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गठरी -३ कित भुला - gathari gathari kit bhula - Kabir Ke Shabd

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Kabir Ke Shabd 


कबीर के शब्द

गठरी गठरी-२,
कित भुला रे मुसाफिर गठरी।।

इस गठरी में माल भतेरा,
दाख छुहारे गिरी मिश्री।।

इस गठरी का सौदा करलो,
ओर नहीं कोए हटड़ी।

इस गठरी ने डाकू लूटें,
जादू चले ना कोए जकड़ी।

भक्ति करे तो ऐसी करना,
ज्यूँ चढ़े बॉस पे नटनी।

कह कबीर सुनो भई साधो,
सत्त की है ये पटड़ी।।

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