संत की परिभाषा
गुरबाणी के अनुसार संत कौन है ?
परन्तु आजकल संत शब्द सुनकर हमारी छवि में सफेद चोला पहने, बड़ा डेरा बनाए, लंबी गाडी में घूमते, ऊँचे स्थान पर खाली बैठे और बढ़िया सा नाम जिसमे फलाने वाले और फलां नम्बर की डिग्री का जिक्र होता है, सहज ही उभर कर आती है । आज शायद पंजाब में ऐसा कोई गाँव या शहर बचा हो जहां ऐसे सन्तों, महापुरषों, ब्रह्मज्ञानियों का डेरा ना हो । जैसे जैसे इनकी संख्या बड़ रही है, वैसे वैसे नशा, अपराध, झगड़े, पतितपना भी बड़ रहा है । इन सन्तों का योगदान कुछ भी नहीं है, सिवाय कर्मकांडों को बढ़ावा देने से ।
गुरु जी की शिक्षा के अनुसार मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है । केवल और केवल एक परमात्मा ही है जो हमारी कामनाओं की पूर्ति कर सकता है । जो प्रभु को याद रखता है, जिसने उसके गुणों को पहचान लिया है, वो "संत" है ।
भगत फरीद जी का फरमान है :-
फरीदा काले मैडे कपड़े, काला मेडा वैस ।।
गुनही भरिआ मैं फिरा, लोकु कहै दरवेसु ।।
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