loading...

अगर आप को भी अपने भीतर कोई कमी महसूस होती है तो यह कहानी आप के लिए है। -mahatma gautam budh - story in hindi

Share:
महात्मा बुद्ध - mahatma gautam budh - story in hindi
अगर आप को भी अपने भीतर कोई कमी महसूस होती है तो यह कहानी आप के लिए है।

जो नहीं जानता उसी की सम्भावना होती है कि वह सब कुछ जान सके। वरना जो पहले से ही जानता है वह अब ओर क्या जानेगा?। आत्मज्ञान की प्राप्ति से पहले गौतम बुद्ध एक अनजान की भांति लोगों से प्रश्न पूछते थे। जैसे कि उसे कुछ पता ही न हो। वो अपने आप को हर चीज से अंजान मानते थे। इसलिए उन्होंने हर चीज को जाना। एक छोटी सी कहानी एक ऐसे व्यक्ति की जो अपने समय के एक महान व्यक्ति थे।
एक बार एक गुरु अपने कुछ शिष्यों को कुछ समझा रहे थे। उन सभी शिष्यों में एक शिष्य बहुत मुर्ख था। आप ये कह सकते हैं कि वह बड़ा साधारण था। वह एक समय में सिर्फ एक ही काम कर सकता था। गुरु ये मानते थे कि उस शिष्य का कोई उद्धार नहीं कर सकता था परन्तु क्योंकि वह गुरु का शिष्य था। इसलिए गुरु जी उसका दिल नहीं दुखाना चाहते थे। परन्तु गुरु और उनके सभी शिष्य यह जानते थे कि वह बहुत ज्यादा नासमझ है
एक बार गुरु स्नान करने के लिये नदी किनारे जा रहे होते हैं। तो वे सोच रहे थे कि क्यो न अपने उस मुर्ख शिष्य को अपने साथ लेकर चला जाए। क्योंकि वह और तो किसी काम का था ही नहीं। उसे जो भी कहा जाता था, उसे वह ठीक से समझ ही नहीं पाता था। हर काम उल्टा करता था। इसलिए गुरु भी उससे तंग आ चुके थे।
वह व्यक्ति इतना साधारण था कि यदि उससे एक साथ दो काम के लिए कह दिया जाए तो वह एक भी ठीक से नहीं कर पाता था। इसलिए गुरु अपने साथ नदी किनारे ले जाते हैं। और स्नान करने के लिए जाने लगते हैं। जाते जाते गुरु अपने कपड़ों को उतार कर उस शिष्य को दे देते हैं और उस शिष्य से कहते हैं कि तुम ये कपड़े नीचे मत रखना। क्योंकि जमीन गीली है। और आज मुझे किसी काम से दूसरी जगह जाना है जो कि बहुत जरूरी है। तुम ध्यान रखना, इन कपड़ों को नीचे मत रखना। वरना इन पर मिट्टी लग जाएगी और यह गन्दे हो जाएंगे। वह शिष्य गुरु की बात सुनता है और गुरु से कहता हैं। ठीक है, मैं इन्हें अपने हाथों में ही रखूंगा। गुरु बार बार उससे कहते हैं। क्योंकि गुरु जानते हैं कि यह हर काम उल्टा करता है।
गुरु नदी में स्नान करने के लिएचले जाते हैं। स्नान करने के बाद गुरु नदी से बाहर आ रहे होते हैं। शिष्य गुरु को देखता है और सोचता है कि शायद गुरु जी मुझे बुला रहे हैं। वह कपड़ों को नीचे रखता है और गुरु की ओर दौड़ पड़ता है। गुरु के पास जाता है और कहता है। गुरुदेव आपने मुझे बुलाया? उसके गुरु उससे कहते हैं मूर्ख मैं तुम्हें नहीं बुला रहा हूँ। और मैंने मना किया था कि तुम्हें वह कपड़े नीचे नहीं रखने हैं। परंतु तुम उन कपड़ों को मिट्टी में रख आए। देखो अब वे गन्दे हो गए होंगे? गुरु कपड़ों के पास जाते हैं और देखते हैं। कपड़े सच में गन्दे हो जाते हैं। गुरु उन्हें उठाते हैं और गन्दे कपड़े ही पहन लेते हैं। और क्रोधित हो उस शिष्य से कहते हैं? तुम्हारे वश का कुछ नहीं है। तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। यह बात मैं पहले से ही जानता था। परन्तु तुमने आज यह बात साबित कर ही दी है। तुम मूर्ख हो। तुम सिर्फ एक काम कर सकते हो। तुम अपनी मूर्खता हर जगह दिखा सकते हो। इसके अलावा तुम कुछ नहीं कर सकते। गुरु क्रोधित होते हैं। गुरु का शिष्य अगली आज्ञा के लिए उनके पास खड़ा होता है। वह गुर से कहता है। गुरु जी मुझे क्षमा कीजिये।मुझे अगला कार्य दीजिए, मैं उसे पूरा करूँगा। यह सुनकर गुरु को औऱ क्रोध आ जाता है। पास ही में एक बडी चट्टान होती है और उसके पास छोटे छोटे पत्थर पड़े होते हैं। वे गुरु एक पत्थर उठाते हैं। वह पत्थर एक चोक की तरह होता है। जिससे कुछ भी लिखा जा सके। वह पत्थर उठा कर गुरु अपने शिष्य को दे देते हैं। और कहते हैं तुम्हें कुछ नहीं करना। बस इस पत्थर से इस चट्टान के ऊपर बार बार राम राम लिखना है। बार बार लिखना है लिखे हुए पर बार बार इस पत्थर को चलाकर लिखना है। और गुरु इतना कहकर वहां से चले जाते हैं। उनका शिष्य यह काम करना शुरू कर देता है। गुरु को कहीं जाना था वहां जाते हैं और शाम तक अपने आश्रम लौट आते हैं। अपने आश्रम लौटते ही उन्हें एक ही बात ध्यान आती है कि आज मैने बहुत ज्यादा क्रोध कर दिया। इसलिये गुरु अपने शिष्यों से पूछते हैं कि वैमन्या कहाँ है? उस शिष्य का नाम वैमन्या होता है। सभी शिष्य गुरु से कहते हैं गुरुदेव वह तो सुबह सुबह आप के साथ नदी किनारे गया था। और तब से नहीं लौटा है गुरु को याद आता है कि मैंने उसे राम लिखने के लिए कहा था। गुरु दौड़ कर नदी किनारे पहुंचते हैं। और चट्टान की ओर देखते हैं। वह शिष्य वैमन्या अभी भी उस चट्टान पर राम राम लिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके हाथ का जो पत्थर था वह पूरा खत्म हो चुका है। और साथ ही साथ उसके हाथ की दो उंगलियां और अँगूठा भी लगभग पूरा घिस चुका है। पत्थर खून से लथपथ होता है। और यह देखकर गुरु उस शिष्य को उठा कर अपने गले से लगा लेते हैं
मुझे नहीं पता कि आप इस कहानी को कैसे देखते हैं, औऱ इससे क्या सीखते हैं। मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि जो मूर्ख है जो बुद्धिहीन है। उसी की संभावना है कि वह सबकुछ जान सके। वह सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान ही सके। वरना एक बुद्धिमान को, एक जानने वाले को भला कौन क्या सिखा सका है,। भला कौन क्या बता सका है। जो हर किसी की नजर में मूर्ख था। खुद अपने गुरू की नजर में भी मूर्ख था। उस जैसा दृढ संकल्पी, उस जैसा आज्ञाकारी औऱ कोई न था। वह आगे चलकर आत्मज्ञान को प्राप्त हुआ करता है। मैं आपसे कहना चाहता हूँ, जीवन में हो सकता है आप की कमजोरियां हों? जिन्हें लोग आपको बार बार बता कर आपको नीचे गिराने का प्रयास करते हैं। मैं आपसे कहता हूँ , चाहें वे कमजोरियां कितनी भी हों। कितनी भी बड़ी क्यों न हों। परन्तु एक काबिलियत, एक ऐसी खूबी आपके भीतर है। जो हर कमजोरी पर भारी है। जो हर कमी पर भारी है । इसलिए निराश हुए बगैर अपने पूरे जीवन को आनन्द के साथ जिएं।
आशा करता हूँ कि यह कहानी आपके जीवन के अंदर एक बड़ा बदलाव ले कर आएगी। और अपने जीवन को काटने की जगह जीना शुरू कर देंगे।
धन्यवाद।
संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंगल।

कोई टिप्पणी नहीं