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मौन - Silence

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मौन
मौन में भी प्रयोग ढूढ़ना यह कार्य अज्ञेय के ही द्वारा सम्भव है।अपनी विस्तारवादी प्रयोगशील मानसिकता में मौन में पसरे अभिव्यक्ति के सूत्र की गवेषणा वे ही कर सकते हैं।रमेश ऋषिकल्प ने उनकी मौन साधना पर अपने विचार कुछ इस प्रकार व्यक्त किए हैं``अज्ञेय इस बात से बखूबी परिचित हैं कि मौन काल-चिन्तन का भी एक प्रमुख पक्ष है, क्योंकि काल-चिन्तन भी अमूर्त रहता है और हमें यह ध्यान रखना होगा कि मौन जैसी अमूर्त सत्ता अमूर्त होते हुए भी एक सत्ता है।यह सत्ता अमूर्त होते हुए भी प्रभावित करती है, जिसमें सभी रूप और शब्द पिघल जाते हैं।लेकिन अज्ञेय मौन और शून्य जैसे अमूर्त तत्वों के साथ प्रयोग करते हैं।''
मौन काल चिन्तन का एक प्रमुख पक्ष है।यह सत्य है इस मौन की घाटी में समाधि लगाकर कई वैचारिक तत्वों को पाया जा सकता है हृदय में स्थित मौन घाटी में आत्म चिन्तन के गुण तत्व बिखरे पड़े हैं लेखक इन तत्वों को एकत्र करके ही भाव और रहस्य की ऐसी संरचना करता है जिसको उसकी कृति का अंलकार घोषित किया जा सकता है।

अमूर्त या सूक्ष्म की चेतना आज के व्यावसायिक केन्द्रित युग में भी हमें संवेदना के बीज प्रदान करती है इस कारण अज्ञेय ने लिखा है-
``पर सबसे अधिक मैं
वन के सन्नाटे के साथ मौन हूँ
क्योंकि वही मुझे बतलाता है
कि मैं कौन हूँ
जोड़ता है मुझको विराट् से
जो मौन अपरिवर्त है
अपौरुषेय है
जो सबको समोता है।''

सत्य ही तो है कि मौन बिना अभिव्यक्ति के सर्वाधिक अभिव्यक्ति करता है वह तो सत्य चिरंतन शान्ति का दूत है और भावों में श्रेष्ठ है।यह मौन हमें प्रकृति के निकट ले जाता है, ईश की सत्ता का साक्षात्कार कराता है प्रयोगवादी कविता की आलोचना करने वाले अज्ञेय को बौद्धिक व जटिल कविता बताने वाले कदाचित् उनकी मौन अभिव्यक्ति का विस्मरण कर गये हैं। मौन को सतही दृष्टिकोण से कभी
नहीं देखा अपितु उसकी गहनतम अभिव्यक्ति क्षमता को पहचान कर अंगीकार किया कवि की दृष्टि सेहम उनके मौनकारक रहस्यवाद का अन्वेषण कर सकते हैं क्योंकि मौन में रहस्य निहित है जो लौकिक भी है परालौकिक भी, सत्य भी है मिथ्या भी, चिन्तन भी है आभासित भी, हार्दिक भी है बौद्धिक भी मोहित भी है विमोहित भी।

रहस्य का एक प्रकार मौन है जो अनाभिव्यक्त अनभिज्ञ अज्ञेय हो कर भी ज्ञेयता से परिपूर्ण है।रहस्य किसे कहते हैं ? जो छिपा है, परोक्ष है, सत्य के पार है जिसे जानने के लिए हम लालायित रहते हैं , वही रहस्य है।यह रहस्य ही हमें तत्व अन्वेषी बनाता है और जिज्ञासु भी इसी रहस्यवाद का एक रूप है मौन।``अज्ञेय महसूस करते हैं कि कहीं कोई अदृश्य क्रम है जिसके तहत जीर्ण होना भी है और नये प्राण पाना भी है।'' रमेश ऋषिकल्प के ये विचार सहज ही अज्ञेय की पंक्तियों का स्मरण करा देते हैं-

``मैं सोते के साथ बहता हूँ
पक्षी के साथ गाता हूँ
वृक्षों की कोपलों के साथ
थरथराता हूँ
और उसी अदृश्य क्रम में
भीतर ही भीतर
नये प्राण पाता हूँ।''

मौन ऐसा ही सत्य है।अज्ञेय कवि के साथ साथ चिंतक भी रहे हैं उनका विश्वास था कि ``हिन्दी का यह परम्परागत दायित्व है कि वह जिस अर्थ में आधुनिक थी , उसी अर्थ में आधुनिक बनी रहे।'' त्रिशंकु में अज्ञेय ने `एक आलोचक राष्ट्र के निर्माण' का सपना यों ही नहीं देखा इस मौन ने जागृत किया था।इतना ही नहीं अज्ञेय की लम्बी कविता `असाध्य वीणा' में वीणा का मौन साधना भी प्रतीक रूप में बहुत कुछ वर्णित और व्याख्यायित कर जाती है।एक वीणा जिसे राजा के दरबार के बड़े बड़े कलावंत न बजा पाये परन्तु प्रियम्वद बिना दर्प के उस मौन के प्रति अपने आभार को जोड़कर वीणा के स्वर साधने में सफल हुआ।उससे पूर्व राजा के कलावंत इस वीणा को इस कारण नहीं साध पाये क्योंकि वे दर्प के कारण मौन स्वरों को समझ न सके।मौन शक्तिशाली सामर्थ्य युक्त दिव्य तेज है जो व्यक्ति को भावोत्प्रेरित कर देता है।

``कलावंत हूँ नहीं, शिष्य साधक हूँ-
जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी ।
वज्रकीर्ति !
प्राचीन किरीटी तरु !
अभिमंत्रित वीणा!''

देरखने वालों को लगता कि प्रियम्वद सो रहा है परन्तु वास्तव में वह मौन स्वर साधना कर रहा था , ऐसी साधना जो रहस्य और हठयोग के मिश्रित तात्विक अभिव्यंजन से बनी थी।अज्ञेय मौन साधना का यह स्वर प्रियम्वद द्वारा व्यक्त करते हैं -

``पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
मौन प्रियम्वद साध रहा था वीणा
नहीं स्वयं अपने को शोध रहा था''

दंभ से मुक्ति भी मौन द्वारा सम्भव है , नीरवता या सन्नाटा या खामोशी अथवा मौन की पर्याय अलग अलग नहीं अपितु एक ही है और वह है ब्रह्मा का मौन जो अखण्ड है अनश्वर है सत्य है नित्य है निरन्तर है-
``अवतरित हुआ संगीत
स्वयंभू
जिसमें सोता है अखण्ड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय।''

मौन ब्रह्म का सत्य है अखण्ड है शून्य मे व्याप्त वह ध्वनि है हृदय के अधीन स्वरों को झन्कृत कर देती है।

``श्रेय नहीं कुछ मेरा
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में-
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था''

अज्ञेय की ``असाध्य वीणा'' रहस्यवाद के अनुपम उदाहरण के साथ ही मौन की अभिव्यक्ति का कारण भी सिद्ध होती हैं ,हमारे जीवन में बहुत से ऐसे पड़ाव आते हैं जो जीवन को परिभाषित कर देते हैं मौन की अभिव्यक्ति का हर रूप उन्होंने दर्शाया है क्योंकि वे प्रयोगवादी कवि रहे हैं जिसके कारण सत्य का दर्शन प्रायोगिक हुआ है पर अज्ञेय के लिए यही कविता का सर्वोत्तम पड़ाव रहा है।वे मानते हैं कि मौन में ही उस विराट का स्वर गूँजता है।अज्ञेय अनुभूति करते हैं
``एक मौन ही है जो अब भी नई कहानी कह सकता है इसी एक घट में नवयुग की गंगा का जल रह जाता है, संसृतियों की संस्कृतियों की तोड़ सभ्यता की चट्टानें...नई व्यजंना का सोता बस इसी राह से बह सकता है।''

संक्षेपत: मौन अज्ञेय के लिए अभिव्यक्ति का वह माध्यम है जो मुखरित भी है उनके लिए वह ईश्वरीय संकेत,गान और मानव मात्र की सप्राणता है।स्नेहमयी चौधरी कहते हैं-
``अगर कोई कहे कि मौन के महात्म्य का इतना मुखर चित्रण या वर्णन अज्ञेय का एक और अंतर्विरोध है तो मैं निवेदन करना चाहूँगी कि यहाँ भी वे रचना से बद्ध मूल एक समस्या को अपने लिए सुलझाने के साथ साथ हमारे लिए भी सुलझा रहे हैं।

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