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कद्रदान मानस के आगे सारी कद्र छँटे सै-Kabir Ke Shabd-kadrdaan maanas ke aage saari kadr chhnte sai।

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SANT KABIR (Inspirational Biographies for Children) (Hindi Edition ...
Kabir Ke Shabd 
कबीर के शब्द
कद्रदान मानस के आगे सारी कद्र छँटे सै।
मूर्ख मूढ़ अनाड़ी ने कुछ भी ना खबर पटे से।।

एक नगरी में लोभी लालां एक बनिया रहा करे था।
मुंजी इतना सर्दी गर्मी तन पे सहा करे था
दमड़ी कारण चमड़ी देदे, न्यू विपदा सहा करे था।
किस विध ते धनवान बनूँ न्यू मन मे कहा करे था।
हाय-२ धनवान बनूँ, मुंजी दिन रात रटे से।।

एक रोज उस बनिये धोरे एक महात्मा आया।
न्यू बोला कर जमा अमानत, पारस पथरी लाया।
सत्संग करने जाऊंगा मेरी निर्मल होजा काया।
छः महीने में वापस आऊं वादा ठीक बताया।
सत्संग के करने तैं लाला मन की मैल कटै सै।।

शर्त करी मंजूर सेठ ने, पारस पथरी रखली।
आवन आली मिति बूझ के, बीच बही के लिखली।
तब गद्दी के दइ सिरहाने, तकिए नीचे ढकली।
इस तैं में धनवान बनूँगा, मन मे पक्की तकली।
बुझन चाला भाव लोहे का, घट रहा सै के बढ़े से।।

एक बै बुझा दो बै बुझा, सो सो बै बुझवाया।
तेजी खा गया भाव लोहे का, दिन-२ हुआ सवाया।
लोभी लाला लोभ के कारण, नहीं खरीदने पाया।
छः महीने गए बीत चाल के, वही महात्मा आया।
न्यू बोला दे मेरी अमानत, इब क्यों दूर हटे से।।

साधु रूप विधाता ने, तने दी मानस की काया।
पारस रूपी जिंदगानी, तूँ करार कर के लाया।
सोना रूपी हरि की भक्ति, कदे ना करने पाया।
लोभी लाला जीव को समझो, वृथा जन्म गंवाया।
कह मनोहरलाल भजन तैं, आवागमन मिटे से।।

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