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गुरु बिना मुक्ति - guru bina mukti na hogi re - Kabir ke shabd

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Kabir Ke Shabd 


कबीर के शब्द

गुरु बिना मुक्ति ना होएगी रे, मन चंचल भाई।
गहरे से जल की मछली रे, नदियां बह आई।
लाख बार वा को धो लियो रे, वाकी गन्ध नहीं जाई।।

नदी किनारे बुगला खड़ा रे, खड़ा ध्यान लगाई।
आती तो देखी मछली रे, झट चोंच चलाई।।

ऊपर का बुगला उजला रे, मन मैला भाई।
आँख मीच मोहनी बना रे, झट मछली खाई।।

अगम अगोचर एक वस्तु है रे, गुरुआं से पाई।
कह कबीरा धर्मिदास से रे हंसा चेत मेरे भाई।।

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