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हैंश्मी से अभ्यास होना अच्छा

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हैंश्मी से अभ्यास होना अच्छा ४ 

एक सेठजीने अन्नसत्र खोल रखा था । दानको कम धे भी नहीं । सेठजी गछेका धोक व्यापार करते थे । भावना तो कम थी, मुख्य भावना तो थी कि समाज उन्हें अन्नके कोठारोंमें वर्षके अन्तमेँ जो घुना-सड़ा अन्न दानवीर समझे, उनको प्रशंसा को । उनके प्रशंसक लोग बिकनेसे वच रहता था, वह अन्नसत्रके लिये दे दिया 
जाता था । प्राय: सही ९न्यारदृकौ रोटी ही सेठजीके अन्न क्षेत्रमे' मूखोंको प्राप्त होती थी । 

सेठजीके पुत्रका बियाह हुआ । पुत्रवधू घर आथी । यह सुशीला, धर्मज्ञ और बिचारशीला धी । अपने श्वशुरका व्यवहार देखकर उसे दुख दुआ । भोजन बनानेका थार उसने स्वयं उठाया । पहिले ही दिन अन्नक्षेत्रसे सडी ब्बेचारकग्र आटा मँगवाकर उसने एक रोटी बनायी । सेठजी भोजन करने बैठे थे । दूसरे भोजनके साथ उनकी थालीमें वह रोटी भी पुत्रबधूने परोस दो । काली, मोटी रोटी देखकर सेठजीने कुतूहलवश पहिला ग्रास उसीका मुखमें डाला और धूथू करके थूकते हुए चोदने-'बेटी ! घरमें 

५. 

आटा तो बहुत है । तूने रोटी बनानेके लिये यह रूडी पचारका आटा कहाँसे मँगाया ? क्या सूझी तुझे १ ' ३ 

पुत्रवधू बोली…'पिताजी 1 आपके अत्र-क्षेत्रमें इसी आटेकी रोटी भूखोंक्रो दी जाती है । परलोकमें तो वही मिलता है जो यहॉ दिया जाता है । वहाँ केवल इसी आटेकी रोटीपर आपको रहना है । इसलिये मैँने सोचा कि अभोसै इसे खानेका अभ्यास आपको हो जाय धीरे-धीरे तो वहॉ कष्ट कम होगा।" 

कहना नहीं होगा कि अन्नक्षेत्रका सड़ा आटा उसी दिन फेंकवा दिया गया और वहाँ अच्छे आटेका प्रबन्ध 

हुआ । -सु० सिं० 

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