12 अपने माही टटोल।

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बुधवार, 22 अगस्त 2018

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-05)

अपने माहिं टटोल--(साधना-शिविर)

पांचवां प्रवचन-यांत्रिक जीवन से मुक्ति

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य के सत्य की खोज में जो पहली बाधा, जो पहला अटकाव, जो पहला बंधन है, उसे तोड़ने की बात हमने कल की। वह ज्ञान, जो हमें दूसरों से मिलता है, हमारे अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक है। वह इसलिए ज्यादा खतरनाक है कि उसके द्वारा हमारा अज्ञान मिटता तो नहीं, छिप जरूर जाता है, ढंक जाता है। और वह बीमारी जो ढंकी हो, उस बीमारी से खतरनाक होती है, जो खुली हो, उघड़ी हो, स्पष्ट हो। दूसरों के ज्ञान से, दूसरों के शब्दों और विचारों से, शास्त्रों और सिद्धांतों से हम कुछ जानते नहीं, लेकिन जानने लगे हैं, इस भ्रम में जरूर पड़ जाते हैं। शब्द सीख लिए जाते हैं और यह भ्रम पैदा हो जाता है कि सत्य सीख लिया गया है। ऐसे शब्दों, ऐसे ज्ञान, ऐसे उधार बासे विचारों पर मस्तिष्क मुक्ति तो नहीं खोज पाता, और नये-नये भ्रमजाल, और नई-नई कल्पनाओं, और नये-नये बंधनों में ग्रसित हो जाता है।

यह ज्ञान छोड़ना जरूरी है। इस ज्ञान को छोड़ने के लिए कोई प्रयास भी नहीं करना होगा। यह स्मरण भर हमें आ जाए, यह समझ, यह अंडरस्टैंडिंग भर हमें हो कि जो मेरा नहीं है, जो मैंने नहीं जाना, जो मेरा अनुभव नहीं है, जिसने मेरे प्राणों में आंदोलन नहीं लिया, जिसे मेरे हृदय ने पहचाना नहीं है, जिसे मेरी आत्मा ने जीया नहीं है, वह ज्ञान ज्ञान नहीं है। यह स्मरण भर आ जाए, तो उस भवन के गिर जाने में कोई कठिनाई नहीं है, जो हमने उधार और दूसरों के विचारों पर खड़ा कर लिया है। यह पहली कड़ी थी, जो कल मैंने इस संबंध में आपसे बात की। आज और एक दूसरी कड़ी पर आपसे बात करूंगा।
और पहली कड़ी को समझ लेना तो फिर भी आसान था कि दूसरों का ज्ञान हमारा ज्ञान नहीं है, आज और थोड़ी सी कठिन बात पर आपसे चर्चा करनी है। वह शायद और भी मुश्किल मालूम होगी समझने में। लेकिन थोड़ी भी समझपूर्वक कोशिश की गई, तो उसे भी समझ लेना कठिन नहीं है। वह दूसरी बात यह है कि मनुष्य को यह भी भ्रम है कि वह कुछ करता है। ज्ञान तो उसका झूठा है, उसके कर्ता होने का बोध भी झूठा है, उसके कर्म का बोध भी झूठा है।
मनुष्य करीब-करीब एक यंत्र की भांति जीता है, एक चेतना की भांति नहीं। मनुष्य एक कांशसनेस की भांति नहीं जीता, एक आत्मा की भांति नहीं जीता, जीता है एक मशीन की भांति, एक यंत्र की भांति। पंखे चल रहे हैं; हमने उनकी बटनें दबा दी हैं और उन्होंने चलना शुरू कर दिया है। अगर इन पंखों को यह भ्रम पैदा हो जाए कि हम चल रहे हैं, तो वह पंखों का अज्ञान होगा। पंखे चलाए जा रहे हैं, चल नहीं रहे हैं। मशीनें चलाई जाती हैं, चलती नहीं हैं। मनुष्य भी चलता नहीं है, केवल चलाया जाता है। लेकिन उसे यह ख्याल है--और यह ख्याल उसके जीवन में सबसे बड़ी जंजीर है--उसे यह ख्याल है कि मैं चलता हूं। उसे यह ख्याल है कि मैं करता हूं। उसे यह ख्याल है कि मैं करने वाला हूं।
आपने कई बार कहा होगाः कल मैंने क्रोध किया। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि क्रोध आपने कभी किया है आज तक जीवन में या कि क्रोध हुआ है? आपने क्रोध किया, ऐसा आपने सोचा होगा बहुत बार; लेकिन थोड़ा समझेंगे, तो दिखाई पड़ेगाः क्रोध किया नहीं है, क्रोध हुआ है। और आप क्रोध में करने वाले नहीं थे, केवल एक मशीन की भांति चालित हुए थे। कोई आपको धक्का दे दे, तो आपके भीतर जो क्रोध उठता है, वह सचेतन नहीं है, वह कांशस नहीं है, वह आपके विचारपूर्वक नहीं है, वह बिल्कुल यांत्रिक है। जैसे कोई बटन दबा दे और पंखा चल जाए, वैसे ही कोई धक्का दे दे तो भीतर क्रोध उठ आता है। इस क्रोध के आप मालिक नहीं हैं, इस क्रोध को करने वाले आप नहीं हैं।
लेकिन हम कहते रोज यही हैं कि मैंने क्रोध किया। झूठ है यह बात। न आपने कभी क्रोध किया है, न आपने घृणा की है और न प्रेम किया है। प्रेम जिनके जीवन में पैदा होता है, वे जानते हैं भलीभांति इस बात को कि यह कहना गलत है कि मैंने प्रेम किया, यही कहना ठीक है कि प्रेम हुआ, इट हैपंस, हो जाता है, आप करते नहीं हैं। लेकिन कहते हम यही हैं कि मैंने प्रेम किया। यह आपके वश में है प्रेम करना? तो मैं एक आदमी को आपके सामने बिठा दूं और कहूं कि चलिए इसे प्रेम करिए! आप प्रेम कर पाएंगे? एक आदमी को आपके सामने बिठा दिया जाए और कहा जाए, चलिए इस पर क्रोध करिए! आप क्रोध कर पाएंगे? जितनी आप कोशिश करेंगे क्रोध करने की, आप पाएंगेः कोई क्रोध नहीं उठ रहा है। चाहे आप मुट्ठियां बांधें और चाहे आप दांत पीसें, लेकिन आप पाएंगेः भीतर कोई क्रोध नहीं है, और यह सब एक्टिंग है और झूठी है, अभिनय है। जब आप जान कर एक भी बार क्रोध नहीं कर पाते हैं, तो जब आप क्रोध करते हैं वह कैसा होगा? वह अनजाना होगा, आपके बिना जाने हो रहा है। और जो आपके बिना जाने हो रहा है, उसके आप मालिक नहीं हो सकते। जो आपके अनजाने हो रहा है, उसके आप मालिक नहीं हैं, उसके आप गुलाम हैं और आप मशीन की भांति व्यवहार कर रहे हैं।
सामान्यतया हमारा पूरा जीवन एक यंत्र की भांति है, जिसमें हमारी कोई मालकियत, जिसमें हमारा कोई स्वामित्व नहीं है। आपके भीतर लोभ है, आप अपने लोभ के मालिक हैं? आपने लोभ को पैदा किया है? आपके भीतर सेक्स है, आप सेक्स के मालिक हैं? उसे आपने पैदा किया है? नहीं, आपने उसे पाया है। बच्चा युवा होता है और अचानक पाता है कि उसके भीतर काम ने, सेक्स ने एक तीव्र उभार लिया है, उसके भीतर कोई नई वासना जागने लगती है। जिसे वह जागते हुए पाता है, लेकिन जिसका वह मालिक नहीं है। वह वासना बिल्कुल अचेतन है, उसका उसे कोई होश नहीं, कोई बोध नहीं। लेकिन शायद वह कहता यही होगा, यह वासना मेरी है।
अगर हम अपने चित्त का ठीक-ठीक विश्लेषण करें और अपने कर्मों का भी, तो हम पाएंगेः वे हमसे होते हैं, हम उनके करने वाले नहीं हैं। और यह कर्ता का भ्रम है कि मैं कर रहा हूं। न आप अपने जन्म के मालिक हैं, आप पैदा हुए हैं। न आप अपने जीवन के मालिक हैं, जीवन आपको मिला है। न आप अपनी मृत्यु के मालिक हैं, मृत्यु घटित होगी। आप अपनी श्वास के भी मालिक नहीं हैं, जो भीतर और बाहर आ-जा रही है। लेकिन कहते हम यही हैं कि मैं श्वास ले रहा हूं। इससे ज्यादा झूठी बात आदमी ने कभी नहीं कही होगी। आप श्वास ले रहे हैं? तब तो फिर आपकी मृत्यु होनी असंभव है। मृत्यु खड़ी हो जाएगी, आप श्वास लिए ही चले जाना। लेकिन हम भलीभांति जानते हैं कि जो श्वास बाहर चली गई और नहीं लौटने को है, तो हम उसे नहीं लौटा सकेंगे।
तो यह कहना गलत है कि मैं श्वास ले रहा हूं। यही कहना ठीक है कि श्वास आ रही है, जा रही है, मैं कहां आता हूं इसमें!
यह कहना गलत है कि मेरा जन्म-दिन। मुझसे पूछा था किसी ने? मेरा कोई वश है मेरे जन्म पर? मेरा कोई अधिकार है? मेरी कोई स्वीकृति है?
नहीं, मैं कहीं भी नहीं आता हूं। जीवन जन्मता है। लेकिन मैं कहता हूंः मेरा जन्म! श्वास चलती है, लेकिन मैं कहता हूंः मेरी श्वास! मैं ले रहा हूं। क्रोध उठता है, काम उठता है, लोभ उठता है और मैं कहता हूंः मेरा क्रोध! मेरा प्रेम! मेरी घृणा! मेरे मित्र! मेरे शत्रु! बहुत अनजाने और बहुत नासमझी से, जो सारी क्रियाएं बिल्कुल यांत्रिक, मैकेनिकल हैं, उनके हम स्वामित्व की घोषणा करने लगते हैं और कहते हैं कि मैं इनका मालिक हूं।
इस बात की कसौटी इससे हो सकेगी कि अगर आपके भीतर क्रोध हो और आप न चाहें तो न हो, तो हम समझ सकेंगे कि आप क्रोध करते हैं। एक आदमी आपको गाली दे, आप चाहें तो क्रोध हो और चाहें तो क्रोध न हो, तो हम समझेंगे कि क्रोध के आप कर्ता हैं, क्रोध के आप मालिक हैं। लेकिन अगर आपके बिना चाहे सब होता है, तब तो बड़ी कठिनाई है।
बुद्ध एक गांव के पास से निकले। कुछ लोगों ने आकर बुद्ध को गालियां दीं और अपमानजनक शब्द कहे। वे बड़े क्रोध में थे। बुद्ध ने कुछ ऐसी बातें कही थीं कि उनके पुराने धर्मों की जड़ें हिल गई थीं। और बुद्ध ने कुछ ऐसी बातें कही थीं कि उनकी परंपरागत रूढ़ियों पर चोट पड़ी थी। वे गांव के क्रुद्ध लोग, उन्होंने बुद्ध को रास्ते पर घेर लिया और बहुत गालियां दीं। थोड़ी देर बाद बुद्ध ने कहाः मेरे मित्रो, अगर तुम्हारी बात पूरी हो गई हो तो मैं जाऊं, मुझे दूसरे गांव जल्दी पहुंचना है।
वे थोड़े हैरान हुए और उन्होंने कहाः हमने क्या कोई ऐसी बातें कही हैं कि आप इतनी शांति से यह कहें कि मुझे दूसरे गांव जाना है, आपकी बातें पूरी हो गईं क्या? हमने दी हैं गालियां, अपमानजनक शब्द, विषभरी बातें। क्या आपके भीतर कोई क्रोध पैदा नहीं हुआ?
बुद्ध ने कहाः तुमने थोड़ी देर कर दी, दस साल पहले आना चाहिए था, तब क्रोध होता था, घृणा होती थी, तब सब होता था। क्योंकि मैं मौजूद नहीं था, मैं अनुपस्थित था। मैं अपने जीवन के प्रति सचेतन नहीं था, जाग्रत नहीं था, सोया हुआ था, सब होता था। दस साल पहले आना था। तुम बड़े बेवक्त आए हो। अब मैं जागा हुआ हूं। और अब तुम जो चाहो वही मेरे भीतर नहीं हो सकता। अब तुम मेरे मालिक नहीं रहे। मैं जब सोया हुआ था, तब तुम मेरे मालिक थे। अब मैं जागा हुआ हूं, मैं अपना मालिक हूं। तुमने गालियां दीं, ठीक, लेकिन मैं गालियां लेने से इनकार करता हूं। तुमने मेहनत की, श्रम उठाया, तुम गांव के बाहर इस भरी दोपहरी में आए और तुमने न मालूम कितनी पीड़ा झेली होगी, तभी तो तुम इतने विषभरे शब्द बोल सके। लेकिन, ठीक, तुमने बोला। लेकिन तुम अकेले थोड़े ही इस लेन-देन में हो, मैं भी तो भागीदार होना चाहिए। तुमने दिया, मुझे लेना चाहिए, तभी तो गाली अर्थपूर्ण होगी। लेकिन मैं लेने से इनकार करता हूं। तुम बड़ी मुश्किल में पड़ोगे, अब इन गालियों का क्या करोगे? कहां ले जाओगे? क्योंकि पिछले गांव में कुछ लोग फूल और फल और मिठाइयां लेकर आए थे और मैंने उनसे कहा कि मित्रो, मेरा पेट भरा है, तो वे वापस ले गए, उन्होंने क्या किया होगा?
भीड़ में से किसी ने कहाः अपने घर ले गए होंगे, अपने बच्चों को बांट दी होगी।
तो बुद्ध ने कहाः तुम बड़ी मुश्किल में पड़ गए। तुम गालियां लेकर आए हो, तुम्हें भी वापस ले जाना पड़ेगा। किसको बांटोगे? किसको दोगे ये गालियां? मैं लेने से इनकार करता हूं। मैं अपना मालिक हूं।
लेकिन कोई जब आपको गाली देता है, तब आप लेने से इनकार कर पाते हैं? नहीं, वह दे भी नहीं पाता और आप पाते हैं कि आप ले चुके हैं। उसकी गाली पूरी भी नहीं हो पाती कि आप तक पहुंच गई होती है। उसकी गाली समाप्त भी नहीं हो पाती कि आपके भीतर कुछ होना शुरू हो जाता है, जो क्रोध है। आप इस क्रोध के मालिक कैसे हो सकते हैं? दूसरा है आपका मालिक, जो गाली दे रहा है। उसके हाथ में है आपकी चाबी। हम सब बाहर से चालित हैं, हम सबको कोई चला रहा है। एक आदमी दो मीठे शब्द बोल देता है और हम प्रसन्न हो जाते हैं। वह हमारी प्रसन्नता और मुस्कुराहट हमारी नहीं है। एक आदमी गाली दे देता है, हम दुखी हो जाते हैं। वह दुख भी हमारा नहीं है। दोनों बाहर से पैदा किए गए हैं।
तो इस संबंध में दो तथ्य आपसे कहना चाहता हूं। पहलाः मनुष्य के जितने कर्म हैं, सभी यांत्रिक हैं। दूसराः मनुष्य के जितने कर्म हैं, उन्हें कर्म भी कहना ठीक नहीं, वे प्रतिकर्म हैं, वे रिएक्शंस हैं, एक्शंस भी नहीं। ये दो बातें सबसे पहले आज की सुबह आपसे कहना चाहता हूं। मनुष्य के कर्म यांत्रिक हैं। यांत्रिक से मेरा अर्थ हैः मनुष्य उन्हें करते वक्त सचेतन रूप से नहीं कर रहा है। कर रहा है, उसे खुद भी पता नहीं है--वह क्यों कर रहा है? उसे खुद भी कोई पता नहीं है--क्यों हो रही हैं ये बातें उसके भीतर?
आपको पता है, क्यों आपके भीतर क्रोध पैदा होता है? आपको पता है, क्यों आपके भीतर अहंकार पैदा होता है? आपको पता है, क्यों लोभ पैदा होता है? आपको पता है, क्यों सेक्स पैदा होता है? कुछ भी पता नहीं है। अंधी ताकतों के हाथ में हम एक खिलवाड़ से शायद ज्यादा नहीं मालूम होते। कुछ होता है, और हम उसके शिकार हैं। क्यों होता है? कोई बोध हमें नहीं।
पहली बातः इसलिए हमारे कर्मों को मैं यांत्रिक कह रहा हूं, मैकेनिकल, मशीन की भांति। दूसरी बातः हमारे कर्म कर्म भी नहीं हैं, प्रतिकर्म हैं। कर्म वह होता है जो हमारे भीतर से आविर्भूत हो, और प्रतिकर्म, रिएक्शन उसे कहूंगा, जो बाहर से हमारे भीतर पैदा कर दिया जाए।
एक आदमी आपको धक्का दे दे, तो जो क्रोध पैदा होता है वह आपके भीतर से पैदा नहीं हुआ, किसी ने बाहर से उसको गति दी है, वह प्रतिकर्म है, वह कर्म नहीं है, वह रिएक्शन है। आपने कभी कोई ऐसा कर्म किया है जो आपके भीतर से पैदा हुआ हो? जिसका आविर्भाव अपने भीतर से आया हो? कुछ कर्म किए होंगे जो भीतर से आए होंगे, लेकिन उनके आने में आप सचेतन न रहे होंगे, होश से भरे हुए न रहे होंगे।
दो तरह के कर्म हैं हमारे। अचेतन, भीतर से आने वाले। और प्रतिकर्म, बाहर से आने वाले। इन दोनों के बीच में जो मनुष्य घिरा है, वह बड़े गहरे बंधन में है। लेकिन वह क्या करे? क्या वह अपने क्रोध को दबा ले? दबा लेने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्या वह अपनी वासनाओं को दबा ले? कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि जो उनके पैदा करने में मालिक नहीं है, वह उनके दबाने में भी कैसे मालिक हो सकता है? जो उनके पैदा करने में मालिक नहीं है, वह दबाने में भी मालिक नहीं हो सकता। और अगर किसी भांति जबरदस्ती वह दबा ले, तो उसका क्रोध, उसकी वासनाएं, उसके कर्म दूसरे रास्तों से प्रकट होने लगेंगे जो और भी खतरनाक होगा। ऐसा हो रहा है रोज।
आप एक दफ्तर में काम करते हों और आपका मालिक क्रोध से भर जाए और गुस्से में दो शब्द बोल दे, तो शायद आपको अपना क्रोध पी जाना पड़े। पी जाना पड़े इसलिए कि जैसे नदी की धार नीचे की तरफ उतरती है, ऐसे ही क्रोध की धार भी नीचे की तरफ उतरती है, ऊपर की तरफ नहीं चढ़ती। आपका मालिक है, उसकी तरफ क्रोध की धार चढ़ाना खतरनाक है। वह जीवन-मरण का प्रश्न बन सकता है। इसलिए आप पी जाएंगे, ऊपर से मुस्कुराते रहेंगे। झूठी होगी वह मुस्कुराहट। भीतर क्रोध उबल रहा होगा, लेकिन उसको पी जाएंगे। उसको सम्हाल कर अपने घर ले आएंगे। मजबूत मालिक पर वह नहीं निकल सकता, तो कमजोर पत्नी पर निकल सकता है। घर आकर कोई बहाना आप खोज लेंगे, जिसका आपको पता भी नहीं है कि मैं बहाना खोज रहा हूं। जिसका आपको ख्याल भी नहीं है कि मैं यह क्या खोज रहा हूं? और कमजोर पत्नी में कोई बहाना मिल जाएगा, जो कि स्वाभाविक है। आदमी बहुत कमजोर है, उसके पास पच्चीस बहाने हैं। हो सकता है वह थाली भोजन परोसते वक्त जोर से पटक दे। और उसके थाली पटकने में भी कोई और कारण हो सकता है। हो सकता है कि उसकी पड़ोसन ने उससे कुछ शब्द कहे हों जो उसके भीतर क्रोध को दबा गई हो और थाली इसलिए जोर से गिरे, क्योंकि वह क्रोध भीतर धक्के दे रहा है कुछ करने को, कुछ तोड़ने को, कुछ फोड़ने को। हो सकता है भोजन में वह नमक डालना भूल जाए। और वह भूलना भी हो सकता है कि इस कारण हो कि कल रात आपने उससे जो शब्द कहे थे वे इतने कड़वे थे कि आज मीठा भोजन देना आपको उसका चित्त राजी नहीं है। वह भूलना भी बिल्कुल अचेतन हो सकता है, उसे ख्याल भी न हो कि वह भूल गई है। और आप घर जाएं और कोई बहाना खोज कर अपनी पत्नी पर टूट पड़ेंगे और आपको ऐसा लगेगा कि बिल्कुल जायज, बिल्कुल जस्टीफाइड है मेरा क्रोध, पत्नी ने गलती की है।
लेकिन अगर थोड़ा समझेंगे तो पाएंगे कि यह बिल्कुल यांत्रिक है, क्रोध कहीं और पैदा हुआ था, उसको आप इकट्ठा किए लिए आए हैं, अब वह बहना चाहता है। आप झूठे बहाने खोज कर उसको बहा रहे हैं। पत्नी को आप मार सकते हैं, गाली दे सकते हैं, अपमान कर सकते हैं। पत्नी आपसे शायद कुछ भी नहीं कह सकेगी, क्योंकि हजारों वर्ष से उसको समझाया गया है कि पति परमात्मा है, यह पति देवता है। और यह किसने समझाया है? यह पतियों ने समझाया है कि हम देवता हैं, हम परमात्मा हैं, हमको पूजना। और हम कुछ भी करें और कोई भी व्यवहार करें, वह सब ठीक है। हजारों वर्ष की सिखावन का फल है कि पत्नी इसको पी जाएगी।
लेकिन पत्नी का मन भी वैसा ही काम करता है जैसा पति का। थोड़ी देर में उसका बच्चा स्कूल से लौटेगा और वह कोई बहाना खोजेगी और बच्चे को मारेगी। इस मारने में बच्चे का कोई संबंध नहीं होगा। हो सकता है वह कहे कि तुमने किताब फाड़ डाली। हालांकि बच्चा रोज किताबें फाड़ कर आता रहा था, लेकिन कल तक यह बात उसे दिखाई नहीं पड़ी थी। आज उसे दिखाई पड़ जाएगी। हो सकता है वह कहे कि कपड़े तुम गंदे करके आ गए हो। हालांकि बच्चा रोज स्कूल से कपड़े गंदे करके आता रहा था, लेकिन इस पर कभी उसकी नजर न गई थी। आज नजर निश्चित चली जाएगी, आज वह कारण खोज रही है। उसके भीतर इकट्ठा है क्रोध, जो बहना चाहता है। मशीन की तरह उसके भीतर कोई वेग है, जो बहना चाहता है। आज यह बच्चा पिटेगा। और बच्चे को पता भी नहीं होगा कि यह क्रोध बड़ी दूर से यात्रा करके आ रहा है। यह दफ्तर में उसके पिता को उसके मालिक ने दिया था।
बच्चा क्या करेगा? अपनी मां को न तो मार सकता है, न गाली दे सकता है। शायद वह अपनी गुड़िया की टांग तोड़ डाले, शायद वह अपने खिलौने को तोड़ दे, या हो सकता है अपने बस्ते को पटक कर स्लेट फोड़ डाले। जहां उसकी ताकत चल सकेगी, वहां वह अपने क्रोध को बहा देगा।
ऐसा सारा यांत्रिक जीवन है हमारे चित्त का। और यह सारा यांत्रिक जीवन इसीलिए यांत्रिक बना हुआ है कि हम इस बात को देखने की भी हिम्मत नहीं करते कि यह बिल्कुल मशीन जैसा व्यवहार है, बल्कि इस व्यवहार को हम रोज-रोज न्याययुक्त ठहरा कर ऐसा अहसास करने लगते हैं कि जो मैं कर रहा हूं, बिल्कुल ठीक कर रहा हूं, और मैं कर रहा हूं। ये दोनों बातें झूठ हैं। न तो मैं कर रहा हूं, और ठीक करना तो बहुत दूर का सपना है। क्योंकि जिस बात के करने का मैं मालिक ही नहीं हूं, उसे ठीक करने का तो कोई सवाल भी नहीं उठता है। यह सब हो रहा है। यह क्रोध की तो मैंने एक बात कही, हमारे जीवन की सारी वृत्तियां ऐसी ही यांत्रिक हैं।
आपने देखा, रोज सुबह गांव में भिखारी निकलते हैं भीख मांगने। आपने कभी सांझ को भिखारियों को भीख मांगते देखा? नहीं देखा होगा। सांझ को कोई भिखारी भीख मांगने नहीं आता। क्योंकि वह जानता है, दिन भर का परेशान आदमी भीख नहीं दे सकेगा। भीख सुबह मिल जाती है, क्योंकि रात भर का सोया आदमी भीख दे सकता है। रात भर के सोए हुए होने के बाद भीख देने का काम हो सकता है। क्योंकि यह जो यांत्रिक आदमी है, अगर यह थोड़ा शांत हो तो ही भीख दे सकता है। यह भीख इसलिए नहीं देता कि भिखारी को जरूरत है, यह भीख इसलिए देता है कि यह भीख दे सकता है इस शांत हालत में। सांझ को यही आदमी भीख नहीं देगा, क्योंकि दिन भर की अशांति इकट्ठी हो गई, सांझ को यह भिखारी को एक चांटा मारना चाहेगा भीख की जगह। न तो वह भीख देने में भिखारी से कोई संबंध है, न चांटा मारने में कोई संबंध है, उसके भीतर की अपनी यांत्रिक व्यवस्था उसको प्रेरित कर रही है--ऐसा करो।
आपने कभी ख्याल किया? अगर रास्ते पर भिखारी आपको अकेला मिल जाए, तो सौ में एक मौका भी नहीं है कि आप उसको कुछ पैसे दें। लेकिन अगर आपके चार मित्र आपके साथ हों, तो सौ में निन्यानबे मौके हैं कि आप उसको कुछ देंगे और ज्यादा देंगे। क्यों?
वे तीन आदमी देखने वाले मौजूद हैं। वे तीन देखने वालों की आंखें आपके अहंकार को गति दे रही हैं कि दो! तीन आदमियों की आंखों में आपकी इज्जत बढ़ रही है। भिखारी से कोई संबंध नहीं है, आपके अहंकार को तृप्ति मिल रही है।
इसलिए भिखारी हमेशा भीड़ में आपको खोजता है, अकेले में वह आपसे बचता है, अकेले में कोई गुंजाइश नहीं आपसे पाने की। आपका यांत्रिक मन, अकेले में आपका अहंकार तृप्त नहीं होगा, हटा देंगे कि भाग जाओ! क्योंकि भिखारी से कोई भी संबंध नहीं है देने का, देने का संबंध आस-पास खड़े लोगों से है कि वे आपको देख रहे हैं, उनके मन में आपकी प्रतिष्ठा बन रही है, आपके अहंकार की तृप्ति हो रही है। और आपको पता भी नहीं है कि यह देना मेरे अहंकार की तृप्ति की बिल्कुल यांत्रिक मांग है, इसमें भिखारी पर दया बिल्कुल नहीं है, इसमें कोई संबंध नहीं है भिखारी से।
चौबीस घंटे हम जो कर रहे हैं, वह न तो सचेतन है, न तो हमें उसका होश है, न हमें अवेयरनेस है कि हम यह क्या कर रहे हैं? हम क्या कह रहे हैं? हम कौन सी बातें कर रहे हैं? कौन सी बातें कह रहे हैं? कौन सी बातें सोच रहे हैं? सब यांत्रिक है।
कभी दस मिनट को अकेले अपना कमरा बंद करके बैठ जाएं और मन में जो भी विचार चलते हों, एक कागज पर लिख डालें, ईमानदारी से, वही जो भीतर चलते हों। दस मिनट बाद उस कागज को आप अपने सगे से सगे मित्र को भी बताना पसंद नहीं करेंगे। क्योंकि उस कागज में आप देखेंगे कि यह क्या पागलपन की बातें मेरे मन में चल रही हैं--जिनका न कोई तुक है, न कोई संबंध, न कोई संगति! यह क्या है? शायद आपको खुद ही डर होगा कि मैं पागल तो नहीं हो गया हूं? ये बातें मेरे मन में चल रही हैं!
लेकिन एक यांत्रिक धारा है विचारों की जो मन के भीतर चली जा रही है, उसके भी आप मालिक नहीं हैं। एक छोटे से विचार को भी अपने मन के बाहर निकाल देने की ताकत नहीं है। निकालने की कोशिश करें, पता चल जाएगा। किसी एकाध विचार को निकालने की कोशिश करें। हैरान हो जाएंगे, जिसको निकालना चाहेंगे, वह दुगुने वेग से वापस आकर खड़ा हो जाएगा।
यहां दरवाजे पर हम एक तख्ती लगा दें--भीतर झांकना मना है। फिर हममें से कौन इतना शक्तिशाली है जो बिना भीतर झांके निकल जाए? और अगर कोई संयमी, कोई तपस्वी, कोई झक्की, कोई हठी निकल भी जाए, तो उसका मन पीछे लौट-लौट कर झांकने का होता रहेगा। उसकी रात की नींद खराब हो जाएगी। रात सपने में वह उसी दरवाजे के आस-पास घूमेगा जहां लिखा है--भीतर झांकना मना है। और हो सकता है कल वह वापस आए और उस दरवाजे में से झांक कर देखे। उसके प्राण व्याकुल हो जाएंगे। क्योंकि जिस विचार को निषेध किया गया है, वह आकर्षण उपलब्ध कर लेता है।
दुनिया में इतनी चीजों में आकर्षण दिखाई पड़ रहे हैं, आपको पता है क्यों? उन चीजों में शायद ही कोई आकर्षण है, लेकिन निषेध ने बल दे दिया है। मुसलमान मुल्कों में, जहां सारी स्त्रियां बुर्कों में ढंकी हुई हैं, एक भी स्त्री सड़क पर से नहीं निकल पाती जिस पर हजारों आंखें न टिक जाती हों। उसका कारण स्त्री नहीं है, उसका कारण बुर्के हैं। आदिवासी कौमों में, जहां स्त्रियां करीब-करीब अर्धनग्न हैं, कोई आंख उन पर टिकती नहीं, कोई आंख उनके शरीर को भेदना नहीं चाहती। कोई कारण नहीं है भेदने का। द्वार खुला हुआ है और वहां लिखा हुआ नहीं है कि भीतर झांकना मना है।
जिन चीजों को हम जितना छिपाते हैं और दूर करते हैं, हमारी आंखें उतनी उनकी तलाश करने लगती हैं, खोज करने लगती हैं। यह हमारा चित्त निषेध में, जहां इनकार है, वहीं-वहीं घूमने लगता है, वहीं-वहीं घूमने लगता है। तो अजीब घटना घट गई है मनुष्य-जाति के इतिहास में। जिन चीजों से हमने मनुष्य को अलग करना चाहा है, अपनी ही नासमझी के कारण उन्हीं चीजों पर मनुष्य के चित्त को रोक रखा है। उन्हीं चीजों पर! जो कौम जितनी ब्रह्मचर्य की बात करती है, उतनी ही सेक्सुअल है, उतनी ही कामुक है। जो लोग जितनी अध्यात्म की बात करते हैं, उतने ही निरे भौतिकवादी हैं, उतने ही निपट भौतिकवादी हैं। जो लोग जितनी आत्मा की बातें करते हैं और शरीर के विरोधी हैं, उन जैसा शारीरिक चित्त खोजना जमीन पर असंभव है।
एक साध्वी के साथ मैं बातें कर रहा था। समुद्र के किनारे हम बैठे हुए थे। समुद्र की हवाएं जोर से आईं और मेरे चादर को उड़ा कर उन्होंने साध्वी के ऊपर गिरा दिया। अब समुद्र की हवाओं को कोई भी पता नहीं कि कौन पुरुष है और कौन स्त्री। और समुद्र की हवाओं को यह भी पता नहीं कि साध्वियां पुरुष के कपड़ों से बहुत भयभीत होती हैं। लेकिन साध्वी तो भयभीत हो गई। लेकिन मेरे सामने उसकी यह भी हिम्मत न पड़े कि वह मुझसे कहे कि अपने चादर को रोकिए। और फिर मैं तो चादर को उड़ा भी नहीं रहा था, इसलिए रोकने का मालिक भी कौन था। हवाएं उड़ा रही थीं, हवाएं जानें। मैं भी चुप बैठा देखता रहा। आखिर उसकी बर्दाश्त के बाहर हो गया और उसने मुझसे कहाः माफ करिए, पुरुष का चादर हमें नहीं छूना चाहिए।
मैंने उनको पूछाः आप आत्मा की बातें कर रही थीं और कह रही थीं कि हम तो शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं। बात तो यह हो रही है कि हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं, और मामला यहां अटका हुआ है कि पुरुष के ऊपर जो चादर पड़ी है वह भी पुरुष हो गई! चादर भी पुरुष और स्त्री हो सकती है? बात आत्मा की है, अटकाव चादर पर है।
मैंने उनसे निवेदन कियाः आप भूल में हैं। आपको शायद पता भी न होगा कि इस पुरुष की चादर में जो आपको भय मालूम हो रहा है, यह भय बड़ा अचेतन है। पुरुष से दूर रहने की जो निरंतर कोशिश की है, उससे यह भय पैदा हुआ है। यह चादर का इसमें कोई हाथ नहीं है। इसमें पुरुष का भी कोई हाथ नहीं है। पुरुष के साथ जो दीवाल खड़ी की है निरंतर, पुरुष के प्रति जो घृणा और द्वेष और दूरी का भाव पैदा किया है, जो भय पैदा किया है, वह भय इतना मन में जाकर गहरा बैठ गया है, वह आकर्षण इतना गहरा हो गया है निषेध से कि आज पुरुष का चादर भी वही अर्थ रखता है, जो कोई भी, कोई भी ऐसी बात अर्थ रखती जो कि काम से और सेक्स से संबंधित होती। आज पुरुष के चादर में भी वही अर्थ आ गया है। यह अर्थ पुरुष की चादर में कहीं भी नहीं है। यह दबे हुए मन में, दमित मन में, दबाई गई सेक्सुअलिटी में है, दबाए गए यौन में है, यह सारा भाव वहां बैठा है। और उसको कोई नहीं देख रहा है, वह बिल्कुल अचेतन है, वह बिल्कुल अचेतन काम कर रहा है।
हमारा अचेतन मन बड़े अजीब-अजीब ढंग से काम करता है, जिनका हमें ख्याल भी नहीं है। चौबीस घंटे हम उस भांति जी रहे हैं। और हमारे कर्मों का, हमारे विचारों का, हमारे भावों का एक अचेतन प्रवाह है, यांत्रिक प्रवाह है, जिसका हमें कोई बोध नहीं है कि यह क्या हो रहा है! ऐसे चित्त को लेकर क्या कोई सत्य की खोज पर निकल सकता है? ऐसे चित्त को लेकर क्या कोई स्वयं को जानने की यात्रा पर निकल सकता है? ऐसे चित्त को लेकर आत्मज्ञान संभव है?
नहीं, ऐसे चित्त को लेकर आत्मज्ञान इसलिए संभव नहीं है कि जिसे अभी अपने चित्त का ही ज्ञान नहीं है, उसे आत्मा का ज्ञान कैसे हो सकेगा?
तो फिर क्या करें? एक विकल्प है जो हजारों वर्ष से हमें सिखाया गया है कि ऐसे चित्त का दमन करो। अगर क्रोध उठता है, तो क्रोध को हटाओ और क्षमा करो। हमें सिखाया गया है कि क्षमा परमधर्म है। क्रोध छोड़ना चाहिए और क्षमा अंगीकार करनी चाहिए। सेक्स छोड़ना चाहिए और ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होना चाहिए। असत्य छोड़ना चाहिए, सत्य को पाना चाहिए। घृणा छोड़नी चाहिए, प्रेम को पाना चाहिए।
लेकिन मैं आपसे क्या निवेदन करूं कि जो अभी अपने क्रोध का मालिक नहीं है, वह क्रोध को छोड़ेगा कैसे? छोड़ने के लिए मालकियत चाहिए। और जो क्रोध का ही मालिक नहीं है, वह क्षमा का मालिक कैसे हो सकता है? जो अभी अपने जीवन की सामान्य वृत्तियों को जानता भी नहीं कि वे क्या हैं पूरी-पूरी, वह उन्हें छोड़ेगा कैसे?
छोड़ तो नहीं सकता; दबा सकता है, सप्रेस कर सकता है, दमन कर सकता है, जबरदस्ती उनके ऊपर बैठ सकता है। और जो आदमी अपने भीतर किन्हीं चीजों को जबरदस्ती दबा लेता है, उसका जीवन नरक हो जाता है। क्योंकि जिन चीजों को वह दबाता है, वे उभरना चाहती हैं, निकलना चाहती हैं, वे अपनी अभिव्यक्ति की मांग करती हैं। तो उन्हें रोज-रोज दबाना होता है, सुबह से सांझ, रात से सुबह दबाना होता है। और फिर भी वे मौका पाकर रोज-रोज निकलती रहती हैं।
अच्छे लोग इसीलिए बहुत बुरे सपने देखते हैं। जब नींद में वे सो जाते हैं और उनकी दबाने की ताकत सो जाती है, तो बैठी हुई सारी प्रवृत्तियां उभरने लगती हैं। जिन्होंने दिन भर उपवास किया है, वे रात भर सपनों में भोजन करते हैं। यह स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। क्योंकि दिन भर जिस वृत्ति को दबाया है, जब तक हम जागे रहते हैं, दबाए रखते हैं, लेकिन जब हम सो जाएंगे तब क्या होगा? हम सो जाएंगे, दबी हुई वृत्ति एकदम से जोर से बाहर आ जाएगी। जिस वृत्ति को दिन में दबाया है, वह स्वप्न में वापस लौट आएगी। जिस वृत्ति को जवानी में दबाया है, वह बुढ़ापे में वापस लौट आएगी। क्योंकि जवानी में दबाने की ताकत होती है, बुढ़ापे में ताकत कम हो जाएगी। इसलिए जो लोग युवावस्था में दमन करेंगे, बुढ़ापे में उनका चित्त अत्यंत रुग्ण, पीड़ित और परेशान हो जाएगा। स्वाभाविक है। दबाने की ताकत कम हो जाएगी, फिर वे वृत्तियां जो दबी हैं उनका क्या होगा?
और एक बड़ा मजा है कि जिस वृत्ति को हम जितना दबाते हैं, वह ताकत इकट्ठी करती है। रेसिस्टेंस से, विरोध से उसमें बल आता है, उसमें ताकत इकट्ठी होती जाती है। वह और ताकतवर हो जाती है, और ताकतवर हो जाती है। इसीलिए तो कहा जाता है कि जो आदमी कभी क्रोध न करता हो, अगर वह क्रोध कर ले, तो उसका क्रोध बहुत खतरनाक होता है। दुनिया में जो लोग हत्याएं करते हैं, वे अक्सर वे लोग नहीं होते जो रोज-रोज क्रोध करते हैं, वे लोग वे लोग होते हैं जो बहुत मुश्किल से क्रोध करते हैं। जो लोग मर्डरर्स होते हैं दुनिया में, हत्यारे होते हैं, वे लोग नहीं होते जो छोटी-छोटी बात पर क्रोधित हो जाते हैं। छोटी-छोटी बात पर क्रोधित होने वाले लोगों ने आज तक कोई हत्या नहीं की। क्योंकि उनके पास इतना क्रोध कभी इकट्ठा नहीं हो पाता कि किसी आदमी की हत्या कर दें, इतना पागल होने का वेग उनके पास नहीं होता। वह तो रोज-रोज बिखर जाता है उनका क्रोध, रोज निकल जाता है। लेकिन जो लोग अपने क्रोध को इकट्ठा करते रहते हैं, दबाए रहते हैं, वे बड़े खतरनाक लोग हैं।
इसीलिए तो देखा होगा, अगर दो धर्मों के लोगों में झगड़ा हो जाए, तो जिनको हम समझते थे कि रोज मस्जिद जाकर नमाज पढ़ते हैं, बड़े शांत हैं, रोज पांच दफा नमाज पढ़ते हैं; जिनको हम सोचते थे कि बड़े भले आदमी हैं, सुबह से गीता पढ़ते हैं; जिनको हम सोचते थे कि बहुत भले आदमी हैं, रोज मंदिर जाते हैं--वे ही लोग सबसे जघन्य हत्यारे और पापी सिद्ध होते हैं। उसका कोई और कारण नहीं है, उसका कारण साफ और सीधा है। वृत्तियों को दबा लिया गया है, तो कोई मौका मिल जाए उनके निकास का तो फिर बड़ी कठिनाई हो जाती है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के झगड़ों में, हिंदू-मुसलमान के दंगों में यही हुआ। जिन लोगों ने दबाया हुआ था, वे बड़े खतरनाक साबित हुए, बहुत खतरनाक साबित हुए।
ये जो वृत्तियां हम दबाते हैं, इनसे वृत्तियां नष्ट नहीं होती हैं, बल्कि चित्त आत्मद्वंद्व में पड़ जाता है, सेल्फ कांफ्लिक्ट में पड़ जाता है। और जिस आदमी का मन अपने भीतर द्वंद्वग्रस्त है, उसकी द्वंद्व में ही शक्ति समाप्त हो जाती है, उसके पास परमात्मा तक यात्रा करने के लिए शक्ति भी नहीं बचती। और हम सारे लोग द्वंद्व में ग्रस्त हैं। हमने न मालूम कितनी बातों को दबा रखा है। हमने न मालूम कितनी बातों को अपने भीतर छिपा रखा है। कि अगर आज हमारे हृदय के द्वार खोल दिए जाएं, तो जैसे नरक के दरवाजे खुल जाएंगे। हमारे भीतर से क्या-क्या निकलेगा, कहना कठिन है। हमारे भीतर कौन सी बातें उठेंगी, ख्याल करना कठिन है।
एक रात एक गांव में एक मां और उसकी बेटी एक बगीचे में मिलीं। उन दोनों मां और बेटी को रात में नींद में उठ कर चलने की बीमारी थी। कोई चार बजे होंगे, वे दोनों नींद में उठ कर अपने बगीचे के पीछे पहुंच गईं। दोनों नींद में थीं, नींद में ही चलने की उन्हें बीमारी थी। जैसे ही मां ने अपनी बेटी को देखा, वह चिल्लाई कि दुष्ट, तूने ही मेरी सारी युवावस्था छीन ली! मेरा सारा यौवन, मेरा सारा सौंदर्य तूने ही छीन लिया! तू तो युवा हो गई और मैं बूढ़ी हो गई। काश, तू पैदा ही न होती। और जैसे ही उस लड़की ने अपनी मां को देखा, उसने कहा कि चुड़ैल, बूढ़ी औरत, तू मेरे जीवन में सबसे बड़ी बाधा है। मेरे प्रेम में, मेरे प्रेम के विकास में तू दीवाल की तरह खड़ी है। तुझे जिंदा रहने का अब क्या हक है? क्या जरूरत है? तू मर जाती तो अच्छा होता। और तभी मुर्गों ने आवाज दी और उन दोनों की नींद खुल गई। नींद खुलते ही बूढ़ी औरत ने कहाः प्यारी बेटी, तू इतनी जल्दी क्यों उठ आई? कहीं सर्दी न लग जाए! सुबह की ठंडी हवाएं हैं। और उस लड़की ने अपनी मां के पैर छुए और कहाः हे प्यारी मां, हे पूज्य मां, आप क्यों उठ आईं, आपकी तो तबीयत रात खराब थी। इतनी जल्दी उठ आना उचित नहीं है, आप अंदर चलें और विश्राम करें।
जो उन्होंने नींद में कहा और जो जाग कर कहा, उसमें जमीन-आसमान का फर्क है। लेकिन जो नींद में कहा, वह सच्चाई के ज्यादा करीब है। उन्होंने निरंतर ये अनुभव किए होंगे, ये बातें जो नींद में कहीं, लेकिन इनको दबा लिया होगा। ये भीतर दब गई होंगी, ये भीतर पड़ी रही होंगी, नींद में निकल आई हैं।
इसीलिए तो यह होता है, हम इतने लोग यहां अच्छे लोग बैठे हुए हैं, हम सारे लोगों को शराब पिला दी जाए, तो हमसे क्या निकलेगा, पता है? क्या आप सोचते हैं, शराब में कोई ऐसी चीज होती है कि हमारे भीतर बुरी चीजों को पैदा कर दे? गलती में हैं आप। शराब में ऐसी कोई चीज नहीं होती। शराब में तो केवल इतना ही गुण होता है कि आपके होश को सुला देती है। तो जिस चीज को आपने दबा रखा है, वह निकलना शुरू हो जाती है। शराब बुरी बातें पैदा नहीं करती, शराब तो केवल उस दरवाजे को, सेंसर को, वह जो हमने बिठा रखा है पहरेदार, जो निकलने नहीं देता चीजों को, उसको सुला देती है। उस बेहोशी में सब भीतर से निकलना शुरू हो जाता है।
एक भले आदमी को, जो भजन गा रहा हो, शराब पिला दीजिए, वही आदमी गाली देने लगता है। शराब कहीं भजन को गाली बना सकती है? शराब में कोई बात ही नहीं है, उसमें कोई केमिकल नहीं है जो भजन को गाली बना दे। लेकिन भजन जो आदमी कह रहा था, वह ऊपर से कह रहा था और गालियां भीतर इकट्ठी थीं। शराब पीते से ही ऊपर का आदमी सो गया, भीतर का आदमी बाहर आ गया।
यह जो भीतर हम दबाए हुए हैं, यह नष्ट नहीं होता, यह समाप्त नहीं होता, यह भीतर मौजूद है। यह हमेशा मौजूद है और हमेशा काम कर रहा है भीतर से। दमन से, सप्रेशन से कोई चित्त परिवर्तित नहीं होता है, सिर्फ दो हिस्सों में बंट जाता है। एक अच्छा चित्त बन जाता है जो हमने सम्हाल लिया और एक बुरा चित्त जो हमारे भीतर बैठ जाता है। और इन दोनों के भीतर जो द्वंद्व चलता है, उसमें हम मर जाते हैं। जैसे मेरे दोनों हाथों को मैं लड़ाऊं, तो कौन जीतेगा? कोई जीत सकता है? बायां हाथ जीतेगा कि दायां हाथ जीतेगा? कोई भी नहीं जीत सकता। क्योंकि दोनों हाथ मेरे हैं, कौन जीत सकता है? दोनों के पीछे ताकत मेरी है। तो मेरे दोनों हाथ लड़ेंगे, न तो कोई जीतेगा, न कोई हारेगा। लेकिन हां, दोनों के लड़ाने में मैं बर्बाद हो जाऊंगा, मेरी ताकत नष्ट हो जाएगी।
दोनों चित्त मेरे हैं, वह जो चेतन में मैंने सोच रखा है और जो मैंने दबा रखा है, वे दोनों मेरे हैं, उनकी लड़ाई से क्या होगा? उनकी लड़ाई से कोई जीतने वाला नहीं है। उनकी लड़ाई से मैं समाप्त हो जाऊंगा और नष्ट हो जाऊंगा।
इसलिए दमन कोई मार्ग नहीं है, कोई रास्ता नहीं है। दमन से आज तक मनुष्य-जाति को कोई हित नहीं हुआ। तो क्या करें? क्या मैं यह कहता हूं कि जो हो उसे होने दें? क्या मैं यह कहता हूं कि भोग में पागल होकर कूद जाएं? क्या मैं यह कहता हूं कि क्रोध आए तो क्रोध करें? क्या मैं यह कहता हूं कि घृणा आ जाए तो घृणा करें?
नहीं; यह मैं नहीं कह रहा हूं। मैं आपसे यह कह रहा हूं कि घृणा, क्रोध, प्रेम, जो कुछ भी हमारे चित्त में है, वह सभी यांत्रिक है। हमें उसका पता भी नहीं, वह क्यों है और क्या है? और ऐसी स्थिति में उसे बदला तो जा ही नहीं सकता। फिर क्या किया जा सकता है? उसे गैर-यांत्रिक बनाया जा सकता है, उसके प्रति जागा जा सकता है, उसके प्रति होश से भरा जा सकता है।
तो जीवन की जो-जो क्रियाएं यांत्रिक हैं, अगर वे सचेतन हो जाएं, तो उनमें क्रांति अपने आप होनी शुरू हो जाती है। क्योंकि सचेतन होने का अर्थ हैः जीवन की स्थिति के प्रति पूरी तरह जागरूक होना, होश से भरे होना। हम बेहोश हैं। यांत्रिक होने का अर्थः बेहोश। यांत्रिक होने का अर्थः सोए हुए। हम करीब-करीब सोए हुए हैं, करीब-करीब बेहोश हैं। हमें कुछ भी पता नहीं है, यह सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है?
इस बेहोशी में लिए गए कोई निर्णय काम के नहीं हैं, अगर आप बेहोश ही बने रहते हैं। क्योंकि बेहोशी में लिए गए निर्णय भी बेहोश होंगे। और बेहोशी में लाई गई क्षमा भी बेहोश होगी। बेहोशी में लाया गया प्रेम भी बेहोश होगा। और इसलिए दिखाई तो पड़ेगा प्रेम, लेकिन परिणाम बड़े खतरनाक होंगे। हम सबको इस बात का शायद अनुभव भी होगा। जो आपको प्रेम करता है, वह आपके गले में हाथ डालता है, बड़े प्रेम की बातें करता है, लेकिन थोड़े दिनों बाद पता चलता है--उसके हाथ प्रेम के नहीं थे, आपके गले की जंजीरें बन गए। आप जिसको प्रेम करते हैं, पहले बड़ी मधुर और मीठी बातें और बड़ी कविताएं करते हैं, और थोड़े दिनों बाद जिसको आपने प्रेम किया उसे पता चलता है कि आप तो उसके प्राण के ग्राहक हो गए, आप तो उसकी परतंत्रता बन गए। आपने तो सब तरफ से उसे कस लिया। प्रेम का नाम लिया था, और पजेशन, प्रेम का नाम लिया था, और प्रभुत्व कायम कर लिया।
सारी दुनिया में यह हो रहा है। बेहोश आदमी प्रेम भी करेगा, तो उसका प्रेम भी बहुत खतरनाक है, क्योंकि बेहोश आदमी की किसी बात का कोई भरोसा नहीं कि वह क्या कर रहा है और क्या नहीं कर रहा है।
एक फकीर फकीर होने के पहले एक बादशाह की लड़की से प्रेम करता था। एक सुबह उससे विदा होते वक्त उसने उस लड़की को कहाः तुझसे ज्यादा सुंदर, तुझसे ज्यादा श्रेष्ठ और कोई स्त्री पृथ्वी पर नहीं है।
वह युवती प्रसन्न हुई होगी, क्योंकि युवक युवतियों से हमेशा ही यही बातें कहते रहे हैं, सभी युवक सभी युवतियों से। वह युवती प्रसन्न हुई होगी, बहुत खुश हुई होगी, उसकी आंखों में खुशी भर गई, उसके ओंठ मुस्कुराहट से भर गए।
लेकिन वह आदमी अजीब रहा होगा, वह उतर रहा था सीढ़ियां, वापस अपने घर जा रहा था, रुक गया और उसने कहा कि सुन, तुझे मैं एक बात और बता दूं, मैंने यह कह तो दिया, लेकिन कहने के बाद मुझे ख्याल आया कि यह बात तो मैं और स्त्रियों से भी पहले कह चुका हूं। यही बात तो मैंने और स्त्रियों से भी कही है तुझसे पहले। तेरी मुस्कुराहट देख कर मुझे यह ख्याल आया कि मैंने बिल्कुल अनजाने में यह बात और स्त्रियों से भी कही है, तुझसे भी कह रहा हूं, इसमें कोई अर्थ नहीं है, मुझे कोई होश ही नहीं है कि मैं क्या कह रहा हूं और क्या कर रहा हूं।
हम क्या कह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, इसका होश है? अगर होश हो, तो जिंदगी दूसरी हो जाएगी। क्योंकि होश में आदमी वही काम नहीं कर सकता जो बेहोशी में करता है।
एक बादशाह की सुबह-सुबह एक राजधानी में सवारी निकलती थी। चौरस्ते पर खड़े होकर एक आदमी बादशाह को गाली देने लगा। उस आदमी को पकड़ कर बंद करवा दिया गया और दूसरे दिन बादशाह के सामने लाया गया। और बादशाह ने उससे पूछाः तूने किसलिए गालियां दीं मुझे? मुझे याद भी नहीं आता कि मेरे द्वारा तेरा कभी कुछ बुरा हुआ हो। तूने क्यों गालियां दीं मुझे?
उस आदमी ने कहाः क्षमा करें! मैं शराब पीए हुए था, मैं अपने होश में नहीं था। तो जिसने आपको गालियां दीं, वह दूसरा ही आदमी था। आप मुझसे तफसील न करें, आप मुझसे पूछताछ न करें। जिसने आपको गालियां दीं, वह दूसरा ही आदमी था, वह बेहोश था। मैं होश में हूं, मैं आपके पैर छूना चाहता हूं, आपको नमस्कार करना चाहता हूं। मैंने वे गालियां आपको नहीं दीं, वह दूसरा ही आदमी रहा होगा, अब तो मेरा होश वापस आ चुका है। जो मैंने बेहोशी में किया, वह मैं होश में नहीं कर सकता हूं।
कोई आदमी जो बेहोशी में करता है, होश में नहीं कर सकता है। अगर भीतर चित्त पूरा होश से भर जाए, तो आपका सारा जीवन बदल जाएगा। आज तक कोई आदमी होशपूर्वक क्रोध नहीं कर सका है। आप भी नहीं कर सकेंगे। यह असंभव है, यह इंपासिबिलिटी है कि कोई आदमी होशपूर्वक क्रोध कर सके। कोशिश करके देखें, क्रोध आ रहा हो और आप होशपूर्वक क्रोध करके देखें कि मैं पूरे बोध से भरा रहूं कि यह क्रोध आ रहा है और मैं क्रोध कर रहा हूं। आप पाएंगेः जिस मात्रा में यह बोध होगा, उसी मात्रा में क्रोध मंदा और धीमा हो जाएगा।
मेरे एक मित्र को क्रोध की बीमारी थी और उन्होंने मुझसे पूछाः मैं क्या करूं? क्योंकि वे बहुत उपाय कर चुके थे, कोई उपाय कारगर नहीं हुआ था। हो भी नहीं सकता। किसी ने कहाः क्रोध आए तो राम-राम जपो। लेकिन जो आदमी होश में नहीं है, वह राम-राम कैसे जपेगा? और राम-राम जपेगा, तो वह भी क्रोध में जपेगा। और क्रोध का जप खतरनाक है। उससे कोई मतलब नहीं है। वह राम-राम वैसे ही जपेगा जैसे किसी को पत्थर मार रहा हो गुस्से में। उससे क्या फर्क पड़ने वाला है? उसके भीतर क्रोध उबल रहा है।
तो मैंने उनको कहाः एक छोटा सा काम करें, एक कागज में लिख कर अपने खीसे में रख लें बड़े-बड़े अक्षरों में कि अब मुझे क्रोध आ रहा है। उसे खीसे में ही रखे रहें हमेशा। और जब भी क्रोध आए, कृपा करके एक दफा पढ़ लें और वापस रख लें, फिर जो भी करना हो करें।
उन्होंने कहाः इससे क्या होगा?
मैंने उनसे कहा कि यह मुझसे मत पूछिए, मुझे महीने दो महीने बाद आकर बताइए, क्या होगा।
वे दो महीने बाद वापस लौटे और मुझसे बोलेः यह तो बड़ी हैरानी की बात है! जैसे ही मैं खीसे की तरफ हाथ ले जाता हूं, भीतर मैं पाता हूं कि क्रोध गया, वह नहीं है। जैसे ही मैं कागज पढ़ता हूं--कि अब मुझे क्रोध आ रहा है--मैं पाता हूं कि यह मामला क्या हो गया? वह क्रोध जैसे एकदम राख हो गया!
जीवन में एक अदभुत रहस्य की बात हैः अगर हम चित्त के प्रति होश से भर जाएं, तो न तो क्रोध संभव है, न घृणा संभव है। अगर हम चित्त के प्रति होश से भर जाएं, तो क्षमा अनायास संभव हो जाती है, प्रेम अनायास प्रवाहित होता है। ये लक्षण हैं। बेहोशी का लक्षण हैः क्रोध, घृणा, मोह। होश का लक्षण हैः प्रेम, सत्य, अमोह, क्षमा। ये होश के लक्षण हैं। आप क्रोध को क्षमा में नहीं बदल सकते। लेकिन बेहोशी अगर होश में बदल जाए, तो क्रोध अपने आप क्षमा में बदल जाता है। क्रोध से क्षमा के लिए सीधा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन बेहोशी से होश की तरफ सीधा रास्ता है।
महावीर से किसी ने पूछा था कि आप किसको मुनि कहते हैं? कौन है साधु? तो महावीर ने नहीं कहा कि मैं उसको मुनि कहता हूं जो सब कपड़े छोड़ कर नग्न हो जाता है। महावीर ने नहीं कहा कि मैं उसको मुनि कहता हूं जो जैन धर्म को मानता है। महावीर ने नहीं कहा कि मैं उसको मुनि कहता हूं जो रोज मंदिर जाता है, प्रतिक्रमण करता है। महावीर ने नहीं कहा कि मैं उसको मुनि कहता हूं जो मांस नहीं खाता, हिंसा नहीं करता। ये कोई बातें महावीर ने नहीं कहीं। महावीर ने कहाः मैं उसको मुनि कहता हूं, जो जागा हुआ है, सोया हुआ नहीं है। असुत्ता मुनि। जो सोया हुआ नहीं है, वह मुनि है।
बड़ी अजीब बात कही, पर बड़ी अर्थपूर्ण। जो सोया हुआ नहीं है, जो बेहोश नहीं है, वह साधु है। जो सोया हुआ है, बेहोश है--चाहे मंदिर जाए, चाहे वेश्यालय जाए, कोई फर्क नहीं है उसके सोने में। उसका सोना एक सा है, वह दोनों जगह बेहोश जा रहा है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
कैसे हम जाग जाएं?
तो इस जागरण के लिए पहली तो बात यह जानना जरूरी है कि हम यंत्र हैं और सोए हुए हैं। क्योंकि वही आदमी जाग सकता है जो पहले पक्के रूप से यह समझ ले कि मैं सोया हुआ हूं। क्योंकि जिसको यह भ्रम है कि मैं जागा ही हुआ हूं, वह जागेगा कैसे?
इसलिए मैंने आज की सुबह में इस चर्चा पर जोर दिया है कि आप सोए हुए हैं। मनुष्य सोया हुआ है, बेहोश है। यह पहले बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ जाना चाहिए कि हम बेहोश हैं। तो शायद इस बेहोशी की पीड़ा से ही हमारे भीतर जागरण का क्रम शुरू हो। और बड़े मजे की बात तो यह है, कभी आपने ख्याल किया, रात आप सपना देखते हैं, तो आपको पता नहीं चलता है कि आप सपना देख रहे हैं। आपको लगता है, जो देख रहे हैं वह सच है। सुबह जागने पर पता चलता है कि सपना देखा, वह सच नहीं था। लेकिन सपने में तो सपना सच मालूम होता है।
तो अभी हम जिस हालत में हैं, मालूम होता है वह सच है। और कोई पता नहीं चलता कि वह झूठ है। और न पता चलने का एक कारण यह भी है कि हमारे आस-पास जितने लोग हैं, वे भी सब उसी हालत में हैं। तो ऐसा लगता है कि यह तो मनुष्य की सामान्य स्थिति है, यही जागरण है, सभी लोग हम एक जैसे हैं। और बल्कि अक्सर यह हो जाता है, अगर एक आदमी आपके भीतर ऐसा आ जाए जो जागा हुआ है, तो आप उसकी हत्या कर देंगे कि यह आदमी गड़बड़ है।
नहीं तो क्राइस्ट को कोई काहे के लिए सूली पर लटकाए? और गांधी को कोई काहे के लिए गोली मारे? और सुकरात को कोई जहर क्यों पिलाए? ये गड़बड़ आदमी हैं। ये बीच में आ जाते हैं सोए हुए लोगों के और ऐसी बातें कहने लगते हैं जो सोए हुए किसी आदमी की समझ में नहीं आतीं--कि ये क्या कह रहे हैं! क्या गड़बड़ बात कर रहे हैं! क्राइस्ट कहते हैंः जो तुम्हारे बाएं गाल पर चांटा मारे, तुम दायां उसके सामने कर दो। यह बड़ी फिजूल की बात कह रहे हैं! यह आदमी पागल है। क्योंकि हम तो जानते हैं कि जो आदमी ईंट मारे, उसको पत्थर से जवाब दो। यह तो हम जानते हैं और हम सब इसी बात को जानते हैं। जो आदमी एक आंख फोड़ दे, उसकी दोनों फोड़ दो। और यह एक पागल आदमी है क्राइस्ट, यह कहता हैः बाएं गाल पर कोई चांटा मारे तो दायां सामने कर दो। खत्म करो इस आदमी को! यह कोई बीमार या कोई पागल या कोई गड़बड़, कोई अजनबी, कोई स्ट्रेंजर हमारे बीच पैदा हो गया, यह हमारे बीच का नहीं है।
तो हम सारे लोग चूंकि एक जैसे हैं, जब एक ही बीमारी सब लोगों को हो जाए, तो बीमारी का पता नहीं चल सकता है। इसलिए बीमारी का कोई पता नहीं चलता।
एक गांव में एक बार ऐसा हो गया था। एक जादूगर आया और उसने एक कुएं में एक पुड़िया डाल दी और कहा कि इस कुएं का पानी जो भी पीएगा, वह पागल हो जाएगा। उस गांव में दो ही कुएं थे। एक गांव का कुआं था और एक राजा का कुआं था। तो गांव के लोगों को तो कितनी देर तक प्यास सहते? प्यास नहीं सही जा सकती, पागलपन सहा जा सकता है। लेकिन कितनी देर तक प्यासे रहते? सांझ होते-होते पानी पीना ही पड़ा। सारा गांव सूरज ढलते-ढलते पागल हो गया।
राजा, उसका वजीर, उसकी रानी, उन्होंने नहीं पीया, उनका अपना कुआं था, वे उससे पानी पीए। वे बड़े प्रसन्न थे कि हम अच्छे बच गए। लेकिन सांझ को उन्हें पता चला कि प्रसन्नता बड़ी महंगी पड़ गई। सारे गांव के लोग विचार करने लगे कि मालूम होता है राजा का दिमाग खराब हो गया है! सारे गांव का दिमाग तो खराब हो गया था। राजा अजनबी मालूम होने लगा कि यह बातें क्या कर रहा है! सारे गांव के लोग और ही ढंग के हो गए थे, राजा और ढंग का रह गया, अकेला पड़ गया। सारे गांव के लोगों ने सभा की और कहा कि राजा को बदलना होगा, नहीं तो राज्य बर्बाद हो जाएगा। यह आदमी तो पागल हो गया मालूम होता है!
राजा बहुत घबड़ाया, उसने अपने वजीर को पूछाः अब हम क्या करें? मामला तो उलटा है। लेकिन इनकी भीड़ ज्यादा है, इनकी संख्या ज्यादा है। और संख्या बल देती है कि संख्या जिसकी ज्यादा है वह सच है। इसलिए तो सारे दुनिया के धर्म अपनी-अपनी संख्या बढ़ाने में लगाते हैं--हिंदू को ईसाई बनाओ, मुसलमान बनाओ। यह बेवकूफी किसलिए चलती है? इसलिए चलती है, जिसकी संख्या ज्यादा, वह सच। संख्या सबूत है सच्चाई का। इनकी संख्या ज्यादा है, क्या करें?
वजीर ने कहाः एक ही रास्ता है, हम भी उसी कुएं का पानी पी लें, नहीं तो जिंदा रहना मुश्किल हो जाएगा।
वे तीनों गए और उन्होंने बड़ी शांति से भगवान का नाम लेकर उस कुएं का पानी पी लिया। उस रात उस गांव में बड़ा जलसा मनाया गया, नृत्य हुए, गान हुए, स्वागत हुआ और गांव के लोगों ने कहाः धन्य है परमात्मा, तेरी कृपा, हमारे राजा का दिमाग तूने ठीक कर दिया। तो राजा ठीक हो गया था, बस्ती फिर चलने लगी।
यह जो सामूहिक रोग है जीवन का, बेहोशी, इसलिए इसका पता नहीं चलता कि हम बेहोश की तरह जी रहे हैं। किसी चीज पर हमारा कोई वश, कोई जागरण नहीं है। और ऐसी स्थिति में कोई भी परिवर्तन नहीं हो सकता। लाख उपाय करें, कोई फर्क नहीं होगा।
फिर क्या करें?
एक ही उपाय, एक ही मार्ग है और वह यह हैः उस कुएं का पानी पी लें जहां से जागरण आता है, उस कुएं का पानी न पीएं जहां से बेहोशी और पागलपन आता है।
वह कुआं हमारे भीतर है। उसी कुएं को मैं ध्यान कहता हूं--जिससे जागरण आता है, जिससे होश आता है, जिससे अवेयरनेस पैदा होती है, जिससे आदमी जागता है और अपने जीवन को, चित्त को समझना शुरू करता है। इस होश के कुएं का पानी पीएं, तो जरूर चित्त के प्रति एक होश आएगा और एक परिवर्तन होगा।
कैसे जागें?
पहला सूत्र जो मैं आज सुबह आपसे कह रहा हूं, वह यह कि इस बात को ठीक से समझ लें कि सोए हुए हैं, जागरण की शुरुआत समझ लीजिए हो गई। क्योंकि अगर नींद में आपको यह पता चल जाए कि मैं सपना देख रहा हूं, तो आप समझ लेना कि नींद टूटनी शुरू हो गई, नहीं तो यह पता नहीं चल सकता था। अगर नींद में यह पता चल जाए कि जो मैं देख रहा हूं, यह सपना है, तो समझ लेना कि नींद टूट गई। नहीं तो यह पता नहीं चल सकता था कि यह सपना है। अगर आपको यह ख्याल आ जाए, यह रिमेंबरिंग, यह स्मृति कि निश्चित ही यह सारा जीवन तो सोया-सोया, यांत्रिक-यांत्रिक है, इसमें मैं कहां हूं? इसमें होश कहां है? यह जो मैं कर रहा हूं, क्या मैं सच में जान कर कर रहा हूं? यह जो हो रहा है, क्या मैं इसका करने का मालिक हूं? अगर यह बोध आ जाए तो आप समझ लेना, पहली किरण टूट चुकी, आपका जागना शुरू हो गया।
इसलिए सुबह ये बातें कहीं, इनको आप सोचेंगे, मेरे कहने से कुछ होता नहीं। यहां से लौट कर आप विचार करेंगे कि आपकी जिंदगी भी यांत्रिक तो नहीं है? मैकेनिकल तो नहीं है? होशपूर्वक जी रहे हैं? जो कर रहे हैं, उसमें जागरण है? होश है? बोध है? या कि यूं ही किए चले जा रहे हैं? इसको सोचना, इसको जांचना, एक-एक काम को पकड़ कर देखना--कि कल जो मैंने क्रोध किया था, वह मैंने जानते हुए किया था या गैर-जानते हुए किया था? जिसके प्रति मेरे मन में घृणा भर गई है, वह जानते हुए भर गई है या अनजाने भर गई है? जिस आदमी पर मैं शक कर रहा हूं, संदेह कर रहा हूं, वह मैं जान कर कर रहा हूं, अनजाने कर रहा हूं? जिस आदमी को मैं बुरा समझ रहा हूं, वह मैं जानता हूं कि बुराई क्या है? मैं उस पूरे आदमी को जानता हूं कि बुरा होना क्या है?
कौन किसको जानता है! कौन किसको पहचानता है! जिसके साथ हम जिंदगी भर रहते हैं, उसको भी पहचानना कठिन है। तो मैं जजमेंट लेने वाला कौन हूं? मैं निर्णय लेने वाला कौन हूं? कि मैं कहूं फलां आदमी बुरा है, फलां आदमी चोर है, फलां आदमी बेईमान है, यह कहीं सब मैं बेहोशी में तो नहीं कर रहा हूं? और हम कर रहे हैं।
अगर मैं आपके पास आऊं और कहूं कि फलां आदमी बहुत अच्छा आदमी है, बड़ा ईमानदार है। आप कहेंगेः कहां ईमानदारी रखी है इस कलियुग में! ईमानदारी आसान है क्या? आपको पता नहीं होगा, वह भी आदमी जरूर बेईमान होगा। सब बेईमान हैं। अगर मैं आपसे कहूंः फलां आदमी ईमानदार है। आप विश्वास न करेंगे और आप पच्चीस दलीलें देंगे कि यह ईमानदार नहीं हो सकता। लेकिन अगर मैं आपसे कहूंः फलां आदमी बेईमान है। आप कहेंगेः निश्चित होगा। आप एक भी विरोध में दलील नहीं देंगे।
आपको पता है, ऐसा क्यों हो रहा है? निंदा पर हम एकदम विश्वास कर लेते हैं, प्रशंसा पर कभी भी नहीं। क्यों? अचेतन है यह बात। निंदा से हमें खुशी होती है, क्योंकि जब भी कोई आदमी नीचा हो जाता है, हमको लगता है हम ऊंचे हो गए। और जब भी किसी आदमी की प्रशंसा होती है, हमको दुख होता है। कोई आदमी ऊपर होता है, तो हम नीचे होते हैं। इसका हमें पता ही नहीं है कि हम यह क्या कर रहे हैं! जब कोई निंदा करता है, एकदम विश्वास कर लेते हैं। निंदा पर कोई शक पैदा नहीं होता, कोई डाउट पैदा नहीं होता। निंदा एकदम स्वीकृत हो जाती है, कोई किसी के बाबत कुछ भी कह दे। लेकिन किसी की प्रशंसा कभी स्वीकृत नहीं होती। हमारा चित्त बिल्कुल अचेतन काम कर रहा है। वह स्वीकार करने को राजी नहीं है।
लेकिन क्या हम जानते हैं? हम क्या जानते हैं? जिंदगी इतनी रहस्यपूर्ण है कि निर्णय लेना कठिन है। तो हमारा एक-एक काम जांचने की जरूरत है।
मैंने सुना है, न्यूयार्क में एक घर में एक विवाह का जलसा हुआ। कोई दो सौ मित्र मेहमान थे, आमंत्रित थे। मेहमान सब आ गए, भोजन शुरू होने को था कि एक मेहमान ने अपने खीसे से एक बहुत खूबसूरत छोटी सी पेटी निकाली और उसमें से एक सिक्का निकाला। सिक्का तीन हजार वर्ष पुराना इजिप्त का सिक्का था, मिश्र का सिक्का था। और उसने कहा कि मैंने इसे पच्चीस हजार रुपये देकर खरीदा है--एक रुपये के सिक्के को। तीन हजार वर्ष पुराना है। यह सबसे ज्यादा पुराना सिक्का है जो उपलब्ध है। एक सिक्का और है इसी के समय का, बस ये दो ही सिक्के हैं। एक सिक्का दुनिया में किसी और दूसरे आदमी के पास है, एक यह है। मैंने खरीदा तो मैंने सोचा कि शादी में ले चलूं, मित्रों को दिखा दूंगा, वे खुश होंगे। सिक्का हाथों-हाथ घूमने लगा। कुछ लोगों ने भीड़ लगा ली और उससे पूछने लगेः कितना पुराना है? किस राजा के वक्त का है? किस धातु का बना है? ये सारी बातें, इस पर क्या लिखा हुआ है? और सिक्का घूमने लगा।
आधा घंटे बाद सिक्का मिलना मुश्किल हो गया, वह न मालूम कहां खो गया। जिससे भी पूछा, उसने कहाः मुझे मिला था, लेकिन मैंने पड़ोसी को देखने को दे दिया, मुझे कुछ पता नहीं। जिससे भी पूछा, उसने कहाः मेरे हाथ में आया था, मैंने देखा, फिर मैंने दूसरे को दे दिया। वहां भीड़ थी दो सौ लोगों की, शादी का घर था, सिक्का कहां गया? मुश्किल हो गया। सिक्का था कीमती। बड़ी कठिनाई हो गई! शादी की रंग-रौनक उड़ गई! चोरी का मामला हो गया! सारे मेहमान इकट्ठे हो गए और उन्होंने कहाः हमारे खीसे देख लिए जाएं, कपड़े देख लिए जाएं, हमने तो लिया नहीं। यही तय हुआ कि सबके कपड़े देख लिए जाएं।
लेकिन एक आदमी ने कहा कि मैं तो यहां मेहमान की तरह आया हूं, चोर की तरह नहीं। इतना मैं कह सकता हूं कि मैंने सिक्का नहीं लिया। लेकिन मेरे खीसे में कोई हाथ नहीं डाल सकता है। मैंने आपसे कहा भी नहीं था कि आप सिक्का दिखलाइए। इतना मैं कहता हूं, मैंने सिक्का नहीं लिया। लेकिन मेरे खीसे में हाथ नहीं डालने दूंगा, मैं कोई चोर थोड़े ही हूं। सोच कर डालना, यह पिस्तौल मेरे हाथ में है। तब तो बात और भी स्पष्ट हो गई। हम सबको भी स्पष्ट हो गई, बात साफ है कि इस आदमी ने सिक्का ले लिया। पुलिस को फोन करना पड़ा।
लेकिन इसके पहले कि पुलिस आती एक और अदभुत घटना घट गई। पुलिस को फोन किया गया, सारे घर के दरवाजे बंद कर दिए गए। झगड़े की नौबत साफ थी। उस आदमी को छूना ठीक नहीं था, वह गोली चला सकता था। अजीब पागल था! लोग समझा भी रहे थे, लेकिन वह राजी नहीं था। और तभी एक नौकर ने एक पानी के बर्तन को टेबल पर से उठाया और लोगों ने देखा कि उस बर्तन के नीचे वह सिक्का रखा हुआ है। उस आदमी ने बेचारे ने सिक्का नहीं लिया था, सिक्का टेबल के ऊपर था।
तो लोगों ने कहाः तुम कैसे पागल हो? जब तुमने सिक्का नहीं लिया, तो इतना उपद्रव क्यों खड़ा किया?
उसने अपने खीसे में हाथ डाला और उसी जैसा दूसरा सिक्का बाहर निकाला, उसने कहाः दूसरे सिक्के का मालिक मैं हूं। यह जो आदमी कह रहा था कि दूसरा सिक्का है, वह मेरे पास है। मैंने भी सोचा कि चलूं शादी में लेता चलूं और वहां दिखला दूं। लेकिन इसने पहले दिखला दिया, तो मैं चुप रह गया। अब कोई मतलब न था दिखलाने का। लेकिन पांच मिनट पहले कौन मेरा विश्वास कर सकता था कि यह सिक्का चोरी का नहीं है? कौन विश्वास कर सकता था? पांच मिनट पहले कौन ऐसा आदमी होगा उन दो सौ लोगों में जिसने शक न किया हो कि इसने चोरी की?
लेकिन जिंदगी इतनी रहस्यपूर्ण है, जिंदगी इतनी मिस्टीरियस है कि इस तरह के निर्णय लेने बिल्कुल अचेतन, मैकेनिकल हैं। इनमें कोई होश नहीं है, ये निर्णय सजग और जागरूक नहीं हैं।
तो जिंदगी में एक-एक चीज परखें। जो हम विचार करते हैं, वह सजग होकर विचार कर रहे हैं? क्या उसके सारे पहलुओं को हम जानते हैं? क्या सारे रहस्य से हम परिचित हैं? जो हम काम कर रहे हैं, वह सजग होकर कर रहे हैं? जो क्रोध, जो प्रेम, जो घृणा हमसे बह रही है, वह सजग है या बेहोश है? जो हम सोच रहे हैं, जो हम भाव कर रहे हैं, वह सजग है या बेहोश है? इसकी खोज, इसकी पहचान, इसकी परख जितनी गहरी होगी, उतना ही आपको दिखाई पड़ेगा कि आप बिल्कुल सोए हुए आदमी हैं। आप जागे हुए आदमी नहीं हैं। और अगर यह दिखाई पड़ जाए, तो बड़ी बात हो गई, क्योंकि यह दिखाई पड़ जाना जागने का पहला सूत्र है।
तो यह निवेदन करता हूं आज की सुबह, तो इस पर थोड़ा विचार करेंगे, खोजेंगे।
कल मैंने कहाः ज्ञान से छुटकारा हो जाना चाहिए। आज मैं आपसे कहना चाहता हूंः यांत्रिकता से छुटकारा हो जाना चाहिए। लेकिन यांत्रिकता से छुटकारा तभी हो सकता है जब हम जान लें कि यह यांत्रिकता है। हमारा अहंकार इसको मानने नहीं देता, वह कहता हैः मैं और यांत्रिक? मैं हूं समझदार! मैं हूं होशियार! मैं हूं विचारशील! कौन कहता है मैं यांत्रिक? हमारा अहंकार मानने नहीं देता कि मैं यांत्रिक हूं। और जिसका अहंकार यह मानने नहीं देता कि मैं यांत्रिक हूं, वह निश्चित रहे, उसका अहंकार उसे सुलाए रखेगा और कभी जागने नहीं देगा।
तो बहुत, अपने प्रति बहुत कठोर होने की जरूरत है। दुनिया में हम दूसरों के प्रति तो बहुत कठोर हो जाते हैं, अपने प्रति बिल्कुल नहीं। अपने प्रति बहुत कठोरता से जांच करने की जरूरत है कि सच्चाई क्या है? क्या है सच्चाई मेरे चित्त की? और अगर इसको देखेंगे, तो कठिन नहीं है यह बात देख लेनी कि जिंदगी में हमने जो कुछ किया है, वह हमसे हुआ है, हमने किया नहीं है। हम उसके मालिक नहीं थे। हम बिल्कुल बेहोश थे। और अगर यह बात दिख जाए, तो इससे बड़ी क्रांतिकारी कोई घटना नहीं होती मनुष्य के जीवन में। फिर इसके बाद कुछ हो सकता है। वह क्या हो सकता है, उसकी बात मैं कल करूंगा। लेकिन आप यह देखेंगे, तो ही वह हो सकता है। वह मेरे कहने से कुछ भी नहीं हो सकता। तो आखिरी सूत्र की बात मैं कल करूंगा।
कल मैंने कहाः ज्ञान से छुटकारा चाहिए। आज मैं आपसे कहता हूंः यांत्रिकता से। और कल तीसरे सूत्र की बात करूंगा। इस संबंध में जो भी प्रश्न होंगे, वह दोपहर और संध्या मैं बात करूंगा।

अभी हम सुबह के ध्यान के लिए थोड़ी देर बैठेंगे एक दस मिनट और उसके बाद सुबह की बैठक पूरी होगी।

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