मन मूर्खा, गुरु बिन जागा कौन।।344।।ok..

मन मूर्खा गुरु बिन जागा कौन सी घाटी।।
सौदा करै तो यहां ही करले, आगै भिचवाँ घाटीरे।
आगै के तनै रस्ता मिलेगा, ना बनिया की हाटी रे।।
हिंदू मुश्लिम दो दीन बना दिये, बीच भर्म की टाटी रे।
काल बली का लगे तमाचा, पड़ी रहेगी माटी रे।।
बाजीगर का बने बांदरा, टूक मांग के खासी रे।।
तन तेरे में लगें कामची, गल में गिरैं फांसी  रे।।
उत्तम स्थान बहुत से पूजे, तोड़ चढाई बाती रे।।
बैल बने कंगाल का रे, कड़ में मारें लाठीरे।।
कह कबीर सुनो भई साधो, ये समझन की बाती रे।
यमराजा की फ़ौज पड़ी है, त्रिवेणी के घाटी रे।।

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