loading...

अपने अनुभव के बिना दूसरे के कष्ट का ज्ञान नहीं होता

Share:
अपने अनुभवके बिना दूसरेके कष्टका ज्ञान नहीं होता 

एक राजकुमारक्री शिक्षा यूरी हो चुकी थी । महाराज स्वयं आये थे मन्वियो'के साथ गुरुगृहसै अपने कुमारको ले जाने । समावर्तन संस्कार समाप्त हुआ और राजकुमारने आचार्यंके चरणोंमें प्रणाम किया । आचार्य बोले-'ठहरो ! मेरी छडी तो लाओ ।' 

राजकुमारने छडी लाकर दी । आचार्यने उस सुकुमार राजकुमारक्री दो छडी कसकर जमा दी । 

उसकी पीठपर छडीके चिह्न उभड़ आये । रक्त छलछला उठा । अब आचार्यने आशीर्वाद दिया-' वत्स ! तुम्हारा मङ्गल हो । अब पिताके साथ जाओ ।' विनम्र राजकुमार कुछ नहीं बोला; किंतु राजासे रहा नहीं गया । वे बोले…-' अपराध क्षमा कों ! निरपराधक्रो ताड़ना देनेका कारण जाननेकी इच्छा हैँ ।' आचार्यने शान्तिरपे कहर-'इसकी शिक्षामें इतना 
अभाव रह गया था, दण्डकी तो कोई जात ही नहीं । यह इतना नम्र और सावधान है कि इसे ताडना देनेका अवसर ही नहीं आया । परंतु इसे शासक बनना है, 

दूसरोंको दण्ड देना है । उस समय इसे अनुभव होना चाहिये कि दण्डक्री वेदना कैसी होती है '। ' …सुं० सिं० 

No comments