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सुमिरन का महत्व - Importance of Sumiran

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:------ सुमिरन का महत्व ------:
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सुमिरन का महत्व

साधन भजन के अच्छा बनने की कुंजी सुमिरन है |

आज के इस घोर कष्ट के युग में हम सब जो परमपूज्य स्वामी जी महाराज के प्रेमी हैं तथा नामदान प्राप्त कर लिए हैं उनमे जैसा प्रेम तथा उत्साह और साधन भजन में प्रारम्भ में था वैसा अब न रहा | अक्सर स्वामीजी महाराज यह सुनाते हैं की :--
भक्ति भाव भादो नदी सभी चली घहराय |
सरिता सोई सराहिय जो जेठ मॉस ठहराय |

तो साधन भजन के अच्छा बनने की कुंजी सुमिरन है |

लोग सुमिरन ठीक से नहीं करते | जो पांचो नाम का भेद दिया गया है उसका सुमिरन करते समय लोग माला फेरते हैं परन्तु मन संसार में रमता रहता है | दो -चार-दस दाने तो नाम के सुमिरन में निकले फिर १०-१५ दाने और निकल गये पर मन कहाँ चला गया पता नहीं | यह मन तो संसार के कर्मों के चिंतन में लग गया |

कुछ लोग सुमिरन करते समय तरह-तरह की गुनावनों में लगे रहते हैं | कुछ लोग झपकी लेते रहते हैं | कुछ को जब खयाल आता है तो यह भी नहीं याद रहता किं सुमिरन किस नाम का कर रहे थे | इस प्रकार के सुमिरन से तो कोई लाभ नहीं हो सकता |

और जो सुमिरन नहीं ठीक कर सकता वह ध्यान नहीं कर सकेगा | और जो सुमिरन तथा ध्यान नहीं कर सकते वह भजन कैसे करेंगे ? सुमिरन ही परमार्थ की कुंजी है | बिना इसकी सहायता से कोई उस ओर नहीं चल सकता सभी महात्माओं ने इसकी प्रधानता रक्खी है | सुमिरन ही से हर स्थान के धनी प्रसन्न होकर अपने द्वार खोल देते हैं |

हर महात्मा ने यद्यपि वे पूर्ण गति को प्राप्त थे तथा पुरे संत थे , बराबर सुमिरन किया है | सुमिरन अंतिम स्वांस तक करना पड़ेगा |
एक बार मैंने(गुरुमहाराज ने) अपने स्वामीजी महाराज से पूछा की स्वामीजी आप क्यों सुमिरन करते हैं ? आपको इसकी क्या जरुरत है ? कहने लगे " बेटा सुमिरन तो स्थान के धनियों का होता है | उनके इस काल देश में जब तक यह शरीर है तब तक उनका सुमिरन करने से वे प्रसन्न रहते हैं | वेसे तो पूर्ण पुरुष हर प्रकार से सर्व समर्थ होते हैं | परन्तु फिर भी सुमिरन कभी नहीं छोड़ते अब यह तो वे जाने की उसका फल वे किसको देते हैं | "
pranav pankaj - 9 de março de 2011 - denunciar abuso
तो सुमिरन बिलकुल ठीक से करो | यही परमार्थ प्राप्ति की कुंजी है | सुमिरन करते समय जिस धनी का नाम सुमिरन करते हो उसी के रूप का ध्यान हो | मन को वहीँ पर लगाये रहो | जब रूप का चिंतन होगा तो उस रूप से प्यार होगा | रूप से प्यार होगा तो हर स्थान के धनी के रूप में ही मध्य में गुरु का स्वरुप विद्यमान है | स्वरुप का ध्यान करते हुये सुमिरन करने पर वह प्रकट हो जाता है | उस रूप से खूब प्यार होगा तब ध्यान बनेगा | ध्यान के बनने पर भजन भी बनेगा | जो लोग सुमिरन ठीक से नहीं करते उनका साधन बन नहीं सकता | सुमिरन बिना नागा किए हमेशा करना चाहिए |

सुमिरन का समय पूर्ण निश्चित होना चाहिए | ध्यान और भजन तो चाहें जब भी कर सकते हैं परन्तु सुमिरन का एक निश्चित समय होना चाहिए | उसी समय सुमिरन ठीक से चित्त को स्थिर करके मन लगा कर बड़े प्रेम के साथ करने चाहिए | जिस धनी का सुमिरन सुमिर रहें हों उसी के रूप का ध्यान होना चाहिए | उसी से प्यार होना चाहिए |

स्थान के धनी जब तक प्रसन्न नहीं होंगे वे आगे का रास्ता नहीं देंगे | इसलिए जीव जब धनी के रूप का सुमिरन बड़े प्यार से करते हैं तो वह धनी प्रसन्न होकर अपनी ध्वनि देता है | उसकी ध्वनि के सहारे तब जीव आगे चलता है | धनी प्रसन्न होकर जब अपना मुख खोल देता है तो उसे आगे जाने का मार्ग मिलता है |

गुरु का स्वरूप हर स्थान पर है | हर धनी के रूप के भीतर गुरु का स्वरुप मौजूद है बड़े प्यार से उसे प्रकट कर लेना चाहिए | जब गुरु अंतर में प्रकट हो जाते हैं तो वे जीव को अपने संग-संग आगे ले जाते हैं |

गुरु के ही स्वरूप के सहारे आगे की रसाई होती है और अंतर के सूक्ष्म काल माया अंग दूर किये जाते हैं |

तो तुम लोगों ने सुमिरन के पहले पाठ को ही भुला दिया जिससे अब न ध्यान बनता है न भजन और तब संसार की तरंगों में सब बहने लगते हैं | तो अब फिर से पहला पाठ याद करो | ठीक से बड़े प्यार के साथ चित्त को लगाकर मन को स्थिर करके सुमिरन करो | जो २०-२५ मिनट या आधा घंटा लगे एक निश्चित्त समय पर रूप का चिन्तन करते हुये सुमिरन करो | तब ध्यान और भजन में भी तरक्की होगी

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