ कुछ काम में आने वाला नहीं है। क्योंकि हर की हुई बात अहंकार को ही मजबूत करती है। मैं करने वाला! मैं मजबूत होता है। मैं कर्ता। मैंने इतने उपवास किए। तुम्हें पता है, जैन-मुनियों की हर साल डायरी प्रकाशित होती है, उन्होंने कितने उपवास किए, किसने कितने किए? हिसाब! उपवास का भी हिसाब रख रहे हो! दुकानदारी जाती ही नहीं। यह सज्जन पहले दुकान पर खाता-बाही रखते रहे होंगे, अब मुनि हो गए हैं, अब भी खाता-बाही रखते हैं। अगर कभी परमात्मा से इनका मिलना हो जाएगा तो खाता-बही खोलकर बैठ जाएंगे कि देखो, इतना किया, इतना किया, इतना किया, इसका लाभ चाहिए--ब्याज सहित लाभ चाहिए! यह कोई ढंग हैं परमात्मा से जुड़ने का?
यह प्रेम का रास्ता नहीं है, प्रेम खाते-बही नहीं रखता। और प्रेम अपने कृत्य पर भरोसा ही नहीं करता। प्रेम तो समर्पण जानता है। प्रेम तो कहता है: तू जो करेगा, वह होगा; मेरे किए क्या होता है? और अगर कभी मैंने कभी उपवास किया, तो तूने करवाया था। और ध्यान रखना, प्रेम का इतना साहस है कि प्रेम कहता है: पुण्य भी तेरे और पाप भी तेरे! तूने जो करवाया, वह किया। तेरे अतिरिक्त कोई और नहीं। मैं हूं ही नहीं। बुरा करवाना हो, बुरा करवा ले, भला करवाना हो, भला करवा ले। तू मालिक है। लेकिन लोग लगे हैं अपने-अपने कृत्यों में। ढंग-ढंग के करतब! ढंग-ढंग के यत्न! बड़ी-बड़ी साधनाएं! और परिणाम? वही छोटा अहंकार।
खुदा बुरा करे इस नींद का यह कैसी नींद?
खुली कब आंख कि, जब कारवां रवाना हुआ।।
मरते वक्त इनकी नींद खुलेगी। मगर तब देर बहुत हो चुकी होगी। जब मौत इनकी गर्दन दबोचेगी तब इनको पता चलेगा कि गए, सब उपवास, सब व्रत, सब नियम, सब योग-ध्यानत्तप, सब गया! उस क्षण तो समर्पण काम आएगा; समर्पण तो जिंदगी में कभी साधा नहीं।
खुदा बुरा करे इस नींद का यह कैसी नींद?
खुली कब आंख कि, जब कारवां रवाना हुआ।।
जागो! कारवां रवाना हो, इसके पहले जागो! मौत द्वार खटखटाए, इसके पहले तैयार हो जाओ। अमृत का थोड़ा स्वाद ले लो, बस वही तैयारी है।
न पूछ हाल मेरा चोबे-खुश्के-सहरा हूं।
लगा के आग मुझे कारवां रवाना हुआ।।
नहीं तो तुम्हारी हालत वैसी ही होगी जैसे कारवां कहीं ठहरता है रास्ते में जंगल में, तो जंगल की लकड़ियां बीनकर यात्रीदल के लोग आग जला लेते, रोटी पका लेते, फिर चल देते हैं। लेकिन वहीं पड़ रह जाती हैं, राख के ढेर वही पड़े रह जाते हैं। कहीं ऐसा ही न हो कि तुम्हारी बस जंगल में जलायी गयी लकड़ियों की तरह ही पड़ी रह जाए और कारवां रवाना हो जाए।
न पूछ हाल मेरा चोबे-खुश्के-सहरा हूं...
जली-जलायी जंगल की लकड़ी हूं।
न पूछा हाल मेरा चोबे-खुश्के-सहरा हूं।
लगा के आग मुझे कारवां रवाना हुआ।
यह जिंदगी का कारवां तो बढ़ता जाएगा, यह दूसरे जंगलों में ठहरेगा, दूसरे मकानों में वास करेगा, दूसरी देहों में प्रवेश करेगा, दूसरे गर्भों में जन्म लेगा और तुम्हारी यह लाश यही पड़ी रह जाएगी। और इस शरीर से तुमने जो किया था, वह भी यही पड़ा रह जाएगा--शरीर का किया हुआ शरीर के साथ ही पड़ा रह जाएगा। तुम सिर के बल खड़े रहे थे, तुमने शीर्षासन किया था, माना, लेकिन शीर्षासन करने वाले का शरीर भी यही पड़ा रह जाएगा। जो सुंदर-मुलायम बिस्तरों पर सोता था उसका शरीर भी यही पड़ा रह जाएगा और जो कांटों पर सोता था उसका शरीर भी यही पड़ा रह जाएगा। शरीर ही पड़ा रह जाएगा तो शरीर के द्वारा किए गए कृत्य भी सब व्यर्थ गए! कुछ ऐसा करो जो आत्मा में हो। कुछ ऐसा करो जो चैतन्य को प्रज्वलित करे। क्योंकि देह तो पड़ी रह जाएगी, देह के कृत्य पड़े रह जाएंगे, चेतना का पक्षी उड़ जाएगा। वह हंस जो तुम्हारे भीतर है, कुछ उसे जगाओ, तो कुछ काम का है! और वह एक ही तरह से जगता है--परमात्मा की प्यास से, प्रार्थना से।
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।।
जंगम जोगी सेवड़ा, पड़े काल के साथ।।
कह दरिया सोइ बाचिहै, सत्तनाम के साथ।।
क्या तुम व्यर्थ की बातों मग लगे हो! तुम्हारी हालत ऐसी है, जैसे--
हमेशा झाड़ते हैं गर्दे-पैरहन गाफिल!
नहीं समझते कि है जेरे-पैरहन मिट्टी।।
कुछ लोग हैं जो अपने कपड़ों की मिट्टी ही झाड़ने में लगे रहते हैं, धूल झाड़ने में लगे रहते हैं और भूल ही जाते हैं कि कपड़ों के भीतर जो देह है, वह भी मिट्टी है। कुछ, लोग इसी में लगे रहते हैं--पानी छानकर पीओ, कि भोजन ऐसा पकाओ, कि यह खाओ,कि यह न खाओ कि रात न खाओ, कि दिन खाओ, कि मांगकर खाओ। यह सब कपड़ों की धूल झाड़ रहे हो। और यह बाहर-बाहर के कृत्यों में लगे हो।
और बड़े मजे की चीजें खोज ली हैं!
जैन-मुनि खड़े होकर भोजन करता है, बैठकर नहीं। क्या पागल हो गए हो! दिगंबर जैन-मुनि खड़े होकर भोजन लेता है। खड़े होकर भोजन लो कि बैठकर--और मैं ऐसे सज्जनों को भी जानता हूं जो झूले पर लेटकर भोजन लेते हैं--कोई फर्क नहीं पड़ता! भोजन ही लोगे, भोजन ही है। कैसे लिया--खड़े थे, बैठे थे, लेटे थे--कुछ फर्क नहीं पड़ता।
झेन फकीरों में यह मजाक बहुत चलती है।
एक झेन फकीर मरने के करीब था, आंख खोली, उसने अपने शिष्यों से पूछा कि भाई, मैं तुमसे एक बात पूछता हूं, मरने की घड़ी करीब आ गयी। तुमने कभी ऐसा सुना है कि कोई आदमी बैठे-बैठे मरा हो? शिष्यों ने कहा, बैठे-बैठे! देखा तो नहीं, मगर हमने सुना है कि कुछ फकीर बैठे-बैठे पह्मासन में मरे। तो उसने कहा, फिर जाने दो, वह बात जंचेगी नहीं कुछ। तुमने ऐसा सुना है, कोई आदमी खड़े-खड़े मरा हो? उन्होंने कहा, यह जरा दुर्गम बात हैं, कठिन बात है: मगर सुना है हमने कि कभी-कभी ऐसे फकीर भी हुए हैं कि खड़े-खड़े मरे हैं। उसने कहा, यह भी जाने दो। तुमसे मैं यह पूछता हूं, तुमने ऐसा जाना, कभी सुना कि कोई शीर्षासन करता हुआ मरा हो? शिष्य भी भौंचक्के रह गए! सुना नहीं, सोचा भी नहीं था कभी, कोई शीर्षासन करते मरे! उन्होंने कहा कि नहीं, न तो सुना है, न कभी सोचा--कल्पना भी नहीं की। तो उसने कहा, फिर यही ठीक रहेगा। अरे, जब मरना ही है तो ढंग से मरना।
वह सिर के बल खड़ा हो गया। अब वह मर गया कि जिंदा है, यह शिष्यों को समझ में न आए। सिर के बल खड़ा आदमी। उनका खयाल था, मर जाएगा तो गिर जाएगा; मगर वह खड़ा ही है। और से भी देखा, सांस भी कुछ चलती सी मालूम नहीं होती। मगर मुर्दा, और थोड़े डरे भी, तो कोई भूत-प्रेम तो नहीं हो गया, मामला क्या है? मर जाए आदमी और शीर्षासन में खड़ा रहे!
तो उन्होंने पास में ही उसकी ही एक बहिन थी, वह भी एक साध्वी थी, पास के ही आश्रम में उसको खबर भेजी, उसकी बड़ी बहिन थी। वह बड़ी बहिन आयी और उसने कहा--बदतमीज, जिंदगी भर भी उलटे-सीधे काम करता रहा और मरकर भी तुझे चैन नहीं? रस्ते पर आओ! उसकी बात सुनकर ही वह फकीर उतरा और उसने कहा कि यह मेरी बहिन को कौन यहां बुला लाया? यह मुझे चैन से मरने भी न देगी। तेरा क्या विचार है? कैसे मरूं? उसने कहा, सीधे लेट जाओ बिस्तर पर। मरने के ढंग से मरो! वह लेट गया और मर गया।
यह तो मजाक है झेन फकीरों का। यह वह मजाक कर रहे हैं उन सब पर जो इस तरह की थोथी बातों में लगे हैं। यह सब हो सकता है। खड़े होकर मर जाओ, बैठकर मर जाओ, और शीर्षासन करके मर जाओ। मगर मरना तो मरना है। बात तो कुछ ऐसी सीखो कि मरो ही न। देह मर जाए और तुम अमृत की यात्रा पर निकल जाओ।
हमेशा झाड़ते हैं गर्दे-पैरहन गाफिल
...नासमझ, बेहोश लोग बस कपड़ों की धूल झाड़ते रहते हैं और उन्हें बस बात का खयाल भी नहीं आता...
नहीं समझते कि है जेरे-पैरहन मिट्टी
कि कपड़ों के भीतर भी तो मिट्टी ही है।
और इस बाहर के खेल में लगे-लगे तुम कुछ कर लो, कुछ वस्तुतः होगा नहीं। करने की भ्रांति रहेगी, क्रांति नहीं होगी।
चार दीवारे-अनासिर को गिरायी भी तो क्या?
वही धोका है, वही है पर्दा बाकी।।
मिट्टी की दीवारों को गिरा दोगे, ईंट की दीवालों को गिरा भी दोगे तो क्या फर्क पड़ता है?
चार दीवारे-अनासिर को गिराया भी तो क्या?
वही धोखा है, वही है अभी पर्दा बाकी।।
इस शरीर को सताओ, जलाओ, परेशान करो, कांटों में लिटाओ, कोड़े मारो, आंखें फोड़ लो, कान कटवा लो, कान फड़वा लो, जो-जो करना होकर लो, कुछ भी न होगा। यह तुम मिट्ठी के साथ खेल में लगे हो। वही धोका है, वही है अभी पर्दा बाकी। अहंकार नहीं मिटेगा, अहंकार का धोखा नहीं मिटेगा, अहंकार का पर्दा नहीं मिटेगा। वह तो मिटता है केवल एक तरह से--
कह दरिया सोइ बाचिहै,
...वही बचेगा, दरिया कहते हैं...
सत्तनाम के साथ। जो परमात्मा के साथ अपने को जोड़ ले, जो उसकी नाव में सवार हो जाए। जो यह कह दे कि मैं कर्ता नहीं हूं, कर्ता तू है, मैं केवल साक्षी हूं, बस उसका नाम जुड़ गया सतनाम से। उसका हाथ परमात्मा के हाथ में पड़ गया।
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!
बांसुरी से बिछुड़ जो गया स्वर उसे
भर लिया कंठ में शून्य आकाश ने,
डाल विधवा हुई जो कि पतझार में
मांग उसकी भरी मुग्ध मधुमास ने,
हो गया कूल नाराज जिस नाव से
पा गयी प्यार वह एक मझधार का,
बुझ गया जो दिया भोर में दीन-सा
बन गया रात सम्राट अंधियार का,
जो सुबह रंक था, शाम राजा हुआ
जो लुटा आज कल फिर बसा भी वही,
एक मैं ही जिसके चरण से धरा
रोज तिल-तिल धसकती रही उम्र भर!
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!!
प्यार इतना किया जिंदगी में कि जड़
मौन तक मरघटों का मुखर कर दिया,
रूप-सौंदर्य इतना लुटाया कि हर
भिक्षु के हाथ पर चंद्रमा धर दिया,
भक्ति अनुरक्ति ऐसी मिली, सृष्टि की--
शक्ल हर एक मेरी तरह हो गयी,
जिस जगह आंख मूंदी निशा आ गयी
जिस जगह आंख खोली सुबह हो गयी,
किंतु इस राग-अनुराग की राह पर
वह न जाने रतन कौन सा खो गया
खोजती सी जिसे दूर मुझसे स्वयं
आयु मेरी खिसकती रही उम्र भर!
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!
भेष भाए न जाने तुझे कौन सा
इसलिए रोज कपड़े बदलता रहा,
किस जगह कब कहा हाथ तू थाम ले
इसलिए रोज गिरता-संभलता रहा,
कौन सी माह ले तान तेरा हृदय
इसलिए गीत गाया सभी राग का,
छेड़ दी रागिनी आंसुओं की कभी
शंख फूंका कभी क्रांति का, आग का,
किस तरह खेल क्या खेलता तू मिले
खेल खेले इसी से सभी विश्व के
कब न जाने करे याद तू इसलिए
याद कोई कसकती रही उम्र भर!
एक तेरे बिना प्राण आ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!
रोज ही रात आयी गयी, रोज ही
आंख झपकी, मगर नींद आयी नहीं,
रोज ही हर सुबह, रोज ही हर कली
खिल गयी तो मगर मुस्करायी नहीं,
नित्य ही रास ब्रज में रचा चांद ने
पर न बाजी मुरलियां कभी श्याम की,
हर तरह उर-अयोध्या बसायी गयी
याद भूली न लेकिन किसी राम की
हर जगह जिंदगी में लगी कुछ कमी
हर हंसी आंसुओं में नहाई मिली,
हर समय, हर घड़ी, भूमि से स्वर्ग तक
आग कोई दहकती रही उम्र भर
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!!
खोजता ही फिरा पर अभी तक मुझे
मिल सका कुछ न तेरा ठिकाना कही,
ज्ञान से बात की तो कहा बुद्धि ने
सत्य है वह मगर आजमाना नहीं,
धर्म के पास पहुंचा पता यह चला
मंदिरों मस्जिदों में अभी बंद है,
जोगियों ने जताया कि आप-जोग है,
भोगियों से सुना भोग-आनंद है,
किंतु पूछा गया नाम जब प्रेम से
धूल से वह लिपट फूटकर रो पड़ा,
बस तभी से व्यथा देख संसार की,
आंख मेरी छलकती रही उम्र भर!
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!!
प्राणों के प्राण से जब तक जोड़ न हो जाए तब तक बस सांस व्यर्थ ही चल रही है। तब तक हमारी सांस ऐसी ही है जैसे लुहार की धौंकनी। चल तो रही है, मगर निष्प्रयोजन। चल तो रही है, मगर व्यर्थ।
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के!
सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर!!
और हम ऐसे ही जी रहे हैं। जीने-मात्र का हमारा जीना है। जीना हमारा वास्तविक जीना नहीं; उथला-उथला है, थोथा-थोथा है। इसमें तो श्याम की मुरलियां बजे, इसमें तो राम की अयोध्या बसे--तो कुछ हो!
ठीक कहते हैं दरिया--
जंगम जोगी सेवड़ा पड़े काल के हाथ।
कह दरिया सोइ बाचिहै, सत्तनाम के साथ।।
वही बचेगा जिसने परमात्मा को अपना हाथ दे दिया और जिसने परमात्मा का हाथ अपने हाथ में ले लिया। परमात्मा के अतिरिक्त और कोई तारनहार नहीं। परमात्मा के अतिरिक्त और कोई खिवैया नहीं। मगर कहां परमात्मा को खोजें? उसके हाथ दिखायी पड़ते। उसकी नाव का कुछ पता नहीं चलता। मंदिर-मस्जिद खाल पड़े हैं। पंडित-पुरोहित थोथी बकवास कर रहे हैं, शास्त्रों के उद्वाहरण दे रहे हैं--तोते हो गए हैं। कहां उसे खोजें?
दरिया कहते हैं--
बारिधि अगम अथाह जल...
गहन सागर है, विस्तीर्ण सागर है, बारिधि अगर अथाह जल, थाह न मिले ऐसा जल है...
बोहित बिनु किमि पार। और ठीक-ठीक नाव न मिले, जहाज न मिले, तो कैसे पार होंगे?
कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मझधार।।
जब तक खेनेवाला गुरु न मिल जाए तब तक मझधार में कहीं न कहीं डूबना पड़ेगा--डूब ही रहे हैं। परमात्मा के हाथ तो दिखायी नहीं पड़ते लेकिन किसी सदगुरु के हाथ दिखायी पड़ सकते हैं। अज्ञानी मनुष्य और परमात्मा के बीच एक पड़ाव है सदगुरु का। सदगुरु ऐसा है कि उसका एक पैर पृथ्वी पर और एक आकाश पर। सदगुरु ऐसा है। कि एक हाथ तुम्हारे हाथ में और एक परमात्मा के हाथ में। सदगुरु सेतु बन जाता है। परमात्मा को जो खोजने चलेंगे वे नास्तिक हो जाएंगे। क्योंकि न मिलेगा, कहीं, न प्रमाण पाया जाएगा कहीं। जो परमात्मा को खोजने चलेंगे बिना गुरु के, नास्तिकता उनकी नियति है।
पश्चिम नास्तिक हो गया, कारण यही है कि सदगुरु का सेतु पश्चिम में कभी बना नहीं। पूरब अब भी थोड़ा टिमटिमाता-टिमटिमाता आस्तिक है। बुझ जाएगा कब यह दिया, कहा नहीं जा सकता, हवाएं तेज हैं, आंधियां उठी हैं। चीन डूब गया नास्तिकता में, भारत के द्वार पर नास्तिकता आंधियों और बवंडरों की तरह उठ रही है। यह देश भी कभी नास्तिक हो जाएगा। अधिक लोग तो नास्तिक हो ही गए हैं--सिर्फ उनको पता नहीं है। अधिक लोग तो नास्तिक हैं ही--धर्म उनकी औपचारिकता मात्र है। मगर फिर भी एक दिया थोड़ा-थोड़ा टिमटिमा रहा है। यह भी कब बुझ जाएगा, कहा नहीं जा सकता। इसको तेल चाहिए, इसको बाती चाहिए। और यह दिया भी इसलिए टिमटिमा रहा है कि तुम चाहे मानो और तुम चाहे न मानो, कभी कोई कबीर आ जाता, कभी कोई नानक आ जाता, कभी कोई दरिया जा आता, कभी कोई मीरा आ जाती--इसलिए यह दिया थोड़ा टिमटिमा रहा है। तुम मानो, तुम न मानो, तुम गुरुओं का हाथ गहो, न गहो, लेकिन यह देश सौभाग्यशाली है, यहां सदगुरु की किरणें उतरती ही रही हैं। जो थोड़े साहसी हैं, उन किरणों का हाथ पकड़ लेते हैं और चल निकलते हैं महासूर्य की तलाश पर।
परमात्मा को सीधा नहीं पाया जा सकता। सीधा देखने के लिए आंख कहां? अदृश्य को देखने वाली आंख कहां? परमात्मा ऐसा होना चाहिए जो थोड़ा दृश्य भी हो, थोड़ा अदृश्य भी हो। सदगुरु में यह असंभव घटना घटती है। सदगुरु थोड़ा दृश्य है तुम्हारी तरफ और थोड़ा अदृश्य है। सदगुरु के साथ जुड़ो, तो जुड़ोगे पहले दृश्य से। सुनोगे उसके शब्द, प्यारे लगेंगे, जुड़ोगे। फिर जल्दी ही धीरे-धीरे शब्दों के बहाने निःशब्द को तुम्हें देगा। शब्द के बहाने निःशब्द उतार देगा। पहले तो दृश्य को देखकर जुड़ोगे, मगर जुड़ गए अगर तो अदृश्य से ज्यादा देर टूटे न रहोगे। पहले तो उसके संगीत से जुड़ोगे, फिर जल्दी ही उसके शून्य से जुड़ जाओगे। पहले तो उसकी देह के प्रेम में पड़ोगे, फिर जल्दी ही उसकी आत्मा भी तुम्हें आच्छादित कर लेगी।
बारिधि अगम अथाह जल, बोहित बिनु किमि पार।
बहुत अथाह सागर है, अगम सागर है--बिना जहाज परा न हो सकोगे। नानक नाम जहाज। कोई नानक जैसा व्यक्ति मिल जाए तो जहाज बने। कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मंजधार।। खोज लो, खोज लो, डूब मत जाना--बहुत बार डूबे हो, इस बार डूबना मत। बहुत बार बिन चेते आए और गए, इस बार चेतो। अजहूं चेत गंवार!
चेत सकते हो। क्षमता है। अपनी क्षमता को जरा संगठित करो।
यह प्रेम की अटपटी गली है, थोड़े डगमगाओगे भी, मगर डगमगा-डगमगा के ही तो कोई चलना सीखता है! छोटा बच्चा जब पहली दफा खड़ा होता है तो कोई एकदम से ओलम्पिक में नहीं चला जाता कि दौड़ ओलम्पिक की दौड़ सम्मिलित हो जाए। कोई बड़ा धावक नहीं हो जाता एकदम से। एक कदम चलता है कि गिरता है, घुटने तोड़ लेता है, बार-बार गिरता है। मगर जितना गिरता है उतना चुनौती स्वीकार करता है--और उठता है और चलता है।
ऐसे ही तुम बहुत बार गिरोगे, बहुत बार सम्हलोगे; बहुत बार टूटोगे, बहुत बार बिखरोगे; बहुत बार अपने को संगृहीत करना होगा। लेकिन अगर चलते ही रहे, गिरने से डरे न, भूल-चूकों से भागे न, तो तुम भी चल पाओगे। यह प्रेम की डगर बड़ी अटपटी है; मगर जो प्रेम की डगर पर चलता है, वह पहुंच जाता है। और प्रेम की डगर के अतिरक्ति और कोई डगर नहीं है।
एक चोट सी लग अंतर में, जग नवीन आशंका सी;
उठ आंधी सी, फैल घटा सी, सुलग स्वर्ण की लंका सी।
आ शंका सी, छिप खंजर सी, बोल मौत सी दीवानी;
बुझा सकेगा कहां प्यास अब बंद बोतलों का पानी?
घायल मर्म, सताया प्राणी, कांटे कोई चीज नहीं;
ममता का अंकुर फूटे, अब हिय में ऐसा बीत नहीं।
स्वप्न भंग, सुख का मुंह काला, मेंहदी के बदले छाले;
इस अवसर पर दिल क्या चाहे, बादल ये काले-काले।
नहीं दुपहरी, नहीं चांदनी, आज कत्ल की रात घनी;
छेड़ न श्यामा, बुला न मोहन, प्रीति उलट आघात बनी।
कितनी मंजिल, कितनी गालियां, लेकिन अपनी राह अलग;
दुनिया बड़ी दूध की धोई, दर्दे-दिल की आह अलग।
प्रेम की राह अलग, प्रेम की आह अलग। प्रेम को गहो!
भजन भरोसा एक बल, एक आस बिस्वास।
प्रीति प्रतीति इक नाम पर, सोइ संत बिबेकी दास।।
जंगम जोगी सेवड़ा पड़े काल के हाथ।
कह दरिया सोइ बाचि है, सत्तनाम के साथ।।
बारिधि अगम अथाह जल, बोहित बिनु किमि पार।
कनहरिया गुरु ना मिला, बूड़त है मंजधार।।
आज इतना ही।




oshoganga-ओशो गंगा पर 7:52:00 am
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