73. स्वरूप में प्रतिष्ठा।

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शुक्रवार, 30 मार्च 2018

महावीर या महाविनास--(प्रवचन-04)

स्वरूप में प्रतिष्ठा-प्रवचन-चौथा) 

दिनांक 13-04-1965 से 14-04-1967 बम्बईचौपाटी।


मेरे प्रिय आत्मन्,
मैं देश के कोने-कोने में गया हूं। हजारों आंखोंलाखों आंखों में देखने का मौका मिला है। जैसे मनुष्य को देखता हूं..ऊपर हंसने कीआनंद कीसुख की एक झलक दिखाई पड़ती हैपर पीछे घना दुखबहुत दुख दिखाई पड़ता है। और इस दुख का परिणाम यह हुआ हैइस दुख का फलित यह हुआ है कि सारी पृथ्वी धीरे-धीरे दुख से भर गई है। यदि एक भी व्यक्ति दुखी हैपरिणाम में अपने बाहर दुख को फेंकता है। व्यक्ति का दुख ही फैल कर सारे जगत का दुख हो जाता है। एक व्यक्ति के भीतर से जो दुख का धुआं उठता हैवह सारी समष्टि को दुख और पीड़ा से भर देता है। आज जो सारे जगत में दुखपीड़ा और हिंसा मालूम होती हैवह जो विनाश के प्रति इतनी आकांक्षा मालूम होती हैजो विनाश के प्रति इतनी आकांक्षा मालूम होती हैउसके पीछे एक ही कारण हैव्यक्ति की अंतरात्मा दुखी है।

मैं यदि दुखी हूंतो मैं किसी को भी दुख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सकता। मेरे भीतर जो हैवही मेरे बाहरमेरे आचरण मेंमेरे व्यवहार में फैल जाता है। मेरे भीतर केंद्र पर जो हैवही मेरी परिधि पर आ जाता है। ढाई अरब लोग अगर भीतर दुख और पीड़ा से भरे होंतो परिणाम में स्वाभाविक है कि सारा जगत दुख और पीड़ा से भर जाए। परिणाम में स्वाभाविक है कि सारे जगत में हिंसा और विनाश दिखाई पड़े।
पिछले पचास वर्षों में दो महायुद्ध हमने लड़े। दो महायुद्धों में दस करोड़ लोगों की हत्या हुई। इससे मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता और न मैं इससे बहुत हैरान हूं कि दस करोड़ लोग मरे। इस जगत में जो पैदा होता हैमर जाता है। हैरानी इस बात की है कि हम दस करोड़ लोगों को शांति से समाप्त कर सके। उनके मरने का प्रश्न नहीं है। वे दिनदो दिन बाद मर जाने को थे। कोई भी जीएगा नहींलेकिन हम ये सभी दस करोड़ लोगों की हत्या शांति से कर सकेयह बहुत विचारणीय है। हमारे भीतर पशु इतना जाग्रत कैसे हो गयाहमारे भीतर निकृष्टतमहमारे भीतर अंधेरा इतना मुखर क्यों हो गयामनुष्य को क्या हो गया हैयह विचारणीय हो गया है। और अबजब कि हम तीसरे विनाश की तैयारी में होंजो कि संभवतः अंतिम विनाश होगा।
आइंस्टीन ने मरने के पहले कहा था..किसी ने पूछा थातीसरे महायुद्ध में किन अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होगाआइंस्टीन ने कहातीसरे का तो मुझे पता नहींलेकिन चैथे के बाबत मुझे मालूम है। पूछने वाला हैरान हुआ होगा। तीसरे के बाबत ज्ञात नहीं हैचैथे के बाबत क्या ज्ञात हैउसने पूछाक्या ज्ञात हैआइंस्टीन ने कहाअगर चैथा महायुद्ध हुआजिसकी कोई संभावना नहीं हैतो आदमी पत्थर के औजारों से लड़ेगा। क्योंकि तीसरा उसके सारे विकास कोउसकी सारी समृद्धि को समाप्त कर देगा। संभावना तो इसकी है कि उसको परिपूर्णतया नष्ट कर दे।
जो हिंसा और जिस हिंसा के प्रति महावीर और बुद्ध ने और ईसा ने चेताया था..हिंसा की अंतिम परिणति महामृत्यु हो सकती हैऔर कुछ नहीं। वह हिंसा धीमी थीअल्प थीचलती गई। उस हिंसा के कारण जीवन नहीं चल रहा थाहिंसा टोटल नहीं थीहिंसा आंशिक थीशेष अहिंसा थी जीवन में। इसलिए हिंसा के साथ भी मनुष्य चलता रहा।
पहली बार हम ऐसे स्थान पर आए हैंजहां हिंसा टोटल हो सकती हैजहां हिंसा समग्र हो सकती है। समग्र हिंसा के बाद जीवन की कोई संभावना नहीं है। हिंसा पूर्ण हो जाएस्वयं अपना आत्मघात कर लेती है। वे हिंसक प्रवृत्तियांजिनका सारे धर्मों ने विरोध किया हैविशेषतया श्रमण धर्मों ने जिस हिंसा के लिए पच्चीस सौ वर्ष पहले आवाज उठाई थीवह भविष्यवाणी पूरे होने के करीब पहुंच रही है। जो आने वाला संभावी युद्ध होगावह किसी तरह के प्राण को जमीन पर नहीं बचने देगा।
मैं पढ़ता थामैंने सुनापानी को हम गर्म करते हैंसौ डिग्री पर पानी भाप हो जाता है। लोहे को अगर गरम करेंपंद्रह सौ डिग्री पर लोहा पिघल कर पानी हो जाता है। पच्चीस सौ डिग्री पर लोहे का जो पानी तरल रूप हैवह भाप बन कर उड़ जाता है। एक हाइड्रोजन बम कितनी गर्मी पैदा करेगाआपको ज्ञात हैदस करोड़ डिग्रीपच्चीस सौ डिग्री पर लोहा भाप होकर उड़ जाता है। एक हाइड्रोजन बम दस करोड़ डिग्री गर्मी पैदा करेगाक्या बचेगा उस उष्णता मेंउस उत्तप्त में ऐसा प्रतीत होगाजैसे सूरज जमीन पर उतर आया हो। किसी तरह के जीवन की कोई संभावना न रह जाएगी।
एक हाइड्रोजन बम पैंतालीस हजार वर्गमील क्षेत्र को प्रभावित करता है। इंग्लैंडफ्रांस या पश्चिमी जर्मनी जैसे देश को नष्ट करने को केवल पंद्रह हाइड्रोजन बम पर्याप्त हैं। और आपको ज्ञात हैसारी दुनिया में इस समय तैयार हाइड्रोजन बम की संख्या पचास हजार है। ये पचास हजार हाइड्रोजन बम इस तरह की तीन जमीनों को नष्ट करने को पर्याप्त हैं।
और प्रति घंटा..मैं घंटे भर बोलूंगा..प्रति घंटा पचास करोड़ रुपया इस तरह के विनाशक अस्त्रों को तैयार करने में सारी दुनिया में खर्च हो रहा हैप्रति घंटादो घंटे में एक अरब रुपयाचैबीस घंटे में बारह अरब रुपयाजब कि हर तीन आदमियों में दो आदमी भूखे हैंजब कि हर तीन आदमियों में पूरी जमीन पर दो आदमी नंगे हैंतो हम जरूर कुछ पागल हो गए हैं। हम जरूर विक्षिप्त हो गए हैं। ये सभी होश में नहीं हैं। हम कुछ नशे में हैं और जैसे हमें कुछ पता नहीं हम क्या कर रहे हैंहमारे हाथ हमारी मौत का आयोजन कर रहे हैंइसमें हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है!
एक छोटी सी कहानी आपसे कहूं..एक बिल्कुल काल्पनिक कहानीकहीं सुना थाफिर बहुत प्रीतिकर लगी।
ईश्वर ने यह देख कर कि मनुष्य को यह क्या हुआ जा रहा हैयह मनुष्य अपने हाथ से अपनी मृत्यु के आयोजन में इतना उत्सुक क्यों हो गया हैदुनिया के तीन बड़े राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को अपने पास बुलाया। मैंने कहाकहानी काल्पनिक हैझूठीकहीं कोई ईश्वर ऐसा बुलाने को नहीं हैपर कहानी में एक सत्य बहुत उभर कर जाहिर हुआ है। उसमें अमरीका कोब्रिटेन कोरूस को बुलाया था। इन मुल्कों के प्रतिनिधि उससे मिलने गए थे। ईश्वर ने कहामेरे मित्रबहुत सदियां देखीं। मनुष्य का लंबा इतिहास देखा। इतना विक्षिप्त..इतनी समृद्धि के बीचइतनी शक्ति के बीचअपने को ही आत्मघात करने वाला कोई जमाना मैंने नहीं देखा हैमैं हैरान हूंतुम यह क्या कर रहे हो?तुम्हारे किए का अंतिम परिणति और परिणाम क्या होगाअगर मैं कुछ सहायक हो सकूं और मनुष्य बच सकेतो मुझसे वरदान मांग लो। मैं अगर मनुष्य के भविष्य के लिए कुछ कर सकूंतो वरदान देने को तैयार हूं। तुम तीनों मांग लो तीन वरदान। मनुष्य बच जाएयही मेरी आकांक्षा है।
अमरीका के प्रतिनिधि ने कहामेरे मालिकइससे सुखद और क्या होगाएक वरदान दे दें। और हमें कुछ भी नहीं चाहिएएक ही आकांक्षा है हमारीः जमीन तो होलेकिन जमीन पर रूस का कोई निशान न रह जाए। ईश्वर ने वरदान दिए होंगे बहुतबहुत मांगें पूरी की होंगीऐसी मांग कभी उसके सामने आई नहीं थी। उसने उदास घूम कर रूस के प्रतिनिधि की तरफ देखा। वह बोलामहानुभावएक तो हमें आप पर कोई विश्वास नहीं है। एक तो हम नहीं मानते कि कहीं कोई ईश्वर है। लेकिन मान लेंगे तुम्हें भी और उन चर्चों में जहां से तुम्हारे सब निशान मिटा दिए गए हैंवापस तुम्हें प्रतिष्ठित कर देंगेएक बातएक आकांक्षा पूरी हो जाए। ईश्वर ने पूछाकौन सी आकांक्षारूस के प्रतिनिधि ने कहानक्शे तो हों जमीन परनक्शे तो हों दुनिया केअमरीका के लिए कोई रंग-रेखा न रह जाए। ईश्वर ने घूम कर ब्रिटेन को देखा। ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने कहामेरे प्रभुहमारी अपनी कोई आकांक्षा नहींइन दोनों की आकांक्षाएं एक साथ पूरी हो जाएंहमारी आकांक्षा पूरी हो जाएगी।
ऐसी सदी को होश में कहिएगा?ऐसे मनुष्य को जागा हुआ कहिएगा?ऐसे युग को स्वस्थ कहिएगा?विक्षिप्त है यह युग। और इस सत्य को हम जितना शीघ्र समझ लेंउतना उचित हैअन्यथा अपने ही विक्षिप्त आयोजन हमारी मृत्यु बन जा सकते हैं। यह विक्षिप्तता कैसे पैदा हो गई है?यह पागलपन कैसे आ गया?और क्या ऊपर का कोई उपचार और अहिंसा पर दिए गए प्रवचन और अहिंसा पर लिखा गया साहित्य और अहिंसा के पक्ष में बोली गई बातें इस विक्षिप्तता को तोड़ सकेंगी?
यह विक्षिप्तता टूट जानी इतनी आसान नहीं है। यह विक्षिप्तता ऊपर से आरोपित नहीं हैयह विक्षिप्तता कहीं भीतर से विकसित हुई है। इस विक्षिप्तता की कहीं मनुष्य के मन मेंबुनियाद में जड़ें हैं। मनुष्य की प्रकृति में कुछ हैजहां से यह विक्षिप्तता फैलती और विकसित होती है। जब तक उसकी प्रकृति में परिवर्तन करने का विचारविवेकजागृति पैदा न होजब तक उसकी प्रकृति में जो पशु हैउसके विनाश का कोई आयोजन न होतब तक मनुष्य के भीतर प्रकाश को और प्रभु को पैदा नहीं किया जा सकता। मनुष्य यूं ही हिंसक नहीं है। उसके पीछे हिंसा में उसके चित्त में जड़ें हैंउन जड़ों को अलग कर देना जरूरी हैतो हम एक अहिंसक मनुष्य का निर्माण कर सकते हैं। अहिंसक मनुष्य का निर्माण ही इस जगत के लिए एकमात्र त्राण हो सकता है।
महावीर ने कहा थाअहिंसा एकमात्र त्राण है। यह बात इतनी सच कभी भी नहीं थी। यह बात पहली बार परिपूर्ण सत्य हुई है। अहिंसा के अतिरिक्त आज कोई मार्ग नहीं है। मैं अभी कहा एक जगहः महावीर या महाविनाशदो के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।
पहली बार इतिहास ने हमें ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दियाजहां महावीर और उनकी अहिंसा एकमात्र जीवन का पर्याय बन गई है। हिंसा को चुनना अब मृत्यु को चुनना है। अब हिंसा और मृत्यु में कोई फासला और फर्क नहीं है। अब अहिंसा को चुनना जीवन को चुनना है। वे लोग जो जीवन चाहते हैंवे लोग जो जीवन का भविष्य चाहते हैंउन्हें अहिंसा को अपने में जन्माए बिना कोई चारा नहीं है।
इस अहिंसा पर क्या हम करें?कैसे यह पैदा हो जाए?कहां है मनुष्य में हिंसा की जड़?कहां है मनुष्य में वह प्यास और वह सुखजो दूसरे को पीड़ा और दूसरे के विनाश से तृप्त होता है?कौन है मनुष्य के भीतर ऐसा भूखाजो दूसरे के विनाश में रस लेता हैउसे पहचाननाउस भूख को पकड़ लेना जरूरी है।
मनुष्य पूर्ण इकाई नहीं है। मनुष्य परिपूर्ण विकसित प्राणी नहीं है। मनुष्य केवल संक्रमण है। मनुष्य केवल बीच की एक कड़ी है..पशु और प्रभु के बीच। मनुष्य के भीतर दोनों संभावनाएं हैं..नीचे गिर कर पशु हो सकता हैऊपर उठ कर प्रभु हो सकता है। और इसे मैं मनुष्य की गरिमा और गौरव मानता हूं। मैं अभी कहा एक जगहमैंने लोगों से कहा कि तुम पाप कर सकते होयह तुम्हारी गरिमा हैयह तुम्हारा गौरव है। तुम पाप कर सकते होइसलिए तुम पवित्र भी हो सकते हो। जो पाप नहीं कर सकतापवित्र भी नहीं हो सकता। तुम आत्मघात कर सकते हो...। दुनिया में कोई पशु मनुष्य के सिवाय आत्मघात नहीं कर सकता। कहीं स्युसाइड नहीं हो सकती मनुष्य को छोड़ कर। अकेला मनुष्य आत्महत्या कर सकता है।
मैं मानता हूं कि गौरवशील हो कि आत्महत्या कर सकते होक्योंकि जो आत्महत्या कर सकता हैवह परिपूर्ण जीवन पा सकता है। जो नीचे गिर सकता है गहराइयों मेंअंधेरे की गर्तों मेंऔर पाप की और नरक की सड़ांध मेंवही केवल पवित्रता के धवल शिखरों को छू सकता है। नीचे गिरने की हमारी क्षमता हमारे स्वातंष्य की महिमा का प्रतीक है।
इसलिए मैं यह नहीं कहता कि नीचे गिर जाने की क्षमता बुरी है। वह केवल स्वातंष्य हैचुनाव की बात है। मनुष्य अकेला प्राणी है सारी जमीन परजो अपने जीवन के निर्माण के लिए स्वतंत्र है। इतना स्वतंत्र है कि निम्नतम हो सकता हैइतना स्वतंत्र है कि श्रेष्ठतम हो सकता है। मनुष्य केवल एक संक्रमण हैसारे पशु पूर्ण इकाइयां हैं। किसी पशु में पशुता के ऊपर उठने की क्षमता नहीं हैकिसी पशु में पशुता के नीचे गिरने की क्षमता भी नहीं है। वह थिर इकाई हैरुकी हुई। प्रवाहमान नहींतरल नहीं। मनुष्य तरल इकाई है। मनुष्य तरलता हैलिक्विडिटी है। उसके भीतर प्रवाह कीनीचे-ऊपर उठने की क्षमता है।
और यह हमारे हाथ में हैयह हमारे संकल्प पर निर्भर है कि यह प्रवाह क्या दिशा ले।
पिछली कुछ सदियों ने मनुष्य की श्रेष्ठतम दिशा को खंडित कर दिया है। सारे पुराने प्रतिमानसारी पुरानी प्रतिमाएं खंडित हो गई हैं। हम बहुत मूर्ति-भंजक हैं। मंदिरों की मूर्तियां टूट जाएंकुछ नुकसान नहीं होगा। मनुष्य के जीवन की वह प्रतिमाजिसे उसे पाना हैटूट जाए तो जीवन नष्ट हो जाएगा। हम इस अर्थ में मूर्ति-भंजक हैं। हमने सारी पुरानी प्रतिमाएं तोड़ दींजो हम होने की आकांक्षा करते थे। महावीर और बुद्ध और रामवे सारी प्रतिमाएं हमारी आंखों से हट गई हैं। हम जो हैंउस पर तृप्त हो गए हैं।
जो तृप्त हो जाएगामर जाएगा। जो तृप्त हो जाएगा और समझ लेगा हम जो हैंकाफी हैंऔर ऊपर उठने की आकांक्षा और प्यास जहां विलीन हो गईवहीं मृत्यु है। पिछले दो-तीन सौ वर्षों में हम निरंतर मरते चले गए हैं। मनुष्य मनुष्य होने से तृप्त हो गया है। मनुष्य का मनुष्य से तृप्त हो जाना ही उसकी भूल और भ्रांति है। इस सदी का सारा दुख यह हैइस सदी की सारी विकृति इससे पैदा हुई हैमनुष्य मनुष्य होने से तृप्त हो गया है।
मैं आपको तृप्त हुआ नहीं देखना चाहता। मैं किसी को नहीं कहतातृप्त हो जाओसंतुष्ट हो जाओ। मैं कहता हूंजलने दो अतृप्ति की आग। मनुष्य से तृप्त मत होना। और बड़े आश्चर्य का नियम यह हैइस जगत में कुछ भी थिर नहीं है। जो आगे बढ़ने से रुक जाएगावह रुका नहीं रहेगाप्रवाह उसे पीछे फेंक देता है। जो आगे नहीं बढ़ रहा हैवह पीछे सरकता चला जाएगा। इस जगत में थिर कुछ नहीं है। जेम्स जीन्स ने एक बात कही थीकि मैंने सारे शब्दकोश के अध्ययन के बाद अनुभव कियारेस्टटिकावठहरावथिरताइस शब्द की वास्तविकता जगत में कहीं भी नहीं है। कहीं कोई चीज थिर नहीं है। जो विकासमान नहीं हैह्रासमान हो जाएगा। जो आगे नहीं बढ़ रहा हैपीछे हट जाएगा। ठहर नहीं सकते हैं।
जिस दिन हमने मनुष्य के ऊपर भावी प्रतिमाओं को अलग कर दियाजिस दिन मनुष्य के भीतर आदर्श को विसर्जित कर दियाजिस दिन हमारे भीतर वह आकांक्षाजो प्रत्येक को महावीरबुद्ध और क्राइस्ट बनाना चाहती थीविलीन हो गईधूमिल हो गईउसी दिन हम पशु की तरफ पीछे हटने शुरू हो गए। प्रभु की प्रतिमा हटेगी आंख सेअनिवार्यतया पशु की प्रतिमा उसकी जगह प्रतिष्ठित हो जाती है। ईश्वर को छोड़ने से कुछ हर्ज न थालेकिन मंदिर रिक्त नहीं रहता। जिस सिंहासन पर से ईश्वर को उतार लियावहां कब रात के अंधेरे में पशु बैठ गयाइसका पता नहीं पड़ता है।
मैं इससे दुखी नहीं हूं कि हम ईश्वर को अस्वीकार कर दें..कर देंलेकिन यह तो स्मरण रखें कि सिंहासन पर फिर कौन विराजमान हो गया है। और हमारे पूजा करने वाले हाथजो बहुत पुराने आदी हैंअंधे की तरह पशु की पूजा में संलग्न हो गए हैं!
ईश्वर को अस्वीकार केवल वही कर सकता हैजो ईश्वर के जैसा होउसके पहले नहीं। धर्म को अस्वीकार वही कर सकता हैजो धर्म को उपलब्ध हो जाएउसके पहले नहीं। अन्यथा विपरीत प्रतिष्ठित हो जाता है। मनुष्य के भीतर दोनों हैं..मनुष्य के भीतर दोनों हैं।
एक कहानी कहूं। पढ़ता था एक चित्रकार के बाबत। एक चित्र उसने बनाना चाहा था मनुष्य के भीतर दिव्य काडिवाइन का। गया था खोज में। खोज लिया था एक व्यक्ति कोजिसकी आंखों में आकाश के जैसी नीली शांति थी। जिसके नक्श मेंजिसकी रेखा-रेखा में कुछ था अलौकिकसंवेदितजिसको देख कर लगता था कि मनुष्य के ऊपर का कुछ प्रकट हुआ। उसने उसके चित्र को बनाया। चित्र बनापूरा हुआलाखों प्रतिलिपियां बिकीं। गांव-गांवउसके देश के गांव-गांव में पहुंच गयाप्रतिष्ठित हुआआदृत हुआ। बहुत हुई थी प्रशंसा।
बीस वर्ष बाद उस चित्रकार ने दूसरा चित्र बनाना चाहा थामनुष्य के भीतर जो पशु है उसका। सोचा थायूं मनुष्य की तस्वीर पूरी हो जाएगी इन दो चित्रों में। गया था खोजने वेश्यालयों मेंकारागृहों मेंपागलखानों में। और खोज लिया था आखिर एक कारागृह में एक व्यक्ति कोजिसकी आंख तो आदमी की थीलेकिन जो झांकता था भीतर सेवह पशु था। जिसका चेहरा तो आदमी का थालेकिन पारदर्शी था चेहरा और पीछे कोई खूंखार बैठा हुआ था। चित्र को बनाया। दूसरा चित्र भी बन कर जिस दिन पूरा हुआ थाएक घटना घटी बहुमूल्यस्मरणीय।
अपने पुराने चित्र को लेकर गया था कारागृह मेंदोनों को रख कर करीब यह देखनेकौन सी कृति श्रेष्ठ बनी हैमंत्रमुग्ध होकर देख रहा थातय करना मुश्किल थाकौन सा चित्र ठीक बनातभी पीछे कैदी रोने लगा थाजिसका चित्र उसने दूसरा बनाया था। लौट कर देखा था। कहामित्रमेरे चित्रों से तुम्हें दुख का कारण?तुम्हारे आंसू का कारण?तुम क्यों रोते होउस कैदी ने कहाइतने दिन कितनी मुश्किल से अपने भाव को छिपायाआज मुश्किल हो गया। पहला चित्र भी मेरा ही चित्र है। बीस वर्ष पहले मेरे ही चेहरे और आंखों को देख कर पहला चित्र बनाया था। दोनों चित्र मेरे हैंइसलिए रोता हूं।
कहानी बहुत काल्पनिक सी लगती हैकाल्पनिक नहीं है। और काल्पनिक भी हो तो भी प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में सत्य है। ये चित्र उस आदमी के ही नहीं थे दोनोंये हमारे भी दोनों हैं। ये प्रत्येक के दोनों हैं। जो भी आदमी इस जमीन पर हैउसके भीतर दोनों छिपे हैं। उसके भीतर दोनों विराजमान हैं। उसके भीतर दोनों के बीच निरंतर संघर्षनिरंतर दोनों किनारों के बीच आदमी टकराता रहता है।
कभी देखनाकभी विचार करनाकभी होश से भरनाघड़ी भर पहले तुम्हारे भीतर हो सकता है प्रभु रहा होघड़ी भर बाद हो सकता है कि पशु विराजमान है। कितनी तीव्रता से हम इन दोनों तटों के बीच घूमते रहते हैंऔर अगर प्रभु की धारणा ही विलीन हो जाएअगर आत्मिक जीवन में बैठने कीउठने की आकांक्षा विलीन हो जाएतो फिर हम पशु के तट पर लगे रह जाते हैं। हमारी नौका वहीं लगी रह जाती है। फिर स्वाभाविक हैजब कि एक-एक आदमी के भीतर का पशु ही केवल प्रवृत्तिमान होता होजब कि पशु को तृप्त करना ही जीवन रह गया होतो स्वाभाविक है कि ढाई अरब पशुओं का इकट्ठा संघर्षणढाई अरब पशुओं की इकट्ठी विकृत आकांक्षाएं सारी संस्कृति की मृत्यु बन जाएं।
कहां हम स्वप्न देखे थे मनुष्य के भीतर परम शक्ति के जागरण का और कहां निकृष्ट को उपलब्ध करके बैठ गए हैंकहां बुद्धकहां महावीरकहां क्राइस्टजो कहते हैंतुम्हारे भीतर परमात्मा विराजमान हैऔर कहां हमजो भीतर झांक कर देखते हैं तो सिवाय पशु की आहट केउसके चलने के कुछ भी वहां नहीं पाते!
मेरा मानना हैअहिंसा ऊपर से शिक्षित नहीं की जा सकती। हिंसा हमारे पशु की प्रकृति का सहज परिणाम है। जब तक हम पशु के तट से बंधे हैंतब तक सहज परिणाम हिंसा होगी। लाख चेष्टा ऊपर से आरोपित करने की व्यर्थ है। अहिंसा का अभिनय हो सकेगाअहिंसक नहीं हुआ जा सकता। अहिंसक होना होक्रियाएं नहीं बदलनी हैंभीतर चैतन्य का तट बदलना होगा। लाख उपाय करेंउसी तट पर बंधे हुए कहीं पहुंचना न होगा।
सुनता थाएक साधु नदी पर नहाने उतरा था। सुबह भोर होने के करीब थी और थोड़ा-थोड़ा प्रकाश हो गया था। सूरज निकलने के करीब थाप्राची लाल हो गई थी। देखा उस पार उसनेचार व्यक्ति एक नाव में बैठ कर जोर से डांड चला रहे हैं। नाव वहीं की वहीं खड़ी हैडांड चलाए जा रहे हैं। वह तैर कर पास गया, देखानाव की जंजीर तट से बंधी थी!
उसने पूछामित्र कहां जा रहे होवे चारों नशे में थे और रात नशे में आकर नाव चलाना शुरू कर दिए थे। रात भर इस ख्याल में रहे कि बहुत यात्रा हो रही है। उस साधु ने उनसे कहापागल होयह तो देख लेते पहले कि नाव तट से छोड़ी भी या नहींजंजीर तो वहीं बंधी हैतो डांड खेने से कुछ भी न होगा!
ऊपर सारे कर्म अहिंसक होने केउन नशेखोर नाविकों जैसे हैं। भीतर उस तट से जंजीर छूटी या नहींऔर जंजीर छूट जाएभीतर तट परिवर्तित हो जाएभीतर चैतन्य का केंद्र परिवर्तित हो जाएतो जैसा पशु के तट से बंधे हुए हिंसा सहज बाहर निकलती हैआचरण हिंसक हो जाता हैवैसे ही तट-परिवर्तन सेचेतना के परिवर्तन से अहिंसा सहज निकलती है।
महावीर ने कहा है..अदभुत परिभाषा की है अहिंसा की..कहा हैस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना अहिंसा है।
अहिंसा का कोई संबंध ही दूसरे से नहीं है। जो कहते हैंदूसरे को दुख न देना अहिंसा हैनासमझ हैं। दूसरे से कोई वास्ता अहिंसा का नहीं। स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना अहिंसा हैस्वरूप के बाहर होना हिंसा है। जो स्वरूप के बाहर हैकुछ भी करे..कुछ भी करेसबमें हिंसा प्रवाहित होगी। जो स्वरूप में प्रतिष्ठित हैकुछ भी करेसबमें अहिंसा प्रवाहित होगी। अहिंसा क्रिया का परिवर्तन नहींडूइंग का परिवर्तन नहींबीइंग कासत्ता काहोने का परिवर्तन है। जिसकी सत्ता परिवर्तित होगी और तट बदल जाएगाउसके जीवन में सहजसहज अहिंसा प्रतिफलित हो जाती है।
अहिंसा साधना नहीं है। कोई अहिंसा को साध नहीं सकता। साधना आत्म-ज्ञान को पड़ता है। अहिंसा अपने आप चली आती हैजैसे पौधों में फूल चले आते हैं। अहिंसा सहज परिणाम हैकांसीक्वेंस हैसाधना नहीं है। अहिंसा परम धर्म का अर्थ यही है कि जब जीवन में आत्म-ज्ञान उपलब्ध होता है अंतिम परिणति मेंपरम धर्म की तरहपरम विकासविकसित फूल की तरह अहिंसा आ जाती है। अहिंसा को लाना नहीं होताअहिंसा आती है। लाना होता है स्व-स्थिति कोलाना होता है स्व-स्थिति को।
अहिंसा के संबंध में सबसे भ्रांत जो धारणा व्यापक हैवह यह है कि हम अहिंसा को एक नैतिक उपकरणएक नैतिक साधना समझते हैं। अहिंसा नैतिक साधना नहीं है। और नैतिक साधक की अहिंसा में और महावीर की अहिंसा में जमीन-आसमान का अंतर है। नैतिक साधक यह सोच-सोच कर कि दूसरे को दुख देना बुरा हैअहिंसक होने की चेष्टा करता है। इस तरह जो चेष्टितकल्टीवेटेड अहिंसा हैवह कृत्रिम हैथोथी हैबाह्य है।
महावीर की अहिंसा नैतिक अहिंसा नहीं है। महावीर की अहिंसा यौगिक अहिंसा है। महावीर का मानना हैस्वयं में प्रतिष्ठित हो जाओस्वयं ज्ञान को उपलब्ध। तुम पाओगेबाहर दूसरे को दुख देना असंभव हो गया। क्योंकि जिसके भीतर दुख नहीं हैवह दूसरे को दुख नहीं दे सकता है। जिसके भीतर आत्म-ज्ञान का प्रकाश और आनंद उपलब्ध हो गयाअनायास उससे आनंद ही बहेगाप्रकाश ही बहेगा। कोई रास्ता न रहा कि उसके भीतर से आनंद के विपरीत कुछ बह जाए।
सचअगर विचार करेंहम दूसरे को इसलिए दुख दे पाते हैं कि हम दुखी हैं। हम दूसरे के प्रति इसलिए हिंसक हो पाते हैं कि हम अपने प्रति हिंसक हैं और भीतर हिंसा से भरे हैं। दूसरे का प्रश्न नहीं हैअंततः अहिंसा का प्रश्न वैयक्तिक जागरण का प्रश्न है। मनुष्य अपने भीतर जाग जाए और उसे अनुभव कर लेजो वहां बैठा हैहिंसा विसर्जित हो जाती है।
वहां पश्चिम ने पदार्थ के विश्लेषणपदार्थ के खंडनपदार्थ के आंतरिक रहस्य की खोज के द्वारा अणु को उपलब्ध किया है। अणु को उपलब्ध करके पाया कि विराट शक्ति हाथ में आ गई। विनाश की अदभुत शक्ति पर नियंत्रण हो गया है। पूरब ने भी प्रयोग किए। पश्चिम ने पदार्थ की सत्ता पर प्रयोग किएपूरब ने मनुष्य की चेतना की सत्ता पर प्रयोग किए। महावीर का प्रयोग मनुष्य की चेतन सत्ता के विश्लेषण का प्रयोग है।
पदार्थ के विश्लेषण से उपलब्ध हुआ है अणुमनुष्य की चेतना के विश्लेषण से उपलब्ध हुई है आत्मा।
पदार्थ के विश्लेषण से जो अणु उपलब्ध हुआवह विनाशक साबित हुआ। पदार्थ की सब शक्तियां अंधी हैं। और अंधों के हाथ में आ जाएंतो परिणाम बुरे होने स्वाभाविक हैं। चैतन्य के विश्लेषण सेचैतन्य के जागरण सेचैतन्य में उतरने से जो उपलब्ध हुई आत्मावह सारे जीवन कोसारे दृष्टिकोण को बदल देती है।
महावीर ने कहा हैकेवल वही अहिंसक हो सकता हैजो अभय को उपलब्ध हो।
अभय को कौन उपलब्ध होगा?जो आत्म-ज्ञानी नहीं है वह अभय को उपलब्ध हो सकता है?कोई भय को जबरदस्ती निकाल कर अभय को पा सकता है?
असंभव हैअसंभव है। कोई भय को निकाल नहीं सकता। भय है मृत्यु का। अंतिम भय के पीछे मृत्यु बैठी हुई है। प्रतिक्षण चारों तरफ से जीवन मृत्यु से घिरा हुआ है। जब तक अमृत न दिख जाएजब तक यह न दिख जाए कि मेरे भीतर कोई है जो नहीं मरेगानहीं मर सकता हैतब तक व्यक्ति अभय को उपलब्ध नहीं होता है। जब तक हम मत्र्य से घिरे हैंजब तक हम जानते हैं कि जो भी हमारे आस-पास हैसब मृत्यु में समा जाएगा...
और मैं तो कहने लगाजीवन हमारे पास है ही नहींहम तो प्रतिक्षण मर ही रहे हैं। मृत्यु अनायास थोड़े ही एक दिन घटित हो जाती है। जीवन में सब विकास होता है। जिस दिन हम जन्मेउसी दिन मृत्यु शुरू हो गई। जिस दिन जन्म हुआउसी दिन मरना शुरू हो गया। जिसको हम मृत्यु कहते हैंवह उसी मरण की शुरुआत की अंतिम पूर्णाहुति है। कोई अचानक थोड़े ही मर जाता है। अचानक इस जगत में कुछ भी नहीं होता है। हम प्रतिक्षण मर रहे हैं। हम प्रतिक्षण मरते जा रहे हैंहमारा सब मरता चला जा रहा हैहम प्रतिक्षण अंधेरे में और मृत्यु में दबे जा रहे हैं। इस मृत्यु में और अंधेरे में दबता हुआ व्यक्ति अभय को उपलब्ध हो सकता हैकोई तलवार अभय न देगी। और जो हाथ में तलवार लिए खड़े हैंवे भयभीत हैंतलवार केवल इसकी ही सूचना देती है। किसी दिन शायद वक्त आए कि जिनकी तलवार हाथ में लिए हम तस्वीरें और मूर्तियां बना रहे हैंलोग हंसें और समझें कि बहुत कमजोरबहुत भयभीत रहे होंगे। जो भयभीत नहीं हैउसके हाथ में तलवार होने का कोई कारण नहीं है। जिनको हम बहादुर कहते हैंवह केवल भय की ही एक परिणति हैभय का ही एक रूप है। मत्र्य के बोध के भीतर अभय असंभव है। जो मरने से डरा होजिसे मृत्यु दिख रही हो...और मैंने कहा कि हमारा सब तो मरण के करीब पहुंच रहा है। हमारे पास कुछ भी तो नहीं हैजो न मर जाएगा।
नानक एक गांव में ठहरे हुए थेलाहौर में। एक व्यक्ति उनके पास बहुत बार आयावर्षों आया। उसने अनेक बार नानक से कहामेरे सेवा योग्य कुछ मिल जाएमैं कुछ आपकी सेवा कर सकूं। नानक टालते गए कि मुझे तो कोई जरूरत नहींतुम्हारा प्रेम हैपर्याप्त है। प्रभु ने सब दिया है। एक दिन नानक ने कहातुम बहुत बार कहेआज तुम्हारे लिए काम खोज लिया है। अपने कपड़े में छिपा रखी थी एक सुई कपड़े को सीने कीउस व्यक्ति को दीइसे रख लोमृत्यु के बाद मुझे वापस कर देना। काम खोजा ऐसा खोजा!
वह आदमी घबड़ायाएक क्षण सोचामृत्यु के बाद वापस कर देनाजब मृत्यु होगी तो मुट्ठी तो बंधी रह जाएगी सुई परलेकिन सुई साथ नहीं जा सकती है। रात भर चिंतित रहासुबह आकर नानक के पैरों पर गिर पड़ा और कहा कि क्षमा कर दें। मेरी कोई समृद्धिमेरी कोई सामथ्र्यमेरी कोई शक्ति मृत्यु के पार इस सुई को नहीं ले जा सकती। नानक ने पूछाफिर तुम्हारे पास क्या है जिसे मृत्यु के पार ले जा सकते हो?
और क्या यही प्रश्न मैं आपसे न पूछूं?और क्या यही प्रश्न प्रत्येक को सारे जगत में अपने से नहीं पूछ लेना है?एक न एक दिन क्या यह प्रश्न मृत्यु के वक्त खड़ा न हो जाएगा कि क्या है मेरे पास जो मैं ले जा सकता हूं?जिसके पास मृत्यु के पार ले जाने को कुछ भी नहीं हैवह अभय को कैसे उपलब्ध होगा?जिसे यह भी पक्का नहीं कि मैं भी बचूंगा उन लपटों के पार या नहींवह कैसे अभय को उपलब्ध होगाजिसके पैर के नीचे सारी जमीन खिसकी जाती होजिसकी सारी मुट्ठियों की पकड़ किसी चीज को पकड़ाए न रखेगीजिसके सब सहारे डूब जाएंगेऔर मझधार में जिसकी नौका डूबनी ही है और कोई तट और किनारा जिसे न दिखता होवह कैसे अभय को उपलब्ध हो?
आत्म-ज्ञान के बिना अभय असंभव है।
महावीर ने कहाजो अभय को उपलब्ध हैवही केवल अहिंसक हो सकता है। और अदभुत शर्त लगा दीऔर उस शर्त में सारा भय इकट्ठा कर दिया। आत्म-ज्ञानी ही अभय को उपलब्ध हो सकता हैक्योंकि जो अपने को जानता है वह जानता है कि मृत्यु नहीं है। सब मरेगामैं नहीं मर सकता हूं। सब विसर्जित हो जाएगासब मिट जाएगाभीतर जो चैतन्य सत्ता बैठी हुई हैउसकी मृत्यु नहीं है। जिस क्षण यह दर्शन होता हैजिस क्षण इस अमृत का दर्शन होता हैउसी क्षण जीवन से भय विलीन हो जाता है। जिसका स्वयं का भय विलीन हो गयावह अहिंसक हो जाता हैवह हिंसक नहीं रह जाता है। अहिंसक होने की सीढ़ीअहिंसक होने का मार्ग आत्म-ज्ञान का मार्ग है।
अपने को जानना होगाअपने से परिचित होना होगा। सारे जगत को जानें और अपने से अपरिचितदो कौड़ी का है ज्ञान फिर। उसका कोई मूल्य नहीं है। मैं सारी दुनिया को जान लूं और मेरे भीतर अंधेरा घना हो..इस जानने का क्या होगा?क्या है प्रयोजन?क्या हुआ अर्थ?क्या पायाधोखा हैप्रवंचना हैअपने को समझा लेना है। यह पांडित्य और यह ज्ञान किसी काम का नहीं। महावीर के बाबत सब कुछ जान लूंराम के बाबत सब कुछ जान लूंकृष्ण के बाबत सब कुछ जान लूंऔर यह जो भीतर बैठा हैअपरिचित रह जाऊंदो कौड़ी की है यह सब जानकारी। यह नाहक का मनोरंजन हैअपने समय को खराब कर लेना है। सारे शास्त्र पढ़ डालूं और भीतर जो शास्त्रों का पढ़ने वाला बैठा हैअनपढ़ा रह जाएकुछ नहीं किया मानना होगाकुछ नहीं पाया मानना होगा।
महावीर कहते हैंएक को जान लेने से सब जान लिया जाता है।
उस एक को जानना जरूरी हैउसके जानने का परिणाम अहिंसा होगी। कैसे जानें?
जानते तो हैं अपने को। नाम परिचित है। कितना धन हैबैंक बैलेंस कितना हैवह भी परिचित है। किसका लड़का हूंवह भी परिचित है। किसका भाई हूंकिसका पति हूंवह भी सब परिचित है। लेकिन यह सारा परिचय शरीर का परिचय है। यह शरीर किसी का लड़का होगायह शरीर किसी का पति होगायह शरीर जवान होगा या बूढ़ा होगा। इस शरीर का कुछ नाम होगालेकिन इस शरीर के पीछे जो बैठा हैवह किसी से संबंधित नहीं है। जो भी किसी से संबंधित हैवह मैं नहीं हूं। भीतर एक चेतना है असंग और असंबंधितजिसका न कोई जन्म हैन मृत्यु है। उसको जानना होगा। उसका परिचय ही आत्म-ज्ञान बनेगा।
हम शरीर पर ठहर जाते हैंजीवन शरीर पर केंद्रित होकर घूम लेता है और समाप्त हो जाता हैशरीर की वासनाएंशरीर की दौड़शरीर की आकांक्षाशरीर की प्यास, उसी में व्यय हो जाता हैऔर उसको देख ही नहीं पाते हैं जो शरीर की इस कारा के पीछे खड़ा है। जो शरीर का मालिक थाजो शरीर में बसा थानिवासी थाउस अदेही कोजो देह में बैठा हुआ हैहम नहीं जान पाते हैंदेह की दौड़ ही सब रिक्त कर देती है!
महाराष्ट्र में एक साधु हुआएकनाथ। एक व्यक्ति ने एकनाथ से एक सुबह पूछा थानाथजीआपको देखते हैंएक प्रश्न मन में बार-बार उठता है। क्या आपके मन में पाप पैदा नहीं होता?वासना नहीं उठती?विकार नहीं जगते?विषाक्त पशु आपके भीतर गति नहीं करते?नाथजी ने कहाउत्तर अभी दूंएक मिनट ठहर जाओएक बहुत जरूरी बात कह दूं। फिर उत्तर दे दूंगाकहीं भूल न जाऊं। कल अचानक तुम्हारे हाथ पर नजर पड़ीदेखा मृत्यु की रेखा टूट गई है। सात दिन औरऔर तुम समाप्त हो जाओगे। सात दिन बाद सूरज डूबातुम्हारा भी डूबना है। यह बता दूंकि कहीं भूल न जाए इसलिए। अब पूछोक्या पूछते हो?
उस आदमी के हाथ-पैर कंप गए। सात दिन औरकेवल सात दिनउसके भीतर तो अचानक उदासीअवसाद घना हो गया। वह बोलाफिर मैं आऊंगा प्रश्न पूछनेअभी कोई प्रश्न नहीं पूछना। नाथजी ने बहुत कहारुकोबड़ा कीमती प्रश्न थाअच्छी चर्चा होती। वह बोलाफिर आऊंगा। अभी चर्चा करने का कोई रस न रहा। मृत्यु ने सारा रस विरस कर दिया है।
उठाराह पर चलता थापैर कंपने लगेमृत्यु का भाव घना हो गयाद्वार पहुंचागिर पड़ाचेहरा काला पड़ गयाइतने से मार्ग मेंलोगों ने उठा कर घर बिठायापूछाक्या हुआबताया कि सात दिन और..आवाज ऐसी आती थीजैसे दूर गड्ढे से आती होडूब गई आवाज। लेट गया बिस्तर पर। दूसरे दिन सबसे क्षमा मांग आया किसी तरह चल करपैर छू आयाजिनसे कभी भूल-चूक हुई थीदो कडुवे शब्द कहे थे। बिस्तर पर लग गयारोज घड़ी-घड़ी मौत करीब आने लगी। एक-एक क्षण लंबा हो गयाबीतना कठिन हो गयाएक ही प्रतीक्षा रह गईकमरे में आसन्न मृत्यु की छाया घनी होने लगीमृत्यु करीब से करीब उसकी खाट के चली आती थीमृत्यु ही रह गई थीऔर कुछ न था। सारी वासनाएंसारे विकारसबकी जगह मृत्यु खड़ी हो गई थीमृत्यु ही ठंसी थीहाथ हिलाता था तो मृत्यु लगती थीअनुभव होती थीआंख खोलता था तो मृत्यु दिखती थीश्वास लेता था तो मृत्यु ही श्वास में भीतर-बाहर हो रही थीसब मृत्युमय हो गया था!
सातवें दिन सूरज डूबने के घड़ी भर पहले एकनाथ उसके घर गए। भीतर गएघर के लोग रोने लगे थे। उसकी आंख से आंसू टपक रहे थे। करीब आ गई थी घड़ीऔर थोड़ी देर थी। और क्षण कुछ सरकेंगेऔर सब समाप्त हो जाएगा। सब बनाया हुआसब इकट्ठा किया हुआसब जिसे जाना कि अपना हैसब जो मेरे मैं को भरता थासब विसर्जित हो जाएगा। सारी दौड़-धूप स्वप्न हुई जाती थी। नाथजी ने जाकर पूछामित्रएक बात पूछने आया हूं। उसने आंख खोली। मरणासन्न व्यक्तिआंखें डूब गई थींजीवन की ज्योति बुझ गई थी। नाथजी ने पूछाएक प्रश्न पूछने आया हूंसात दिन में कोई पापकोई विकारकोई वासना मन में उठीउस आदमी ने कहाक्यों मजाक करते हैं नाथजीमृत्यु इतने करीब थी कि मेरे और उसके बीच किसी पाप को उठने की गुंजाइश नहीं थी। मृत्यु इतने करीब थी कि विकार उठ आएइसके लायक भी फासला मेरे और उसके बीच नहीं था।
नाथजी ने कहातेरी मृत्यु अभी आई नहींकेवल तेरे प्रश्न का उत्तर दिया है।
सात दिन बाद मृत्यु हो या सत्तर वर्ष बाद, क्या अंतर पड़ता है?सात दिन बाद समाप्त हो जाता हो या सत्तर वर्ष बाद यह शरीरतो क्या अंतर पड़ता है?सच ही सात दिन में और सत्तर वर्ष में कोई अंतर है?एक स्वप्न सात दिन का देखा या सत्तर वर्ष काकोई भेद पड़ेगा?
नाथजी ने कहा थातू अभी मरने को नहींउत्तर दिया है! मुझे मृत्यु दिखती है। यह शरीर मरेगा। जिस दिन से यह दिखा कि यह शरीर मरेगाउसी दिन से शरीर से सारी आसक्ति विलीन हो गई है।
मृत्यु के प्रति कोई आसक्त नहीं हो सकता है। मृत्यु के प्रति आसक्त होना असंभव है। केवल हम जीवन के प्रति आसक्त हो सकते हैं। हम शरीर को जीवन मानते हैंइसलिए आसक्त हैं। लेकिन अगर हम दोहराएंसमझाएं अपने को कि हम शरीर नहीं हैंयह शरीर तो मरेगाहम तो अमृत हैंहम तो नित्य आत्मा हैंअगर हम ऐसा समझाएंविचार करेंचिंतन करेंतो क्या कुछ उपलब्ध हो जाएगा?
इस चिंतन से कुछ भी न होगायह तो भ्रम है। इस तरह का चिंतन कोई धोखा न दे पाएगा आपको। किसी को उसने कभी धोखा न दे पाया। वरन जब मैं यह कह रहा हूं और अपने को समझा रहा हूंकि अरे यह शरीर तो मरेगाइसको छोड़ोछोड़ोतब जानना चाहिए कि मैं जान नहीं रहा कि शरीर मरेगा। जो जानेगा कि शरीर मरेगाएक क्षण भी जान लेनासमझाने का प्रश्न बाकी नहीं रह जाता। अज्ञान में केवल समझाना है। ज्ञान खोल जाता है आंखभेद स्पष्ट हो जाता हैसमझाना नहीं होता। मैं आपको नहीं कहता कि अपने मन में इसका चिंतन करें कि मैं देह नहीं हूं। वही इस चिंतन को करेगाजो जानता है कि देह है। मैं चिंतन को नहीं कहता। यह चिंतन व्यर्थ है। मैं जानने को कहता हूं।
महावीर का मार्ग चिंतना का मार्ग नहींमहावीर का मार्ग विचार का मार्ग नहींजानने काआंख खोल कर देख लेने का मार्ग है। महावीर का मार्ग श्रद्धा का मार्ग नहींअंधी श्रद्धा का मार्ग नहींबहुत वैज्ञानिक है। जिसे जान लेनादेख लेनाउसे मान लेना। उसके पहले कोई मान्यता किसी काम की नहीं है। वे सब डूबते हुए आदमी की थोथी अपनी धारणाएं हैं आलंबन कीझूठे आसरों कीझूठे सहारों की। कोई झूठा सहारा काम न देगा। कोई इस तरह की झूठी शरण काम नहीं देगीजानना होगा।
और जाना जा सकता है। इसी जानने की प्रक्रिया को हम दर्शन कहते हैं। भारत ने जो पैदा किया हैवह फिलासफी नहीं है। और नासमझ हैं वेजो फिलासफी और दर्शन को पर्यायवाची समझते हैंफिलासफी है चिंतनासोचनाविचारना..जो अज्ञात है उसके संबंध में सोच-विचार करना।
लेकिन जो अज्ञात हैउसके संबंध में सोचिएगा क्या?जिसको देखा नहींजाना नहींजिससे परिचित नहींउसके संबंध में चिंतन क्या करिएगासब चिंतन गलत होगा।
भारत सोच-विचार को नहींदेखने कोआंख खोल लेने को कहता है।
भारत कहता हैसत्य देखा जाता हैविचारा नहीं।
महावीर की पूरी धारणा दर्शन की हैचिंतन की नहीं। दर्शन हो सकता है। उसका दर्शन हो सकता हैजो भीतर बैठा है। उसकीदर्शन उसकी शक्ति हैउसकी क्षमता हैउसका स्वरूप है। वह सारे जगत को कौन देख रहा हैमैं आपको देख रहा हूंमैं सारे जगत को देख रहा हूं। देखना मेरी क्षमता हैसिर्फ जिस देखने की क्षमता से मैं सबको देख रहा हूंउसका उपयोग मैं अपने पर करना नहीं जानता हूंजो देखना सारे जगत पर प्रतिफलित हो रहा हैवह मैं अपने पर प्रतिफलित करना नहीं जानता हूंजो आंख सब पर खुली हैवह अपने पर खोलना नहीं जानता हूं..इतनी ही दिक्कतइतनी ही परेशानी है।
रास्ता हैमहावीर कहते हैंजो दृश्य को देख रहा हैवह द्रष्टा को देख सकता है। और उस द्रष्टा को देखते ही जीवन का सारा दुखसारी पीड़ासारा अज्ञान गिर जाएगा।
मैं देख रहा हूंइतना तो तय है। स्वप्न ही सहीदेख रहा हूंइतना तो तय है। रात मैंने स्वप्न देखासुबह उठापायास्वप्न झूठा था। होगा स्वप्न झूठालेकिन मैंने देखा इतना तो सही है। होगा यह जगत मायाहोगा यह संसार व्यर्थहोगा यह असारलेकिन मैंने देखा। देखना तो सत्य है। दृश्य हो सकता है असत्यद्रष्टा असत्य नहीं हो सकता है। दृश्य हो सकता है भ्रामकहो सकता है मृग-मरीचिकादेखने वाला मृग-मरीचिका नहीं हो सकता है। द्रष्टा एकमात्र सत्य है जीवन के केंद्र पर खड़ा हुआजो देख रहा है। लेकिन उस देखने की क्षमता पर से घिरी हुई है। उस देखने के सामने पर खड़ा हुआ हैविजातीय खड़ा हुआ है। अगर मैं पर को अलग कर दूं देखने की क्षमता के सामने सेअगर द्रष्टा के सामने से पर को अलग कर दूंतो देखने की क्षमता जो पर को देखती थीपर को न पाकरपर के आलंबन के आधार को न पाकर स्व आधार पर लौट आती है। अगर बाहर कुछ देखने को न रह जाएतो जो सब को देखता थास्वयं को देख लेता है।
द्रष्टा के सामने से पर का विसर्जन ध्यान हैसामायिक है।
द्रष्टा के सामने से पर का विसर्जनपर का अलग कर देनापर का हटा देनास्वयं में प्रतिष्ठित हो जाना है। आंख खोलता हूंआपको देख रहा हूं। आंख बंद कर लूंगा तो भी आपको देखूंगा। आपके चित्रआपके प्रतिबिंबआपकी स्मृतियां घूमेंगी। आंख खोलता हूं तो बाहर हूंआंख बंद करता हूं तो भी बाहर हूं। बाहर से बने हुए चित्रबाहर से बने हुए इम्प्रेशंसबाहर से आए हुए संस्कार फिर मुझे घेरे रहते हैं। अभी वास्तविक वस्तुएं घेरी हैंफिर आंख बंद करता हूं तो वस्तुओं के विचार घेरे रहते हैंलेकिन बाहर ही हूं। आंख खोल कर भीआंख बंद करके भीयह मेरा निरंतर बाहर होना मेरा बंधन है। थोड़ी देर को वस्तुओं से आंख बंद कीविचार से भी आंख बंद कर लेनी है।
इसको महावीर ने निर्जरा कहा है। जो बाहर से मुझ पर आया है..जो भी बाहर से मुझ पर आया हैउसी विजातीय ने मुझको घेरे में बंद कियाआबद्ध किया। उस बाहर से आए हुए प्रभाव को विसर्जित कर देना निर्जरा है। बाहर का बाहर छोड़ देनाऔर भीतर वही बच जाए जो बाहर से नहीं आया..तत्क्षणउसी क्षण कुछ दिखेगाजो सब बदल जाता हैसब परिवर्तित कर जाता है। कुछ नए आयाम मेंनए डायमेंशन मेंनई भूमि में उठना हो जाता है। महावीर की यह वैज्ञानिक धारणा निर्जरा की अदभुत है। और वही है मार्ग। वही है मार्गवही है योगवही है सब कुछवही है विज्ञानवही है प्रयोगशाला व्यक्ति की अपने में जाने की।
स्मरण करेंकुछ भी है हमारे मन में जो बाहर से न आया हो?कुछ भी है हमारे चित्त में जो बाहर का प्रतिफलन न हो?कुछ भी है ऐसी चीज जो बाहर की धूल की तरह हम पर नहीं जम गया हैजो भी बाहर से आया होउस पर आंख बंद कर लेनी है। उसे देखना हैलेकिन जानना है कि वह पर है और बाहर से आया हैऔर वह मैं नहीं हूं।
अगर व्यक्ति अपने भीतर थोड़ी देर भी बैठ कर सिर्फ इस विवेक को जाग्रत करता रहे कि क्या बाहर से आया हैवह मैं नहीं हूं। सिर्फ इस होश को भीतर पैदा करता रहे कि यह बाहर से आया हैयह मैं नहीं हूं। यह बाहर से आया हैयह मैं नहीं हूं। यह बाहर से आया हैयह मैं नहीं हूं। निषेध करता चले उस क्षण तकजब तक बाहर से आया हुआ कुछ भी डोलता हो चित्त में।
और हैरान होगामैं उसे अपना मान लेता थाइसलिए वह आता था। वे बाहर से आए हुए संस्कार इसलिए ठहर जाते थेमैं उन्हें अपना मान कर ठहरा लेता था इसलिए। जिस क्षण मैंने उनके साथ यह जाना कि वे मेरे नहींवे बाहर से आए हुए यात्री हैंआएंगे और चले जाएंगे। मैं यात्री नहीं हूंमैं अतिथि नहीं हूंआतिथेय हूंमैं होस्ट हूंगेस्ट नहीं। वे जो गेस्ट आए हैंचले जाएंगेमैं तो उनका मेजबान हूं।
अतिथि में और आतिथेय में फर्क कर लेना आत्म-ज्ञान है।
अतिथि मेंआतिथेय मेंगेस्ट में और होस्ट में फर्क कर लेना आत्म-ज्ञान है।
जो बाहर से आयावह अतिथि है। उसे मैं जानूंदेखूंपरिचित होऊं और होश रखूं कि वह मैं नहीं हूं। और अगर...इसको महावीर ने भेद-विज्ञान कहाइस भेद का विज्ञान। इस भेद को धीरे-धीरे थिर करनाइस भेद में स्थित होना। धीरे-धीरे जिसको मैं अतिथि जानूंगाउससे झगड़ने का कोई कारण नहीं हैजानना पर्याप्त है। जान लेंयह मेरा नहींमेरे भीतर से नहीं आया। आएचला जाएमैं दर्शक बना रहूंमैं तटस्थ द्रष्टा रह जाऊं।
धीरे-धीरे यह तटस्थ द्रष्टा का बोधयह सम्यक द्रष्टा का बोध पर को विसर्जित कर देगापर को विलीन कर देगा। दृश्य विलीन होते चले जाएंगेस्वप्न गिरते चले जाएंगे और एक दिन अचानकअनायास जहां जगत दिखता थावहां शून्य खड़ा रह जाएगा। जैसे अचानक प्रोजेक्टर बंद हो गया होपीछे फिल्म को बनाने वाली मशीनचलाने वाली मशीन बंद हो गई होपर्दा खाली रह जाएचित्र न होंसफेदवैसे ही किसी दिन धीरे-धीरे सामायिक के इस प्रयोग केतटस्थ द्रष्टा के इस प्रयोग के माध्यम से प्रोजेक्टर बंद हो जाएगा। सामने जगत विलीनकोरा आकाश रह जाएगा..शून्य।
इस शून्य की परिपूर्ण स्थिति को महावीर ने शुक्ल-ध्यान कहा है। जिस क्षण कुछ भी न रह गयादृश्य सब शून्य हो गयाउसी क्षण..तत्क्षण ज्यादा ठीक हो कहना..ठीक उसी क्षणजैसे ही वहां शून्य हुआजो सबको देखता थावह अपने पर लौट आता है। जो दूसरों के घरों पर उड़ता फिराजिसने दूसरों के डेरों को अपना आधार बनायाजो दूसरी भूमियों में विचरण कियाकोई आधार न पाकरनिराधार शून्य में छूट कर..और शून्य में कुछ भी नहीं रह सकता है..शून्य में आधार न पाकर स्व-आधारित हो जाता हैस्वयं प्रतिष्ठित हो जाता हैस्वयं में लौट आता है। आत्मा आत्मा पर लौट आती है।
इस क्षण दिखता है अमृतजिसकी कोई मृत्यु नहीं। इस क्षण दिखता हैजिसमें कोई भय की संभावना नहीं। जैसे गीता में उन्होंने कहा हैन हन्यते हन्यमाने शरीरे..जोशरीर मर जाएगातब भी नहीं मरेगा। जिसे चिता की लपटें नहीं जला सकतींजिसे कुछ भी नष्ट और विकृत नहीं कर सकता..अच्युतशाश्वतनित्य..उसके जब दर्शन होंगेअनायाससहज। इस दर्शन के कारण जीवन अहिंसक हो जाता है। इस दर्शन के कारण जीवन में अहिंसा फैल जाती है। इसके अतिरिक्त और अहिंसा तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है।
आत्म-ज्ञान है मार्ग अहिंसा का।
और अगर विश्व को बचा लेना हैऔर अगर मनुष्य को कोई भविष्य और नियति देनी हैतो एक-एक व्यक्ति तक आत्म-ज्ञान की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को पहुंचा देना जरूरी है। महावीर कोउनके विचार को घेरों को तोड़ कर सब तक पहुंचा देना जरूरी है। महावीर अहिंसक होने को नहीं कह रहे हैंमहावीर आत्म-ज्ञानी होने को कह रहे हैं..अहिंसा तो अपने से चली आएगी। आत्म-ज्ञान जागेलोग अपने को जानेंअमृत को पहचानेंनित्य को पहचानेंप्रबुद्ध को पहचानेंउसकोजो कभी बंधन में नहीं गिराउस मुक्त को पहचानेंतो हम सारे जगत को एक नई मनुष्यता में परिवर्तित कर सकते हैं।
अणु का उत्तर आत्मा हैविज्ञान का उत्तर धर्म है। फैले हुए विकृति और विकार का उत्तर संस्कृति है। केवल आत्म-ज्ञानी संस्कृत होता है।
अज्ञानी प्रकृत होता है। और अज्ञानी अगर अज्ञान में तृप्त हो जाए तो विकृत हो जाता है। अज्ञानी प्रकृत होता है। और अगर अज्ञानी ऊपर उठने की आकांक्षा भी छोड़ दे ज्ञान तक तो विकृत हो जाता है। और अगर ऊपर उठने की आकांक्षा से भरेसंस्कृत होता चलता है। जिस दिन भीतर परिपूर्ण आत्म-ज्ञान उदय होता हैउसी दिन व्यक्ति सुसंस्कृत होता है।
जगत को संस्कृति देनी है। और संस्कृति तो हिंसक नहीं हो सकतीकेवल विकृति हिंसक हो सकती है। जगत को संस्कृति देनी हैतो आत्म-ज्ञान की आकांक्षा देनी जरूरी हैप्यास को जगाना जरूरी है। एक-एक आदमी के भीतर जो सोया हैवह जो प्रदीप्त हो सकता हैलेकिन प्रसुप्त हैवह जो जाग सकता हैलेकिन सोया हैनींद में हैवह जो अमूच्र्छितअप्रमत्त हो सकता हैलेकिन मूच्र्छित और बेहोश में है..उसे पुकारना जरूरी है।
एक-एक व्यक्ति के भीतर पुकार देनी जरूरी है कि जागो और जगाओ अपने को। तुम्हारा जागरण सारे जगत की रक्षा हो सकता है। एक-एक व्यक्ति का जागरण सारे जगत की रक्षा हो सकता है। एक-एक व्यक्ति का अपने में प्रतिष्ठित हो जाना विश्व की विकृति के संस्कृति में बदलने का मार्ग बन सकता है।
ये थोड़ी सी बातें मैं कहा हूं। बहुत प्रीति सेआनंद से आपकी आंखों को देख रहा हूंपहचान रहा हूं। बहुत प्यार से इन बातों को सुनाउसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं।
अंत में एक ही प्रार्थना करता हूंजगाएंअपने भीतर पुकारें उसकोजो सोया है। अगर वह महावीर में जग सकाबुद्ध में जग सकाकोई कारण नहीं है कि हमारे भीतर नहीं जगेगा। ठीक ऐसे ही हड्डी-मांस के लोग वे थे। ठीक इन्हीं विकृतियोंइन्हीं सीमाओं में घिरे हुएजो हमारी हैं। अगर वे जाग सकेतो अपमान है हमारा कि हम न जाग सकेंतिरस्कार है हमाराअगर हम न जाग सकेंअगर एक भी मनुष्य कभी जागा हैप्रत्येक दूसरा मनुष्य जाग सकता है। क्यों न वह दूसरा मनुष्य मैं हो जाऊंयही प्रार्थना हैवह दूसरा मनुष्य होने का प्रत्येक प्रयास करेप्रत्येक आकांक्षा से भरेप्रत्येक अतृप्त हो जाएप्यास से पुकारे अपने भीतर..निश्चित जागरण हो सकता है।
इस प्रार्थना के साथ अपनी बात को पूरा करता हूं और आप सबके भीतर बैठे हुए उस सोए हुए को प्रणाम करता हूंजो जाग जाए तो प्रभु हो सकता हैऔर सो जाए तो पशु हो सकता है। 

मेरे प्रणाम स्वीकार करें। 




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