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परिवर्तन जीवन का नियम है - Change is the law of life

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परिवर्तन जीवन का नियम है - Change is the law of life

उत्तपन्न होने वाली चीज नष्ट होने वाली होती है-यह नियम है।अतः संसार का कितना ही संकल्प-विकल्प हो जाए,वह सब नष्ट हो रहा है।इसलिए उसको रखने की चेष्टा करना भी गलती ही है। और नाश करने का उद्योग करना भी गलती है।संसार में बहुत सी चीजें उत्तपन्न ओरनष्ट होती हैं।पर उनका पाप और पुण्य हमें नहीं लगता।क्योंकि उन से हमारा सम्बन्ध नहीं है।ऐसे ही मन में संकल्प-विकल्प आ जाए,संसार का चिंतनहो जाए

तो उस से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है।न तो याद आने वाली वस्तु के साथ सम्बन्ध है ओर न जिस में वस्तु की
याद आई उस मन के साथ ही हमारा सम्बन्ध है।हमारा सम्बन्ध तो सब जगह परिपूर्ण प्रमात्मा से है।अतः उतपन्नोर नष्ट होने वाले संकल्प-विकल्प से क्या तो रह करें,क्या द्वेष करें।यह तो उत्पत्ति और विनाश का एक प्रवाह है।इस में उपराम हो जाएं 
 
एक चिंतन करते है और एक चिंतन होता है

चिंतन. करें नहीं और अपने आपकोई चिंतन हो जाए तोउस के साथ अपना सम्बन्ध न जोड़ें,तटस्थ रहें।वास्तव में हम तटस्थ ही हैं। क्योंकि संकल्प-विकल्प तो उत्तपन्न और नष्ट होते हैं पर हम ज्यों के त्यों रहते हैं।इसलिए रहने वाले स्वरूप में ही रहें,और संकल्प- विकल्प किउपेक्षा कर दें।तो हमारे पर संकल्प-विकल्प लागु नहीं होगा। साधक एक गलती करता है कि जब उस को संसार याद आता है,तब वह उस से द्वेष करता है, की इन को हटाओ, इन को मिटाओ। ऐसा करने से संसार के साथ विशेष सम्बन्ध जुड़ जाता है। इसलिए उस को हटाने का कोई उद्योग न करे।प्रत्युत ऐसा विचार करे की जो संकल्प- विकल्प होते हैं, उन में भी वह परमात्म तत्त्व ओतप्रोत है।जैसे जल में बर्फ का ढेला डाल दें,तो बर्फ स्वयं भी जल हर उसके बाहर भी जल है। ऐसे ही संकल्प-विकल्प कुछ भी आ जाए वह परमात्मा के अंतर्गत है।और संकल्प-विकल्प के भी अंतर्गत परमात्मा ही परमात्मा परिपूर्ण है।जैसे समुद्र में बड़ी-२ लहरें उठती हैं।एक लहर के बाद दूसरी लहर आती है। उन लहरों में भी जल ही जल है। देखने में लहर अलग दिखती है।पर जल के सिवाए लहर कुछ नहीं है। ऐसे ही संकल्प-विकल्प में परमात्म तत्त्व के सिवाए कोई तत्त्व नहीं है।कोई वस्तु नहीं है।

अभी कोई पुरानी घटना याद आ गई, तो वह घटना पहले हुई थी।अब वह घटना नहीं है।मनुष्य जबर्दस्ती उस घटना को याद कर के घबरा जाता है,कि क्या करूँ मन नहीं लगता।वास्तव में जब परमात्मा का ध्यान करते हैं, उस समय अनेक तरह की पुरानी बातों की याद,पुराने संस्कार नष्ट होने के लिए प्रकट होते हैं।परंतु साधक इस बात को समझे बिनों को सत्ता दे कर और मजबूत बना लेता है।इसलिए उन की उपेक्षा कर दे। उन को न अच्छा समझे न बुरा समझे,तो वे जैसे उत्तपन्न हुए वैसे ही नष्ट हो जायेंगे।हमारा सम्बन्ध परमात्मा के साथ है। हम परमात्मा के हैं और परमात्मा हमारा है। सब जगह उस परिपूर्ण परमात्मा मे हमारी स्थिति सब समय में है- ऐसा मान कर चुप बैठ जाए।अपनी तरफ से कुछ भी चिंतन न करें अपने आप चिन्तन हो जाए तो उस से सम्बन्ध न जोड़ें। फिर वृतियां अपने आप शांत हो जायेंगीं।और परमात्मा का ध्यान स्वतः होगा । कारण कि वृतियां आने जाने वाली हैं।और परमात्मा सदा रहने वाला है। जो स्वतः सिद्ध है,उस में क्या करना पड़ेगा।करना कुछ है ही नहीं। साधक ऐसा मान लेता है कि मैं ध्यान करता हूँ, चिंतन करता हूँ -यह गलती है।हब सब जगह एक परमात्मा ही है, तो किस चिंतन करें, क्या ध्यान करें। समुद्र में लहरें होती हैं पर जल तत्त्व में न लहरें हैं न समुद्र है।ऐसे ही परमात्म तत्त्व में न संसार है न आकृति है,न आना जाना है।वह परमात्म तत्त्व परिपूर्ण है।सम है, शांत है,निर्विकार है,स्वतः सिद्ध है।उसका चिंतन नहीं करना पड़ता।उस का चिंतन क्या करें।उस में तो हमारी स्थिति स्वतः है।हर समय है।व्यवहार करते समय भी हमुस परमात्मा से अलग नहीं होते।प्रत्युत निरन्तर उसमे रहते हैं।जब व्यवहार वाली वस्तुओं को आदर देते हैं, महत्त्व देते हैं, तब विक्षेप होता है।वास्तव में विक्षेप उस बात से नहीं होता।उस को सत्ता दे देते हैं, महत्ता दे देते हैं, उस से होता है।

जैसे आकाश में बादल आते हैं और शांत हो जाते हैं।ऐसे ही मन में कई स्फुरनाएँ आती हैं और शांत हो जाती हैं आकाश में कितने ही बादल आयें और चले जायें ,पर आकाश में कुछ परिवर्तन नहीं होता।वह ज्यों का त्यों रहता है।ऐसे ही ध्यान के समय कुछ याद आए, अथवा न आए,परमात्मा परिपूर्ण ज्यों का त्यों रहता है।कुछ याद आए तो उस में भी परमात्मा हर कुछ याद न आए तो उस में भी परमात्मा ही है।देखने में ,सुनने में समझने मेंजो कुछ भी आ जाए ,उन सब के बाहर भी परमात्मा है और सब के भीतर भी परमात्मा है।चर और अचर जो कुछ भी है वह भी परमा ही है।दूर से दूर भी परमात्मा है। नजदीक से नजदीक भी परमात्मा है।

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