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आंतरिक सहजता - Inner ease story in hindi

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आंतरिक सहजता - Inner ease story in hindi

जहां लोग पहुंचे छलांग लगाकर, वहां हम भी पहुंचे मगर धीरे धीरे। सहजता एक उत्तम गुण है।सहजता हमारी क्षमता का अभूतपूर्व विकास है।
जो लोग सहज भाव से निरन्तर प्रयास करते हैं, वे जीवन में बहुत आगे जाते हैं। सहजता का अनुगामी जीवन में कभी पीछे नहीं रहता, पिछड़ता नहीं। एक झटके में शिखर पर पहुंच जाने में आनन्द नहीं है। लेकिन कई लोग सहज होते हुए भी अपेक्षित उन्नति क्यों नहीं कर पाते? वे जीवन में क्यों पिछड़ जाते हैं? आनन्द से वंचित क्यो रह जाते हैं? यहाँ एक प्रश्न औऱ उठता है कि क्या ऊपर से सहज दिखने वाला व्यक्ति क्या वास्तव में सहज है? कई बार ऊपर से तो व्यक्ति सहज दिखाई पड़ता है लेकिन वास्तव में सहज नहीं होता। उसके अंदर एक तूफान चलता रहता है। वह बाहर से भी थोड़ा बहुत झलकना चाहिए, लेकिन नहीं झलकता। अंदर द्वंद्व है, पीड़ा है, राग द्वेष है नकारात्मक भावों का तूफ़ान है। लेकिन बाहर फिर भी खामोशी है। इसका अर्थ यह हुआ कि बाहर की खामोशी अभिनय मात्र है। अब यदि अभीनय ही करना है, तो आंतरिक शान्ति का कीजिये। बाहर की खामोशी बेकार है। बाहर से आप मुखर हैं ये बुरी बात नहीं। बाहर की मुखरता आंतरिक शान्ति प्रदान करनेवाली हो सकती है। आप हंस रहे हैं, मजाक कर रहे हैं, काम कर रहे हैं। प्रशन्नता औऱ पीड़ा दोनों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति कर रहे हैं। हर भाव को व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन मन पर अशांति हावी नहीं है। यही वास्तविक सहजता है। बल्कि जो बाहर से जितना मुखर है, चंचल है, अंदर से उतना ही सहज, सरल होना चाहिए। शरीर को नहीं, मनोभावों को सहजता प्रदान कीजिए तभी बात बनेगी। बाहर की मुखरता औऱ चंचलता से अंदर ही सहजता प्राप्त की जा सकती है। किसी भी प्रकार का शरीरिक श्रम, व्यायाम, योगासन, खेलकूद शिल्प ओर कलाएं, इन सभी के द्वारा आंतरिक सहजता प्राप्त की जा सकती है।किसान मजदूर अंदर से प्रायः सहज ही होते हैं।तथाकथित बुद्धिजीवी या प्रोफैशनल कई बार ऊपर से तो सहज दिखते हैं लेकिन अंदर से उतने ही असहज होते हैं। मानसिक अशांति के शिकार, तनाव व दबाव से पीड़ित, हमेशा दुश्चिंताओं व द्वन्द्व से घिरे हुए। शायद बाहर से असहज होने का समय नहीं। समय है तो एक इमेज बना रखी है कि ये करना है, ये नहीं करना। जबतक भौतिक शरीर की जड़ता श्रम द्वारा समाप्त नहीं की जाती, तबतक आंतरिक सहजता सम्भव भी नहीं। " श्री कृष्ण कहते हैं कि। सहजम कर्म कौन्तेय सदोषमपी न त्यजेत।"अर्थात सहज कर्म दोषपूर्ण होने पर भी त्यागने योग्य नहीं होता। कोई भी कार्य कर रहे हैं, औऱ उसमें बार बार गलती हो रही है, तो उसे ठीक करने का सबसे आसान तरीका है कि उसे औऱ अधिक सहज रूप से कीजिये। आप उसे अपनी स्वाभाविक गति से भी धीरे कीजिए। इस सहजता से जो आंतरिक विकास होता है, जिस एकाग्रता की प्राप्ति होती है वह कार्य को शुद्धता से करने की क्षमता प्रदान करती है। कोई विषय मुश्किल लगता है तो उस विषय को बिल्कुल प्रारंभ से दोबारा शुरू कर दें। जो आता है उसे भी दोबारा ध्यान से करलें। जहां अटक रहे हैं दो तीन बार अभ्यास करें, लेकिन सहजता से। सहज रहें कोई समस्या नहीं होगी। असहजता के कारण ही समस्याऐं उत्पन्न होती हैं। जीवन को सौंदर्य से आप्लावित करना है, उसे कला पूर्ण बनाना है।सहजता का दामन थामना ही होगा औऱ वो भी बाहरी नहीं, आंतरिक सहजता के। असली सौंदर्य सहजता में ही है। कली से फूल बनने में सहजता है। तभी फूल में असीम सौंदर्य है। जिसे हम तहजीब कहते हैं वह भी जीवन की सहजता ही है। जहाँ सहजता नहीं वहाँ कैसी तहजीब, कैसा शिष्टाचार? इसीलिए किसी ने कहा है, सच तो तहजीब हीअखलाक की जान होती है। फ़ऊल खिलते हैं तो आवाज कहाँ होती है।
धन्यवाद
संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंघल।

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