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गुरु बिन घोर अंधेरा - guru bin ghor andhera - Kabir Ke Shabd

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Kabir Ke Shabd 

कबीर के शब्द

गुरु बिन घोर अंधेरा रे साधो भाई।।
जैसे अगन बसे पत्थर में, नहीं पत्थर को बेरा हो जी।
गुरु गम चोट पड़े पत्थर पे,
आग फिरै चोफेरा हो जी।।

जैसे मृगा नाभि कस्तूरी,नहीं मृगा को बेरा हो जी।
व्याकुल हो वह वन में डोले,
सुंघा घास घनेरा हो जी।।

जब तक सुरतां रहे कुँवारी, नहीं प्रीतम का बेरा हो जी।
आठों याम रहे आलस में,
खेला खेल घनेरा हो जी।।

कह कबीर सुनो भई साधो, गुरु चरणां चित्त मेरा हो जी।
रामानन्द गुरु मिले पूरे,
जाग्या बजाग भलेरा हो जी।।

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