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बुद्ध कहते हैं संदेह करो। आसानी से किसी पर विश्वास मत करो।-The Buddha says doubt. Do not trust anyone easily.

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बुद्ध कहते हैं संदेह करो। आसानी से किसी पर विश्वास मत करो।
चाहे वह बात किसी महानुभाव ने कही हो या किसी पुस्तक में लिखी हो। उस की खोज करो। अगर तुम किसी चीज को मान लोगे तो कभी जान नहीं पाओगे। बुद्ध जब महापरिनिर्वाण ले रहे थे। तब उन्होंने अपने जीवन का अंतिम उपदेश अपने शिष्यों को दिया। कहा "अप्पो दीपो भव" अपना दीपक स्वयं जलाओ। किसी की शरण में न जाना, अपनी शरण में जाओ। संदेह करो और जानलो जो है। बुद्ध महापरिनिर्वाण के अंतिम क्षणों में भी यह नहीं कहते कि जो सत्य मैने पाया है और मैने तुम्हें जो बताया उस पर चलो। वे कहते हैं चाहे कोई बात मैने ही क्यों न कही हो उस पर आसानी से विश्वास मत करना। अपनी बुद्धि से, अपने विवेक से निर्णय लेना। उसकी खोज करना? और वह तुम्हें मिलती है तो ही तुम उस पर विश्वास करना। खोज।जारी रखना। रास्ते में मत भटक जाना। खोजने से उत्तर अवश्य मिलेगा।
बुद्ध चाहते तो कह सकते थे कि जो मैंने पाया वह मैंने तुम्हें दिया। जो मैंने तुम्हें दिया उसपर ही तुम चलो। और सत्य के मार्ग को गृहण करो। मगर उन्होंने अपने पूरे जीवन और अपने परिनिर्वाण के अंतिम क्षणों में भी ऐसा नहीं कहा। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मानने की परिपाटी फिर से चालू हो। और जो ज्ञान मैंने बताया। लोग उसे मानकर बैठ जाएं और उसे ही रटते रहें। वह चाहते थे कि प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर समाहित ज्ञान को जान सकें। इसलिए उन्होंने कहा कि सन्देह मत करो। सन्देह करने से खोज जारी रहती है। अगर हमें किसी चीज पर सन्देह है तो हम अवश्य ही अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके उसके उत्तर ढूंढना चाहेंगे और खोजेंगे कि क्या वह चीज सत्य है या असत्य लेकिन अगर हम उसी चीज को मानकर बैठ जाएं तो वह हमारे पूरे जीवन वैसी ही रहेगी। जैसी कि हम मान कर बैठ गए हैं। उसके सत्य होने या असत्य होने के बारे में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाएगी। बुद्ध जीवन में संदेह की बात करते हैं। आप अपने चारों तरफ देखें। तब आप को अपने चारों तरफ सब कुछ सामान्य चलता दिखाई देगा। कभी कभी कुछ असामान्य बात भी दिखाई देगी। लेकिन जिन चीजों को हम असामान्य मान लेते हैं। वह तो हजारों साल से चली आ रही हैं। औऱ आगे भी होती रहेंगी। जैसे जन्म लेना, जवान होना, वृद्ध होना और आखिरकार मृत्यु को प्राप्त हो जाना। जन्म लेने और मृत्यु होने के बीच में हम बहुत कुछ करते हैं। लेकिन हम क्या करते हैं? हम वही करते हैं जो हम से पहले हमारे पूर्वजों ने किया है। और उनके पूर्वजों ने भी किया होगा। जब समनुष्य आया है तब से अब तक। हर पीढ़ी एक ही प्रोग्राम को कार्य की तरह रिपीट कर रही है। कुछ भी नया नहीं है। हट बार एक ही चीज हो रही है। और इस पर उन्हें कोई संदेह नहीं है। ये एक ही बात बार बार दोहराए जा रहे हैं। आप देखेंगे कि आप के आसपास मनुष्य जीवन के अलावा अभी और भी जीवन हैं। आप शेरों के झुंड को लीजिए। हज़ारों साल से शेर वैसे ही हैं। जैसे कि पहले हुआ करते थे। वे पहले भी शिकार किया करते थे ओर जानवरों का माँस खाते थे। वे आज भी शिकार करते हैं और जानवरों का माँस खाते हैं। हाँ उन शेरों को छोड़ दीजिए। जो इंसानों के सम्पर्क में आ गए हैं। लेकिन आज भी वे खाते तो माँस ही हैं। इसी तरह जंगल में रहने वाला हिरण घास फूस खाता है। कभी जानवरों का शिकार नहीं करता और यह भी हजारों सालों से ऐसा ही है। इसमें भी कोई बदलाव नहीं है। लेकिन सभी जीव अपने अपने वर्ग के हिसाब से वैसा ही जी रहे हैं। जैसे हजारों सालों से चला आ रहा है। लेकिन इन जानवरों से बुद्धि में हम श्रेष्ठ हैं। हमारे पास सीमित बुद्धि है।और इसी कारण हम अपने आप को जानवर नहीं कहते।
श्रेष्ठ होने के कारण हमने अपने आप को एक अलग वर्ग में रख लिया है। जिसे कहते हैं मनुष्य या मानव। लेकिन हम ने ये सोचा ही नहीं कि हम उन जानवरों से कुछ भी अलग नहीं हैं। वह भी अपना जीवन जी रहे हैं एक प्रोग्राम की तरह। ओर हम भी अपना जीवन जी रहे हैं एक प्रोग्राम की तरह। हजारों साल पहले जब से मानव सभ्यता आई तबसे अब तक बाकी सब जानवरों की तरह मनुष्य न भी अपने कार्यों को दोहराया है आज भी राजनीति वैसी ही है जैसी हजारों साल पहले होती थी। आज भी लालच वैसा ही है जैसा हजारों साल पहले हुआ करता था। हजारों साल पहले वासना जैसी मनुष्य में थी वैसी ही वासना आज भी है। अच्छे लोग पहले भी हुआ करते थे और आज भी हैं। क्रूर तानाशाह लोग पहले भी होते थे और आज भी हैं। यहां सिर्फ समय बदला है। बाकी हम जानवरों की तरह से ही अपना जीवन जी रहे हैं।
बुद्ध कहते हैं सन्देह करो। बुद्ध चाहते हैं कि आप इस चक्करव्यूह से बाहर निकलें। इस संसार रूपी नदी में आप बह न जाएं बल्कि तैर कर बाहर आ जाएं। तब आपके अंदर धर्म का उदय होगा। और आप सही और गलत को आसानी से पहचान सकेंगे। एक रोबोट को देखें। एक रोबोट को प्रोग्राम दिया जाता है। रोबोट को जितना प्रोग्राम दिया जाता है। वह उतना ही कार्य करता है ओर सोचता है, इस के अलावा और कुछ कार्य या बात समझ में नहीं आती। जबतक हम उस रोबोट के प्रोग्राम को बदल न दें। वह रोबोट एक मृत ऊर्जा है। लेकिन मनुष्य के अंदर एक जीवंत ऊर्जा है। जिसके कारण वह अपने आप को बदल सकता है। अपनी समझ बढ़ा सकता है, बुद्धि का विस्तार कर सकता है ओर सत्य को पा सकता है। इसी कारण बुद्ध कहते हैं सन्देह करो। अगर आप किसी चीज को मानकर बैठ जाओगे तो आप उस प्रोग्राम की तरह ही चलते रहोगे जो हजारों सालों से चला आ रहा है। बार बार एक ही गलती करते रहोगे। ओर अगर आप जानने की कोशिश करोगे तो आप अपने अंदर के प्रोग्राम को बदलने की राह पर चलोगे। इसी कारण बुद्ध अपने शिष्यों से यह नहीं कहते कि तुम मेरी शिक्षा को मान लो। वे कहते हैं तुम जानलो जो सत्य है।
धन्यवाद।
संग्रहकर्ता उमेद सिंह सिंगल।

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