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तत्त्व ज्ञान ---तुम क्या हो - Element knowledge --- what are you?

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तत्त्व ज्ञान ---तुम क्या हो - Element knowledge --- what are you?

तुम क्या हो तुम कौन हो,क्या है घर संसार।
क्या माया क्या ब्रह्म है,आओ करें विचार।
तुम क्या हो तुम तन नहीं,तन बदला सो बार।
हर तन का इक नाम था,था इक घर परिवार।।

तन को कैसे मान लें, प्राणी की पहचान।
प्राणी तो कोई और है,तन उसका परिधान।
अंदर बैठे पंछी की,हालत से अंजान।
पिंजरे को धो मांज कर, प्रमुदित हैं श्रीमान।।

खेलोगे कब तक यूँही,जन्म मरण का खेल।
कब चाहोगे अंश का,परम् तत्त्व से मेल।
कब तक आवागमन में,फंसे रहोगे यार।
जागो,चेतो,कुछ करो,भँव से निकलो पार।।

ये क्या जन्मे मर गए,ले कर्मों की मैल।
आखिर तुम इंसान हो,नहीं कोल्हू के बैल।
दिव्य तत्त्व को छोड़ कर,नश्वर से अनुराग।
प्रज्ञा पति मानव तेरा,कैसा है दुर्भाग्य।।

कितने दिन ये जिंदगी,रे जग कितनी देर।
क्या जाने किस मोड़ पर,यम सेना ले घेर।
जग सुंदर आनंदमय, लेकिन कितनी बार।
जन्म-२ के भोग से,अंत हुआ निस्सार।।

यहाँ चाहिये या वहां,सोचो तुम सम्मान।
सहजासन मिलना कठिन,सिंघासन आसान।
कौन युक्ति बन्धन कटे,कौन युक्ति हो मोक्ष।
कौन युक्ति प्रत्यक्ष हो,वह जो रहे परोक्ष।।

साधन भी शुभ चाहिये,साध्य अगर है ठीक।
कौन बनाय किस तरह,टेढ़ी मेढ़ी लीक।
किस रस्ते से आगमन,किस रस्ते प्रस्थान।
फिर भी आवागमन से,डरे नहीं इंसान।

आए मुट्ठी बन्द ले,चल दिये हाथ पसार।
क्या था वह जो लूट गया,देखो सोच विचार।
बैठ कभी एकांत में,करो स्वयं से प्रश्न।
अब तक आत्मोद्धार का,किया कौन सा यत्न।।

बिन जागे कैसे मिले,तुझ को मुक्ति प्रभात।
जितनी लंबी जिंदगी,उतनी लम्बी रात।
दिव्य तत्त्व भीतर बसे,कर उस की पहचान।
बाहर माया लोक है,यहां कहाँ भगवान।।

मैं अनित्य हरि नित्य है,मैं दुःख वह आल्हाद।
मूक और वाचाल में,कैसे हो संवाद।
बेहोंशी से जग मिले,मिले होंश से ज्ञान।
ये चुनाव तुम खुद करो,माया या भगवान।।

फ़िक्र अनागत की करे,बीते का गम खाये
कल और कल के बीच में वर्तमान पीस जाये।
बिन अनुभव किस काम का,कोरा पुस्तक ज्ञान।
काम ना दे तलवार का,कैसी भी हो म्यान।।

तन के भीतर आत्मा,अजर अनश्वर तत्त्व।
पंच भूत तन के लिए,नहीं सम्भव अमरत्व।
जब तक आत्मा के लिए,तन है कारागार।
तब तक मन सुनता नहीं,इस की करुण पुकार।।

वही लोग वही आप हम,वही सृस्टि का साज।
माया के वश हो गए,परिचय के मोहताज।
बाहर की हर वस्तु है,माया तम का ग्रास।
भीतर सूरज चन्द्रमा,प्रति पल करे उजास।।

ज्यूँ लोभी भंवरा हुआ,पंकज दल में बंद।
त्यों प्राणी संसार के,ग्रसित मोह तम फन्द।
चार ग्रन्थ क्या पढ़ लिए,बन गए सन्त महंत।
आधे अधूरे ज्ञान का,अभ्मन्यु सा अंत।।

अन्तस् में डूबे बिना,समझ पड़े क्या मौन।
अपने को जाने बिना,उस को जाने कौन।
औरों के गुण दौष का,क्या तूँ करे बखान।
अपने पाप और पुण्य का ,नहीं तुझे अनुमान।।

तूं जिस को अपना कहे,वो घर किस का ठोर।
तुझ से पहले था कोई,बाद तेरे कोई और।
काया माया भाग है कर्मों का प्रारब्ध।
जो तूने बोया नहीं,कैसे हो उपलब्ध।।

माटी सम तन के लिए सो साधन सो यत्न।
एक ना उस के वास्ते, छिपा जो भीतर रत्न
कर्मकांड के मंत्र तो हर पंडित ले बोल।
ऐसा पंडित कौन है,जो ऊर्जा पट दे खोल।।

रोटी कपड़ा गेह की, हर दम चिंता यार।
उस पर भी कुछ छोड़ दे,जो है पालनहार।
जिन की खातिर पाप का,ढोया सिर पर भार।
अंत समय वे चल दिए,बिच चिता के डार।।

आदिम युग की वृतियां, हिंसा ,भय,सम्भोग।
ज्यों की त्यों हैं आज तक,सभ्य कहाँ हम लोग।
हर प्राणी संसार का,दिव्य तत्त्व से युक्त।
लेकिन माया जाल से,कोई नहीं है मुक्त।।

वादक छेड़े रागनी,रस की पड़े फुहार।
ऐसा वादक कौन जो,छेड़े अनहद तार।
तन की छवि वर्धन करे,नाखुन बाल तराश।
ऐसा नाइ कौन जो,मुंडे मन का पाश।।

यौवन मद में झूम कर, ऊँचा बोल ना बोल।
ढाई मन लकड़ी पड़े ,कंचन तन का मोल।
कुतर-२कर खा गए,पूंजी मूषक पांच।
गृह स्वामी बेशुद्ध पड़ा, मूषक भरें कुलांच।

एक चोर ही कम नहीं,करने को कंगाल।
पांच-२ जिस गेह में,क्या हो उसका हाल।
दुःख सुख से कमतर नहीं,जो सुमरावे नाम।
सुख के इच्छुक प्राणियों,सुख बिसरावै राम।

दुविधा में मत कीजिए,इस जीवन का अंत।
इक निर्णय कर लीजिए,माया या भगवंत।
कितना श्रेय बटोर ले,कितनी जमा ले धाक।
मूल रूप में वीर्य था,अंत रूप में ख़ाक।।

भीतर के संसार से, परिचय कर नादान।
बाहर के संसार का,हो जायेगा ज्ञान।
भीतर के सुख से बड़ा,बाहर सुख नहीं कोए।
मन विचलित उतना अधिक,जितना अधिक धन होइ

हृदय में छवि ब्रह्म की,जिभ्या पर प्रभु नाम।
भोगो इस संसार को,कर्म करो निष्काम।
सहज जिंदगी के लिए,दो चीजें दरकार।
चना चबैना पेट को,मन को नाम आधार।।

पंडित जी क्या गिन रहे,कर्क मकर धनु मेष।
जब तक बाकी कर्मफल,तब तक जीवन शेष।
पांच पराए तत्त्व है,अपना केवल एक।
अपने की शुद्ध ली नहीं,बेगानों की टेक।।

यदि तेरा आचरण ही,पृकृति के अनुकूल।
दैहिक बौद्धिक मानसिक,सब दुःख हों निर्मूल।
शंसय और विवेक में,चलता है संघर्ष।
पर विवेक की जीत में आत्मा का उत्कर्ष।।

तीन आभूषण देह के, हृदय,चेतना, बुद्धि।
ध्यान योग से होत है,इन तीनों की शुद्धि।
दान दिया तो क्या दिया,धन का था अतिरेक।
आधी रोटी दान कर जब पल्ले कुल एक।।

बहु धन में से दे दिया,थोड़े धन का दान।
खुद को दानी मान कर,और बढ़ा अभिमान।
काम गलत भी ठीक है,यदि मन में नहीं चोर।
भरत पादुका सिर धरि,वाह-२चहुँ और।।

पर्दे में रखिए सदा,धन भोजन और नार।
बेपर्दा कर राखिए, सद्गुण सद्व्यवहार।
याद रहे दिन मौत का जिस को आठों याम।
पाप वृर्ति से बच रहे,कर्म करे निष्काम।।

सीमित संग्रह कीजिए,धन होवे या अन्नं।
संचय के परिणाम से,आत्मा रहे प्रशन्न।
रोते को मुस्कान दे,दे पीड़ित को प्यार।
इस से बढ़कर दूसरा,नहीं है पर उपकार।।

भोग सदा अतृप्ति दे,अतः भोग है रोग।
तब प्राणी है स्वस्थ जब,त्याग युक्त हो भोग।
माया से भागो नहीं,भोगो सुख सँसार।
रहो कमलवत फूल को,छुए ना जल की धार।।

भय न किसी को दें कभी,-२न हों भयभीत।
ऊर्जा पथ आरूढ़ हो,रण माया जग जीत।
माया अनुपम सुंदरी, कोठे वाली नार।
जिस ने पत्नी मान ली,उस ने खाई मार।।

क्षुधा पिपासा कुछ नहीं,यदि मन में संतोष।
सब फल अपने कर्म, का नहीं किसी को दौष।
वेद ग्रन्थ सब पढ़ लिए,पढ़ना न आया मौन।
पढ़ लिख कर अनपढ़ रहा,मुझ सा मुर्ख कौन।।

पुरे जीवन काल में,दिन हैं चार महान।
जन्म दीक्षा पृभु मिलन, चौथा देहावसान।
दूषित काम कलाप से,जगे बोध अपराध।एक।
संयत काम कलाप से,ऊर्जा चले अबाध।।

मन के पीछे मत चलो,मन के पंथ अनेक।
सीधे रस्ते ले चले,केवल बुद्धि विवेक।
धन वैभव किस काम का,यदि मन हुआ न शांत।
रुदन सहित जीवन मिला,रुदन युक्त प्राणान्त।।

मन के जीते जित है ,मन के हारे हार।
सहजासन के सामने,सिंहासन बेकार।
मन ही रिपु मन ही सखा,जो मन वश में होए।
फिर सारे संसार में,मीत न शत्रु कोए।।

शंसय रिपु सब से बड़ा,घात करे गम्भीर।
अमृत को फिंकवाए के,दे पीने को नीर।
तन का ताप उतार दे,दे कर कड़वी नीम।
मन का शंसय मेट दे,ऐसा कौन हकीम।।

नाम जप से राखिए,मन को इतना व्यस्त।
मौह माया को भूल कर,होवे हड़ी में मस्त।
मंत्र जाप से दृढ किए,मन का सोच विचार।
धीरे-२आएगा,वश में मन अय्यार।।

कल्पित दुःख से जिस समय,होवे मन आक्रांत।
मंत्र जाप से कीजिए,व्याकुलता को शांत।
मंत्र शक्ति के योग से,जागे सौई शक्ति।
चित्त वृति पृभु और हो,घटे जगत आसक्ति।।

कुछ पल निद्रा पूर्व के,सर्वोत्तम एकांत।
मन से दिन के क्रम का,लो हिसाब आद्यांत।
तन के घावों के लिए,बने विविध उपचार।
मन के घावों के लिए,केवल ब्रह्म विचार।।

माँ सत्ता धन बाप की,अहंकार सन्तान।
जिस के आंगन जा घुसे, उस के घर तूफ़ान।
सत्ता धन अधिकार सब,भोगो सुख के साथ।
बस केवल एक अहम को मत पकड़ाओ हाथ।।

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