loading...

सच्च? भाव

Share:
सच्च? भाव 

एक गँवार गडरिया पर्वतकी चोटीपर बैठा प्रार्थना कर रहा था…ओ खुदा! यदि तू इधर पधारे, यदि तू मेरे पास आनेकी कृपा को तो मैं तेरी सेवा करूँगा । में तेरी दाढीमें कंघी करूँगा, तेरे सिरके केशोंसे जुएँ निकालूँगा, तेरे शरीरमेँ त्तेलकी मालिश करके तुझे स्नान कराऊँगा । मैं अपने-आपको तुझपर न्योछावर कर दूँगा । तेरे पैर मैं अपनी दाढीसे पोंदृहूँगा । तू सोना चाहेगा तो तेरे लिये बिछोना बिछाऊँगा । तू बीमार पड़ेगा तो तेरी सेवामें रात-दिन खडा रहूँगा। मेरे पास आ, मेरे अच्छे खुदा! मैं तेरा गुलाम बनकर रहूँगा । ' 

हजरत मूसा उधरसे कहीं जा रहे थे । उन्होंने उस गड़रियेसे यूछा-' अरे मूर्खा तू किससे जातें कर रहा है ? किस बीमारकी सेवा करना चाहता है ? ' 

गड़रियेने कहा…"मैं रवुदासे बातें कर रहा था और 

उन्हींकी सेवा करना चाहता हूँ।" 

मूसाने उसे डाँटा…' अरे बेवकूफ ! तूतो गुनाह कर रहा है । रवुदाके कहों बाल हैँ और वह सर्वशक्तिमान् कहों बीमार पड़ता है । वह तो अशरीरी, अजन्मा, सर्वव्यापक है । उसे मनुष्योंके समान सेचा-चाकरीकी क्या आवश्यकता 2 ऐसी बेवकूफी फिर मत करना ।' 

वेचारा गड़रिया चुप हो गया । मूसा-जैसे तेजस्वी फकीररपे वह क्षमा माँगनेके अतिरिक्त कर क्या सकता था । परंतु उस दिन मूसा स्वयं जब प्रार्थना करने लगे, आकाशवाणी हुईं…'मूसा ! मैंने तुम्हें मनुष्योंका चित्त मुझमें लगानेक्रो भेजा है या उम्हें मुझसे दूर करनेक्रो ? उस गड़रियेका चित्त मुझमें लगा था, तुमने उसे मना करके अपराध किया है । तुम्हें इतना भी पता नहीं कि सच्चा भाव ही सच्ची उपासना है ।' 

No comments