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ब्राह्मणी के द्वारा जीवरक्षा

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ब्राह्मणी के द्वारा जीवरक्षा

गके म्वेडियार मानाके मन्दिर्मे चग्डी-  टर नुन हा या इसी श्रीचमे प्क द्िन  ननो मगज रीभासजी महागजका  जदिन ४।न मेडियार मानाकी बिशेर पूजाके  नगज्के हजूरी ग्वेडियार मन्दिग्मे आये। पूजकी  , भोग नथा बडिदानके रिथे एक बकर वे साथ  रे थे उनके माथ प्रवन्धके डिर यानेदार तथा कुल्  নिी भी   तुष्टनके आचार्य भट्ट जयगाम पुन्योत्तमकी वर्म-  पी श्रीमनी यल्नर्गवर्ट अें थीं। उन्होंने जव सुना  कि माলके भेगवे नने बकरेकी त्रछि दी जायगी,  नय उन्दो बा क्षोभ दुआ उन्होंने मोचा-क्या मानाजी  बकरेी नके लोगमे प्रमन्न होगी ? नहीं नहीं, ऐमा  नहीं गा मै नामगकी बारा बैठी है नेग  चराहे उनर जञाप, में वकरेकी बन्ि नहीं होने  देग ' यह इद विचार करके अम्परगीचाई मानाजीके  द्वाे पान जाकर बैंठ गर्गी   जजी पूजन-मामप्रीके साथ्र पत्ारे बकरेो  শन करयाकर देवीजीके नाम्ने खडा किया गण।  थानंदार नाथ थे आादगीके पूछनेपर हजरगीने बनाया  कि मगज माहत्रके जन्मदिनके अवमग्पर देश्रीजीकी  पूजाक डिपे बकरेकी बलि ढी जानगी ऋब्राह्मगीने का-जबनक मैं यहाँ बैठी हूँ बकरेका ब्रन्दिदान नहीं  हो मकता किमी जीवके माससे ही ढेवीजी प्रसन्न  होनी हों तो वकरेके बदले इन ब्राह्मगपुत्रीका बञ्दिान  कर दीजिये (' उन्होंने  बड़ी इृढ़नासे अपना निश्चय  बनया   हुजूरी तपा थानेदाग्ने ब्राह्मगीको बहुन नमझाया।  महाराज साहवके नाराज होनेका ढर भी दिखटाया   हमन्गेग बहाँ जाकर क्या उचर देंगे यो अपनी मजबूरी  भी व्यक्त की, पग्तु आहमगी अने निथचयसे जग भी  नहीं हिलीं। वे बोली---आप जाकर महागज बहादुरमे  यह दीनिने कि एक त्रह्मगरकी उडकीने हमे बडिद्वान  नहीं कनने दिया फिर महाराज त्रहादुर जा कुछ ढण्ड  देंगे मी मुझे स्त्रीकार होगा   आाह्मणीके प्रभावमे हजूरीने अपना आग्रह छोड  द्रिया। बकरेके कानके पासमे जरा-सा खून लेकर उससे  देवीजीके निळक कर द्विया वकरा छोड़ दिया गया।  हजूरीने देबीजीका पूजन करके कसार-उपर्सीका भोग  लगाचा और उमी भोगको लेकर वे महाराजाके पास  गने वकरेका अद्िान क्लनेकी सारी घटना उन्होंने  सुनायी गुणग्राही महाराज सुनकर प्रसन हुए और  उसी द्िनमे जन्म-द्विनपर होनेत्राला जीवोंका बलिदान  बद कर द्रिया गया  

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