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नाना रूप धर मोहवै - nana roop dhar mohve - Kabir ke shabd

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Kabir Ke Shabd 


कबीर के शब्द


नाना रूप धर मोहवै, या माया ठगनी।
जो माया के होते वश में, उनका नाश करे दिन दस में।
या जड़ा मूल तैं खोवै।।

भक्तनि हो भक्तां ने पकड़े, चेली हो संता ने जकड़े।
कदे हंस दे कदे रोवै।।

माया कहिये तेग दुधारी, एक पैसा दूजी परनारी।
किसी के संग जा सोवै।।

किशनदास कह दूधाधारी, हरिदास खोटी परनारी।
सन्तों के संग नहीं सोवै।।

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