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बड़ा प्रबल-प्रकाश है - Big light

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बड़ा प्रबल-प्रकाश है

संसार अग्नि और पानी का अथाह समुद्र है । प्रभु ने अनादि काल से सतगुरु को इससे पार ले जानेवाला जहाज बनाया हुआ है । अंधा मनमुख अपने अहं में डूबा इस तथ्य को नहीं समझता है और बार-बार जन्म-मरण की चक्कर में फंसा रहता है । भाग्य का लेख नहीं मिटाया जा सकता है । रूहानियत से अन्धों को मौत के दरवाज़े पर बहुत यातना का सामना करना पड़ता है । पूर्व गलत संस्कारों के प्रभाव में वह और गलत कर्म करते हैं और नरकों के हकदार बन जाते हैं । अज्ञानता से अन्धे, नासमझ और विवेकहीन माया के जाल में फँस जाते हैं और लालच और अहम् के प्रभाव में बर्बाद हो जाते हैं । बिना परमात्मा रूपी आत्मा की सजावट का क्या महत्व है ? वह अपने पति को भूलकर दूसरों के पतियों के चक्कर में फँस गयी है । जैसे कि एक वैश्या के बच्चे के पिता के बारे में पता लगाना मुश्किल है उसी तरह से मनमुख द्वारा किये हुए कर्मों का कोई मोल नहीं है । वह एक भूत के समान देह रूपी पिंजरे में सब तरह की व्याधियों से ग्रस्त रहता है । जो रूहानियत की समझ से खाली हैं वह नरक में सड़ते हैं । धर्मराज हर किये हुए कुकर्म की सजा मनमुख को देता है । नरक में भयानक अग्नि में उसे ज़हरीली लपटों में जलाया जाता है, उसकी बेईज्ज्ती की जाती है । आशा-तृष्णा से ग्रस्त हुआ वह झूठ और रिश्वतखोरी में लिपटा रहता अपना भार बढ़ाता रहता है, अब वहअब हमें सहज योग की विधि करनी है । कैसे करोगे ? कबीर साहिब बताते हैं कि आँखों को बन्द करो । कान जोकि बाहरी आवाज़ सुनते हैं उनको बन्द कर दो । जिह्वा बन्द रखो । अन्दर की आवाज़ सुनने की कोशिश करो । शुरू में कई तरह की आवाज़ सुनाई देंगी जो अस्पष्ट होंगी लेकिन भजन, सुमिरन करते-करते आवाज़े स्पष्ट होने लगेंगी । हिम्मत मत हारो, लगे रहो । कबीर साहिब बताते है कि पहले तुम्हे ऐसी आवाज़ सुनाई देगी जैसे झींगुर बोलते हैं ।  कैसे अथाह सागर को पार कर सकता है ? सतगुरु ही वह मल्लाह है जो इस भवसागर से
दोनों तिल एक तार मिलाओ ! तब देखो गुलज़ारा है ॥
दोनों आँखों की बनावट ही ऐसी है कि इनकी ज्योति तीसरे नेत्र से आती है । यह तीसरा नेत्र शिव नेत्र है । मुसलमान फकीर इसे नुक्ताये शुबेदा कहते हैं । गुरु साहिबान ने इसको घर-दर, तीसरा तिल या दसवीं खिड़की कह कर बयान किया है । अब जब आप रामनाम का सुमिरन करेंगें तो आपका ध्यान इस बाहरी दुनिया से हट कर और पूरे शरीर से सिमट कर इस केंद्र पर ठहर जायेगा । यह कहना आसान है पर यह पीपली (चींटी) मार्ग है जो बड़े संघर्ष भरा है । चींटी जैसे ऊपर दीवार पर चढ़ती है और फिर गिर जाती है लेकिन हिम्मत नहीं हारती और आखिर चढ़ ही जाती है । जब आपका ध्यान एकत्र हो जायेगा तब अन्दर प्रकाश आ जायेगा । रूहानी आँख खुल जायगी । यह आँख स्वयं प्रकाशमान है । हमारी बाहरी आँखें जड़ हैं, स्वयं नहीं देख सकती । जिस जगह ये पांच चीज़ें - सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली, लैम्प आदि न हों ये बाहरी आँख काम नहीं देती । वह जो अन्दर की आँख है उसे इन चीज़ों की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं ही प्रकाशमान है । इन आँखों को बन्द करके उस आँख को खोल लो । इन कानों को बन्द करके उन कानों को खोल लो । बाईबिल भी कहती है कि अगर तू दोनों आखों को एक कर ले तो तेरा पूरा शरीर प्रक्स्श से भर जायेगा । निश्चित तौर पर वह इसी हकीकत को बयान कर रहे हैं न कि अपनी एक आँख फोड़ लो तो आपका शरीर प्रकाश से भर जायेगा । पाचंद सूर एकै घर लाओ । सुषमन सेती ध्यान लगाओ ।
जब तीसरी आँख खुली तो आप देखोगे कि तारा मण्डल आ गया । अब ये तारे बाहर दिखने वाले तारे नहीं हैं ये सूक्ष्म देश के तारे है । आगे सूर्य लोक है और चन्द्र लोक है । इन लोकों को पार करके हमें ऊपर जाना है । अब आगे मार्ग बड़ा सूक्ष्म मार्ग है, अति सूक्ष्म नाडी से हमें जाना है । अब मन तो हाथी जैसा बड़ा है और मुक्ति का द्वार राई के दसवें भाग के सामान बारीक है जाएँ तो जायें कैसे ? कबीर साहिब कहते हैं:र ले जा सकता है ।
कबीर साहिब कहते हैं कि यदि पूरा सतगुरु मिल जाये, वह हम पर कृपा करे तो वपरमात्मा से मिलने का मार्ग एक रोम के दसवें हिस्से के सामान बारीक है । हाथी रूपी मन का अहम् उसे आगे बढ़ने से रोकता है ।
तिरबेनी के संध समाओ । भौर उत्तर चल पारा है ॥
आगे तीन रास्तॆ हैं - दाहिना, बायाँ, और बीच का । अब बीच की रास्तॆ अपर जाना है । कबीर साहिब कहते हैं कि शरीर का कोई भरोसा नहीं है, कल है आज नहीं । पता नहीं कब टाँग ऊपर उठ जाये । जीते जी ऊपर चढो, मेहनत करो और इन चीज़ों को पार कर जाओ । बायें रास्ते से योगी गये हैं । अन्दर ऋद्धि-सिद्धि, शक्ति आदि का जोर है । इसलिए इस रास्ते से कोई ज़्यादा आगे नहीं पहुँचा और बीच में ही भटक गया । यह रास्ता शैतान का है । जो दाहिना रास्ता है, उसमें बड़े-बड़े विशाल देश हैं पर आगे जाकर मंजिल नहीं मिलती है । सन्तों का रास्ता बीच का है । गुरु इसी रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं ।
घंटा संख सुनो धुन दोई । सहस कंवल दल जगमग होई ।
अब मन और आत्मा नौ द्वारों पार करके तीसरे तिल के अन्दर से आई, आगे उसका सतगुरु सूक्ष्म रूप में उसके अंग-संग है । बड़ा प्रबल-प्रकाश है और यहाँ पर दस तरह के राग हो रहे हैं जिसका कोई नमूना इस संसार में नहीं है । यहाँ पर सहस्त्र-दल-कमल महा प्रकाशक कमल है, यहाँ पर हज़ार बत्ती की ज्योति जल रही है । इस कमल की हज़ार पंखुड़िया अपना-अपना प्रकाश कर रही है । यह प्रकाश नीचे के तीन लोकों को सत्ता दे रहा है । इस कमल से मधुर, मनोहर और आकर्षक धुनें उठ रही हैं जिनको पकड़कर योगीजन अष्ट-दल-कमल से निकलकर सहस्त्र-दल-कमल में पहुंचकर ज्योति का दर्शन करते हैं । आध्यात्मिक मण्डलों पर जाने के लिए संतों का मार्ग यहाँ से प्रारम्भ होता है ।ह हमें इस मुक्ति के द्वार से पार करवा सकता है जो सहस्त्र-दल-कमल का स्थान है इसमें तीन लोकों का कर्ता निरंजन (त्रिलोकीनाथ) वास करता है जिसके दर्शन करने पर आत्मा बहुत ही आनन्दित होती है । यह देश बहुत ही विशाल है । यदि इसका विस्तार में वर्णन किया जाये तो पूरी ज़िंदगी इसका वर्णन करने में निकल जायेगी । अब जो योगी जन प्राणायाम करते हैं, यह उन योगियों का अन्तिम स्थान है । क्योंकि ये प्राण का सहारा लेकर ऊपर चढ़े थे और प्राण की सीमा चिदाकाश तक है । सन्त जन राम-नाम की डोर पकड़ कर ऊपर जाते हैं । जैसे एक कार सड़क पर चलती है लेकिन जब समुद्र आ जाता है तब वह नहीं चलती ।
इसके ऊपर त्रिकुटी की और जाने वाला बंकनाल का मार्ग है (इसे बंक इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये रास्ता टेढ़ा है), जो अति सूक्ष्म नाडी है, बाल के दसवें भाग से भी अधिक बारीक है । इसमें पहुँच कर पहले सीधा जाना पड़ता है, फिर ऊपर और फिर सीधे । यह स्थान सहस्त्र-दल-कमल और त्रिकुटी के मध्य में है । इस स्थान को पार करके आत्मा त्रिकुटी पहुँच जाती है । यह ब्रह्म का देश है, जो बहुत ही सुहावना है ।
यह जो हमारा स्थूल शरीर है, इसके अन्दर सूक्ष्म शरीर है और उसके अन्दर कारण शरीर है । जिस समय आत्मा से ऊपर से सब आवरण उतर जायेंगें, उस समय आत्मा का प्रकाश बारह सूर्य का होगा । यह आत्मा परमात्मा का अंश है । उसे अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं ।
यह ऐसे ही जैसे एक शेर का बच्चा भेड़ों में पल कर खुद अपने को भेड़ ही समझने लगें और भेड़ों के साथ घास खाये और में- में करे । जब कोई शेर आये और उसे उसकी पहचान की याद दिलाये और वह अपनी असली जात पहचान कर शेर की तरह दहाड़े तो सब भेड़ और चरवाहे भग जायेंगें । यहाँ पर आत्मा शेर है, इन्द्रियाँ भेडें हैं और मन चरवाहा है । जब तक आत्मा मन के चंगुल में इन्द्रियों के भोगों में जकड़ी हुई है तब तक कमज़ोर है लेकिन जब वह अपनी असलियत पहचान लेती है तब मन का भय निकल जाता है और इन्द्रिया भी वश में आ जाती हैं ।

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