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तेरी दुर्मति कौन मिटावै रे, मन तनै गुरु भक्ति नहीं भावै - Kabir Ke Shabd-teri durmati kaun mitaavai re, man tanai guru bhakti nahin bhaavai।

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Kabir Ke Shabd 
कबीर के शब्द

तेरी दुर्मति कौन मिटावै रे, मन तनै गुरु भक्ति नहीं भावै।
कागा पकड़ पिटारे में रोक्या, चारों वेद पढावै।
कितने ही मनखा दाख चुगा लो, काग कर्क पे जावै।।

खर पकड़ पोल बिच बांधा, हरी हरी घास चरावै।
शाल दुशाले कितने उढा ले, फेर भी कुरड़ी पे जावै।।

सर्प पकड़ पिटारे में रोक्या,नाना बिन बजावै।
कितने दूध पतासे प्या लो, डंक मार दस जावै।
गुरु के वचनां चेला चालै, माँ के वचनां बेटी।
कह कबीर सुनो भइ साधो, इस विधि दुरमत मेटी।।

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