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मनुष्य का नैतिकता से संबंध कैसा हो? -How should humans relate to morality?

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मनुष्य का नैतिकता से संबंध कैसा हो?


नैतिकता न तो किसी स्वर्ग से संबधित है, न किसी नर्क से। नैतिकता न तो किसी पुण्य से संबंधित है, न किसी पाप से। नैतिकता न तो किसी दंड से संबंधित है, न किसी प्रलोभन से। नैतिकता ढंग से जीने की व्यवस्था का नाम है।


क्या हम ऐसी नीति, और ऐसा अनुशासन, और ऐसी डिसीप्लिन, और ऐसी शिष्टता विकसित कर सकते हैं जिसमे व्यक्ति मरता न हो, पूरी तरह होता हो और फिर जीवन एक नैतिक जीवन बन सके? मेरी दृष्टि में ऐसा विकास हो सकता है। बल्कि सच तो यह है की व्यक्ति ही नैतिक हो सकता है। पुराने समाजों को मैं नैतिक नहीं मानता। वे मजबूरी में नैतिक थे। क्योंकि व्यक्ति ही न था। पुराने समाज में व्यक्ति का आभाव नीति थी। नए समाज में व्यक्ति का प्रादुर्भाव होगा, व्यक्ति पूरी तरह प्रकट होगा। और नैतिक कैसे वह व्यक्ति हो सकें, यह हमे सोचना होगा। दो तीन बातें मेरे ख्याल में आती हैं जो हम सोचें तो उपयोगी हो सकती हैं।
Morality for Humans: Ethical Understanding from the Perspective of ...
How should humans relate to morality?

पहली बात तो हमे यह समझनी चाहिए की नैतिकता न तो किसी स्वर्ग से संबधित है, न किसी नर्क से। नैतिकता न तो किसी पुण्य से संबंधित है, न किसी पाप से। नैतिकता न तो किसी दंड से संबंधित है, न किसी प्रलोभन से। नैतिकता ढंग से जीने की व्यवस्था का नाम है। नैतिकता जीवन को ढंग, विज्ञान और विधि देने का नाम है। अगर किसी व्यक्ति को अधिकतम जीना हो तो वह नैतिक होकर ही जी सकता है। अगर उसे कम जीना हो तो वह अनैतिक हो सकता है। जितना ज्यादा जीना हो उतना लोगो का साथ जरुरी है। जितना गहरा जीना हो उतना ज्यादा लोगों की शुभाकांक्षाएं जरुरी है। जितना अधिक जीना हो उतने लोगों का सहयोग जरुरी है। आनेवाली नैतिकता जीवन की एक विधि होगी। जो सुसाइडल हैं, वे अनैतिक हो सकते हैं, जो आत्मघाती हैं, वे नीति के विपरीत जा सकते हैं। लेकिन जीना है उन्हें तो सबके साथ जीना होगा। सबके साथ जीने का मतलब यह होता है की मैं सबको साथ देने वाला बन सकूं, तो ही सारे लोग मुझे साथ देनेवाले बन सकते हैं।


एक पुरानी व्यवस्था थी-शिक्षक था, क्लास में पढ़ा रहा है डंडा है। उसके हाथ में और बच्चे चुप हैं। वह चुप होना बड़ा बेहूदा था, अग्ली कुरूप था। क्योंकि डंडे के बल पर किसी को चुप करना अनैतिक है। वह अनुशासनबद्ध ही क्लास, एक बच्चा बोल न सकता था क्योंकि बोलना खतरनाक और महंगा पड सकता था। वह अनुशासन व्यक्ति को खोकर था। नई कक्षा में नये बच्चों के बीच डंडा लेकर शिक्षक अनुशासन पैदा नहीं कर सकता, न करना चाहिए, न वह उचित है। अब नयी कक्षा में कैसे अनुशासन हो? डंडा खो गया, शिक्षक की ताकत खो गयी। नयी कक्षा में विद्यार्थी हैं। उनके बीच अनुशासन कैसे हो?


अब नयी कक्षा में अनुशासन का एक अर्थ होगा कि विद्यार्थी यह समझ पायें कि वहां कुछ सीखने को उपस्थित है। और सीखना केवल सहयोग, शांति और मौन में ही संभव है। अगर इतना विवेक हम न जगा पायें तो अब भविष्य में अनुशासन कभी भी नहीं हो सकेगा। अब अनुशासन का एक ही अर्थ होगा कि विद्यार्थी को यह पता चले कि अनुशासन मेरे हित में है। अनुशासन के मार्ग से ही मैं सीख सकूंगा, अनुभव कर सकूंगा, खोज सकूंगा। क्योंकि अनुशासन मुझे दूसरों के अंतर्संबंध में प्रीतकर बन देगा, अप्रीतिकर नहीं। मैं इन तीस लोगों के साथ मित्र होकर ही जीत सकूंगा, अमित्र होकर नहीं। शिक्षक गुरु नहीं है, अब वह मित्र है। और उसके साथ सीखना हो तो मैत्री चाहिए।


शिक्षक को पुराना ख्याल छोड़ देना चाहिए गुरु होने का। गुरुडम की बात अब आगे नहीं चल सकती। और अगर वह गुरुडम स्थापित करने की कोशिश करेगा तो बच्चे उसके गुरुडम को तोड़ने की हर चेष्टा करेंगे। अब उसके गुरुडम को स्थापित करने की कोशिश, गुरुडम को तुड़वाने के लिए चुनौती देने की चेष्टा है। वह उसे छोड़ देनी चाहिए। अब वह मित्र होकर ही जी सकता है और उचित भी है यह कि शिक्षक मित्र हो। वह मित्र जो हमसे दस साल आगे है। जिसने जिंदगी को दस साल देखा है, पढ़ा है, सुना है, समझा है और वह हमें भी उस जिंदगी के रास्ते पर ले जा रहा है, जहां वह गया है।


मेरे एक मित्र रुस गये थे। और एक छोटे से कालेज को देखने गये थे। वहां वे बड़े परेशान हुए। देखा कि एक लड़का सामने कि ही बैंच पर दोनों जूते रखे हुए टिका हुआ बैठा है, पैर फैलाये हुए। वह मित्र मेरे शिक्षक हैं, उनके बर्दाश्त के बाहर हो गया। वे पुराने ढंग के शिक्षक हैं। उनको क्रोध आया। उन्होंने उस कालेज के प्रोफेसर को जो पढ़ा रहा था, बाहर निकलकर कहा कि यह क्या बेहूदगी है, यह कैसी अनुशासनहीनता है? सामने ही बैंच पर लड़का जूते टिकाये बैठा है और टिका है आराम से। यह कोई आराम कि जगह है। यह कोई विश्राम स्थल है, यह कोई वेटिंग रूम है? ढंग से बैठना चाहिए। उस शिक्षक ने कहा, आप समझें नहीं। मेरे लड़के मुझे इतना प्रेम करते हैं, मैं कोई उनका दुश्मन थोड़े ही हूं कि वे मेरे सामने डरे हुए और अकड़े हुए बैठें। मैं उनका मित्र हूं। वे आराम से बैठ सकते हैं। और फिर मुझे उनके बैठने से प्रयोजन नहीं। वे किस तरह बैठकर ज्यादा से ज्यादा सीख सकते हैं, यह सवाल है। अगर उस लड़के को इतने आराम से बैठकर सुनने में सुविधा हो रही है, तो बात खत्म हो गयी। उसके बैठने से क्या प्रयोजन?


यह एक दूसरा माहौल है, एक मित्रता का माहौल है। जहां हम विद्यार्थी को मित्र मान कर जी रहे हैं और तब एक नये तरह कि शिस्त और एक नये तरह का अनुशासन विकसित होगा। क्योंकि शिक्षक यह कह रहा है कि वे इतना प्रेम करते हैं मुझे कि अपने घर में जैसे अपनी मां के पास पैर फैलाकर बैठ सकते हैं, वह मेरे पास भी बैठे हुए है। मैं उनका दुश्मन नहीं हूं और मेरा काम यह है कि मैं उन्हें कुछ सिखाने को यहां आऊं। वे कितने आराम में, जितनी सुविधा से बैठ सकें, सीख सकें, वह मेरा फर्ज है। मैं उतनी उन्हें मुक्ति देता हूं। यह एक बुनियादी फर्क है।


रूस में पिछले तीस वर्षों से परीक्षा करीब करीब विदा हो गयी है। और सारी दुनिया से विदा होनी चाहिए, क्योंकि परीक्षा पुराने तंत्र से संबंधित है जहां हम डंडे के बल सिखा रहे थे और डंडे के बल परीक्षा ले रहे थे। परीक्षा भी बहुत बड़ा टीचर है, बहुत बडा अत्याचार है। और परीक्षा के आधार पर सिखाना एक बहुत भयग्रस्त व्यवस्था थी, फीयर पर खड़ी हुई थी क्योंकि लड़का सीख रहा था कि कहीं असफल न हो जाये। असफलता का भय उसे घेरे हुए था। सफलता का प्रलोभन घेरे हुए था। वही स्वर्ग और नर्क की व्यवस्था थी। अगर वह हार जाता, असफल हो जाता तो खो जायेगा-निंदित, अपमानित, व्यर्थ! अगर जीत जायेगा, सफल हो जायेगा तो स्वर्ग का पृथ्वी पर अधिकारी हो जायेगा।

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