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गुरु के समान नहीं, दाता रे जग में-Kabir ke shabd-guru ke samaan nahin, daataa re jag men।।

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Kabir Ke Shabd 

कबीर के शब्द
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गुरु के समान नहीं, दाता रे जग में।।
वस्तु अगोचर दी सदगुरु ने, भली बताई बाता।
काम क्रोध कैद कर डारे, लोभग घाली नाथा।।

कल करे सो आज ही कर ले, फेर मिले नहीं साथा।
चौरासी में जाय पड़ोगे, भुगतोगे दिन राता।।

शब्द पुकार पुकार कहत हैं, करले सन्तन साथा।
भजन बन्दगी कर साहिब की, काल नवावैं माथा।

कह कबीर सुनो रे धर्मन, मानो वचन हमारा।
पर्दा खोल मिलो सदगुरु से, पाओ मोक्ष द्वारा।।

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