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गुरु मेरा वैद्य है जी, रोगी हूं भारा-Kabir Ke Shabd-guru meraa vaidy hai ji, rogi hun bhaaraa,

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Kabir Ke Shabd 
कबीर के शब्द
गुरु मेरा वैद्य है जी, रोगी हूं भारा,
इबकै उभारो मेरा सिरजन हारा होजी।।

रामनाम की अवधू बूटी बोई जी।
जिसने खाई उसकी वेदन मिट जाई।।

कलह कल्पना ने अवधू सब जग घेरा जी,
क्षण में लूटेगा तेरा बालू कैसा डेरा जी।।

बाजीगर ने साधो रोपया यो फन्दा जी।
समझ चला कोए साहिब का बन्दा जी।।

प्रेम भट्ठी का अवधू जिने मद पीया जी
बहावड चौरासी में फेर ना जिया जी।।

नाथ गुलाब गुरु पूरा पाया जी।
तोड़ भर्म गढ़ हरि दरसाया जी।।

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