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आखिर क्यों सहायता लेने में सकोच करना चाहिए-Why should I hesitate to help?

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आखिर क्यों सहायता लेने में सकोच करना चाहिए

एक घुडसवार कहीं जा रहा था । उसके हाथ से चाबुक गिर पड़ा । उसके साथ उस समय बहुत-से मुसाफिर पैदल चल रहे थे परंतु उसने किसी से चाबुक उठाकर दे देने के लिये नहीं कहा । खुद घोड़े से उतरा और चाबुक उठाकर फिर सवार हो गया । यह देखकर साथ चलने वाले मुसाफिरों ने कहा- भाई साहब ! आपने इतनी तकलीफ क्यों की चाबुक हमीं लोग उठाकर दे देते, इतने से काम के लिये आप क्यों उतरे 

घुड़सवार ने कहा- भाइयो ! आपका कहना तो बहुत ही सज्जनता का है परंतु मैं आपसे ऐसी मदद कैसे ले सकता हूँ! प्रभु की यही आज्ञा है कि जिससे उपकार प्राप्त हो, बदले में जहाँ तक हो सके, उसका उपकार करना चाहिये। उपकार के बदले  में प्रत्युपकार करने की स्थिति हो, तभी उपकार का भार सिर उठाना चाहिये। मैं आपको पहचानता नहीं, न तो आप ही मुझको जानते हैँ । राह में अचानक हम लोगों का साथ हो गया है, फिर कब मिलना होगा, इसका कुछ भी पता नहीं है । ऐसी हालत मेँ मैं उपकार का भार केसे उठाऊँ ?' 

यह सुनकर मुसाफिरों ने कहा - अरे भाई साहब ! इसमें उपकार क्या है ? आप-जैसे भले आदमी के हाथ से चाबुक गिर पड़ा, उसे उठाकर हमने दे दिया । हमें इसमें मेहनत ही क्या हुई 

घुड़सवार ने कहा-चाहे छोटी-सी बात या छोटा सा ही काम क्यों न हो, मैं लेता तो आपकी मदद ही न? छोटे-छोटे कामों में मदद लेते-लेते ही बड़े कामों में भी मदद लेने की आदत पड़ जाती है और आगे चलकर मनुष्य अपने स्वावलम्बी स्वभाव को  खोकर पराधीन बन जाता है ।

आत्मा में एक तरह की सुस्ती आ जाती है और फिर छोटी-छोटी बातों मेँ दूसरों का मुँह ताकने की बान पड़ जाती है । यही मन में रहता है मेरा यह काम कोई दूसरा कर दे, मुझें हाथ-पैर कुछ भी न हिलाने पडें । इसलिये जब तक कोई विपत्ति न आवे या आत्मा को  उन्नति के लिये आवश्यक न हो, तब तक केवल आराम के लिये किसी से किसी तरह की भी मदद नहीं लेनी चाहिये । जिनको मदद की जरूरत न हो वे जब मदद लेने लगते हैँ, तब जिनको जरूरत होती है, उन्हें मदद मिलनी मुश्किल हो जाती है ।

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