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मौन-साधना - Silence

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मौन-साधना

परमात्मा की खोज में भटकते साधक अक्सर मौन साधना में उतरते हैं। मौन का अर्थ प्राय: वाणी को मूक कर लेना होता है। अत्यधिक आवश्यकता होने पर हल्के इशारे को उचित समझा जाता है। कारण स्पष्ट है। बोलने से हमारे शरीर की ऊर्जा का एक बड़ा भाग नष्ट हो जाता है। मौन व्रत का आशय इस ऊर्जा को बचाना होता है, जिससे ध्यान द्वारा उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर सहस्त्रार चक्र की ओर यात्रा की जा सके। मौन का ये उपयोग नि:संदेह सार्थक है। शरीर की ऊर्जा का दिशा परिवर्तन कर उसे ऊर्ध्वगामी बनाया जा सकता है, किंतु क्या मौन का मात्र इतना ही उपयोग है? नहीं, मौन का इससे भी अधिक गहरा उपयोग साक्षी भाव साधना के लिए किया जा सकता है।

वास्तव में बाहर से हम अपनी वाणी को मूक भले ही कर लें, किंतु हमारे भीतर विचारों का क्रम चलता रहता है। एकांत व मूक होने का प्रयास करते ही एक प्रकार से विचारों का क्रम तेज हो जाता है और जब भीतर विचार सरक रहे हों, तो बाहर से ओढ़ा गया मौन सार्थक नहीं होगा। कारण यह कि हमारा मौन सार्थक तभी हो सकता है, जब हम बाहर के साथ भीतर भी मौन हो जाएं। बाहर हम वाणी को भले ही मौन कर लें, किंतु विचारों पर काबू पाना इतना आसान नहीं। कारण यह कि मन मनुष्य से बेहद शक्तिशाली होता है और तब तक विचार पूर्णतया शांत न हों और निर्विचार की स्थिति उत्पन्न न हो, तब तक मौन व्रत के संपन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। निर्विचार की स्थिति तक पहुंचने के लिए हमें साक्षी भाव को जाग्रत करके उसे गहराते जाना होगा। यूं जैसे हम नदी के किनारे खड़े हों और नदी किलोल करते हुए, वही चली जा रही हो। बगैर किसी पक्ष में कोई फैसला लिए हमें चुपचाप विचारों को देखते रहना होगा। वह भी एकदम सरल भाव से। साक्षी भाव जैसे-जैसे गहरा होगा। विचारों के मध्य का अंतराल बढ़ेगा और विचार भी शांत होने लगेंगे। अगर हम पूर्णतया निर्विचार हो गए, तो समङों कि हमने वह उर्वर भूमि तैयार कर ली, जिसमें परमात्मा के अंश का बीज जरूर फूटेगा। बस जरूरत होगी निर्विचार की स्थिति को और भी स्वच्छ करते चले जाने की। पात्रता हासिल होते परमात्मा को समाधि के रूप में अवतरित होना ही होगा।

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