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फु किसी भी हालतमें निद्देर्रेप नहीँ

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फु किसी भी हालतमें निद्देर्रेप नहीँ 1 

पहले समयकी बात हैं । किसी देशके एक छोटेसे गाँवमें एक व्यक्ति रहता था । उसके पास एक गधा था । वह उसे बेचना चाहता था । अपने लड़केको साथ लेकर वह निकटस्थ बाजारमें गधा ब्रेचनेके लिये चल पडा । पिता गधेके मीठपर था और लड़का पैदल चल रहा था । 

वे कुछ दूर गये थे कि तीन व्यक्ति मिले । उनमेसे एकने कहा कि " यह कैसा जाप हैँ, अपने तो सवार 

है गधेक्री पीठपर और लडका पैदल चल रहा है कँकरीले रास्तेपर ।' पिता गधेपरसे उतर पड़। और लडका बैठ गया । 

कुछ दूर गये थे कि दो महिलाएँ मिली । 'कैसा पुत्र है । बूढे चापको पैदल ले जा रहा है और स्वयं सचारीपर विराजमान है ।' उनमेंसै एकने व्यंग किया! 

पिताने पुत्रसे कहा कि 'सबको समान रूपसे प्रसन्न रखना बहुत कठिन है । चलो, हम दोनों ही पैदल चलें ।' 
दोनो" पैदल चल मड्रे । 

आगे बढ़नेपर कुछ लोमोंने कहा कि 'कितने मूर्ख हैं दोनों 1 प्ताथमें ह्नष्ट-पुष्ट सवारी होनेपर भी दोनों पैदल जा रहे हैं ।' पिता-पुत्र दोनों गधेपर सवार हो गये । पर दो-चार कदम आगे बढ़नेपर किसीने कहा कि कितने निर्दय हैं दोनों; इतने भारी संडै-मुसंडै बेचारे दुबलेपतले गधेपर लदे जा रहे हैं ।" दोनों तत्काल उतर पड़े और सोचा कि गधेक्रो कंथेपर रखकर ले चलना चाहिये । बाजार थोडी ही दूर रह गया था । उन्होंने पेड़की एक डाली तोडी और उसके सहारे गधेक्रो रस्सीसे बाँधकर कंधेपर लटका लिया । 

चाजारमें प्रवेश करते ही लोग कहकहा मारकर हँस पड़े । 

'देखो न, कितने मूर्ख हैं दोनों: कहाँ तो इन्हें गधेकी मीठपर सवार होकर आना चाहिये और कहॉ ये उसे स्वयं अपने कंधे पर ढो रहे हैं 1' लोमोंने मजाक उड़ाया । 

बूढे व्यक्तिकी समझमें सारी बात आ गयी ! 

हमलोगोंने सबको प्रसत्र करना चाहा, इसलिये किसीको भी प्रसत्र न कर सके । सबसे अच्छी बात यह हैँ कि ज़गत्के लोगोंकी आलोचनापर ध्यान न दे; क्योंकि जगत् तो एक-न-एक दोष निकालेगा ही । जगत्की दृष्टिमेँ कोई किसी भी हालतमें निर्दोष नहीं है । अत: सुने सबकी, पर करे वही जो मनक्रो ठीक लगे । जिस कार्यंके लिये आत्मा सत्येरणा प्रदान करे वही हमारा कर्तव्य है । पिताने पुत्रको सीख दी ।

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