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गुरुआं ने आन जगाई हे सखी - guru aa ne aan jagai he sakhi - Kabir Ke Shabd

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Kabir Ke Shabd 

कबीर के शब्द

गुरुआं ने आन जगाई हे सखी,
मैं तो भरम भूल में सोऊं थीं।।

शब्द का बाण म्हारै हे लाग्या,
मोह ममता का झगड़ा भाग्या।
मैं पांच पच्चीस बचाई हे सखी।।

प्रेम की बूटी गुरु हमने देगे,
प्रेम प्रीत के रंग में भेगे।
हरि रंग बीच में न्हाइ हे सखी।।

ज्ञान का साबुन गुरु हमने देगे,
जन्म जन्म के दाग वे धोगे।
जोत में जोत समाई है सखी।।

कह कमाली कबीरा थारी बाली,
बिन सद्गुरु नहीं पावै हरियाली।
मैं आपे में आप समाई है सखी।।

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