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जाग री-३, मेरी सूरत सुहागिन जाग री-Kabir Ke Shabd-jaag ri-3, meri surat suhaagin jaag ri।

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Kabir Ke Shabd 

कबीर के शब्द
जाग री-३, मेरी सूरत सुहागिन जाग री।
क्या सोवे तू मोह निहद में, उठ भजन में लाग री।

अनहद शब्द सुनो चित्त लाके, उठत मधुर धुन राग री।
चरण शीश धर विनती करियो, पावेगी अटल सुहाग री।

कह कबीर सुनो म्हारी सुरतां, जगत पीठ दे भाग री।।

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