भजन और ध्यान की भूख पैदा होना ही आगे का रास्ता चलना है
72 प्रश्न - महाराज जी ! गुरू भाइयों से बातचीत के दौरान मालूम होता है । और मेरे साथ भी ऐसा होता है कि कभी कभी भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में खूब मन लगता है । और उसमें आनन्द आता है । और कभी भजन, सुमिरन व ध्यान के अभ्यास में कमी आ जाती है । मन ठीक से नहीं लगता है । मन में तरह तरह की हिलोरें उठती रहती हैं । और तरह तरह की विघ्न बाधायें आती रहती हैं । यह हालत एक के बाद दूसरी । दूसरी के बाद तीसरी । यानी एक के बाद एक लगातार आती ही रहती हैं । भजन ध्यान का साधन बनता बिगडता रहता है ।
उत्तर - जब तक श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा नहीं होगी । तब तक भजन । सुमिरन । ध्यान में रस या आनन्द नहीं आयेगा । साधक के मन में भजन, ध्यान के लिये बेकली व तडप आवश्यक है । जिससे रस और आनन्द के लिए भूख पैदा हो । भजन और ध्यान के लिए भूख पैदा होना ही आगे का रास्ता चलना है । यदि उतने से आनन्द में तृप्ति हो जाती है । तो फ़िर उसके लिये आगे का रास्ता रूक जाता है । अत: ऐसी दशा में जब विघ्न उत्पन्न हो । तो उसके लिये विरह तथा तडप उत्पन्न होती है । ऐसी दशा में अभ्यासी को घबराना नहीं चाहिये । और न ही निराश होना चाहिये । इस दशा में श्री सदगुरू देव जी महाराज के दया की आशा रखकर खूब लगन से भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान नियमित नियमानुसार करते रहना चाहिये । इससे मालिक की दया व कृपा अवश्य ही होती है ।
नियम निभाये दास ये । प्रभु दीजो यही आशीष । मेरे दामन में भरो । प्रभु दया की बख्शीश ।
जो साधक श्री सदगुरू के स्वरूप को अगुआ करके चलेगा । यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज का आश्रय लेकर कोई भी कार्य करेगा । उसे प्रभु की कृपा से विघ्न बाधायें बहुत ही कम असर करेंगी । यदि माया अपने दल बल का थोडा बहुत वेग दिखायेगी । तो भी श्री सदगुरू देव जी महाराज अपनी दया से अपने शिष्य के ऊपर आई विघ्न बाधाओं का शीघ्र निवारण कर देंगे । इस प्रकार साधक अपने श्री सदगुरू देव महाराज पर आश्रित रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान तथा भक्ति की साधन करता है । तथा सदा अपने मन को उनके श्री चरण कमलों में लवलीन रखता है । उससे माया भी डरती है । क्योंकि वह जानती है कि यहां मेरा वश नहीं चलेगा । इसलिये सभी साधकों को सीख दी जाती है कि कोई भी कार्य, चाहे सामाजिक कार्य हो । या आध्यात्मिक कार्य । सदा सर्वदा श्री सदगुरू देव महाराज को आगे रखकर ही करोगे । तो सदा सफ़लता प्राप्त करते रहोगे ।
गुरू अतिरिक्त और नहीं ध्यावे । गुरू सेवा रत शिष्य कहावे । इस तरह से अपने इष्ट देव पर न्यौछावर हों । तब वे कृपालु, दयालु अपने वह प्रेमाभक्ति देते हैं । जो सारे सुखों का मूल है । जब हम उन पर अपने आपको कुर्बान कर देते हैं । हम पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यह हमारी
जो साधक श्री सदगुरू के स्वरूप को अगुआ करके चलेगा । यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज का आश्रय लेकर कोई भी कार्य करेगा । उसे प्रभु की कृपा से विघ्न बाधायें बहुत ही कम असर करेंगी । यदि माया अपने दल बल का थोडा बहुत वेग दिखायेगी । तो भी श्री सदगुरू देव जी महाराज अपनी दया से अपने शिष्य के ऊपर आई विघ्न बाधाओं का शीघ्र निवारण कर देंगे । इस प्रकार साधक अपने श्री सदगुरू देव महाराज पर आश्रित रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान तथा भक्ति की साधन करता है । तथा सदा अपने मन को उनके श्री चरण कमलों में लवलीन रखता है । उससे माया भी डरती है । क्योंकि वह जानती है कि यहां मेरा वश नहीं चलेगा । इसलिये सभी साधकों को सीख दी जाती है कि कोई भी कार्य, चाहे सामाजिक कार्य हो । या आध्यात्मिक कार्य । सदा सर्वदा श्री सदगुरू देव महाराज को आगे रखकर ही करोगे । तो सदा सफ़लता प्राप्त करते रहोगे ।
गुरू अतिरिक्त और नहीं ध्यावे । गुरू सेवा रत शिष्य कहावे । इस तरह से अपने इष्ट देव पर न्यौछावर हों । तब वे कृपालु, दयालु अपने वह प्रेमाभक्ति देते हैं । जो सारे सुखों का मूल है । जब हम उन पर अपने आपको कुर्बान कर देते हैं । हम पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यह हमारी
हर आज्ञा का पालन करेगा । तब वे अपने सेवा का अवसर प्रदान करते हैं । अत: हमें पूर्ण रूपेण श्री सदगुरू देव भगवान की श्री चरण शरण में अर्पित होना चाहिये । तभी तो लोग कहते हैं कि
न हमने हंस के पाया है । न हमने रो के पाया है । जो कुछ भी हमने पाया है । श्री सदगुरू का हो के पाया है ।
बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा के साधक के अन्दर भजन । सुमिरन । ध्यान व भक्ति की प्रक्रिया यानी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाती । जिन साधक जिज्ञासु पर श्री सदगुरू देव जी महाराज की महती कृपा होती है । उनको गुरू के प्रेम की अमूल्य निधि प्राप्त हो जाती है । उन्हें उसको बनाये रखने के लिये भजन । सुमिरन । ध्यान का नियमित अभ्यास नियमानुसार करते रहना चाहिये । साधक को इसे बनाये रखने के लिये नियमित अभ्यास करना अति आवश्यक है । जब कभी भजन । सुमिरन । ध्यान करते समय ध्यान में रूकावट पडे । तो घबराना नहीं चाहिये । मालिक की दया का सहारा लेकर बार बार कोशिश पर कोशिश जारी रखे रहना चाहिए । ऐसा करने से मालिक की दया से भजन, सुमिरन व ध्यान होने लग जायेगा । और रस व आनन्द भी मिलने लगेगा । यही तो श्री सदगुरू की दया का प्रताप है ।
न हमने हंस के पाया है । न हमने रो के पाया है । जो कुछ भी हमने पाया है । श्री सदगुरू का हो के पाया है ।
बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा के साधक के अन्दर भजन । सुमिरन । ध्यान व भक्ति की प्रक्रिया यानी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाती । जिन साधक जिज्ञासु पर श्री सदगुरू देव जी महाराज की महती कृपा होती है । उनको गुरू के प्रेम की अमूल्य निधि प्राप्त हो जाती है । उन्हें उसको बनाये रखने के लिये भजन । सुमिरन । ध्यान का नियमित अभ्यास नियमानुसार करते रहना चाहिये । साधक को इसे बनाये रखने के लिये नियमित अभ्यास करना अति आवश्यक है । जब कभी भजन । सुमिरन । ध्यान करते समय ध्यान में रूकावट पडे । तो घबराना नहीं चाहिये । मालिक की दया का सहारा लेकर बार बार कोशिश पर कोशिश जारी रखे रहना चाहिए । ऐसा करने से मालिक की दया से भजन, सुमिरन व ध्यान होने लग जायेगा । और रस व आनन्द भी मिलने लगेगा । यही तो श्री सदगुरू की दया का प्रताप है ।
श्री सदगुरू ने अति दया कर । दिया नाम का दान । जपे जो श्रद्धा भाव से । पूरण होवें सब काम ।
भजन में जब सांसारिक विचार आवे । तो भरसक उन्हें हटाकर अपने मन को भजन । सुमिरन । ध्यान में लगाना चाहिये । यदि सांसारिक विचार न हटें । तो मालिक के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में मन को घुमा फ़िरा कर लगाते रहना चाहिये । यदि इतना करने पर भी मन न लगे । तो मालिक से दीन भाव से प्रार्थना करें कि - हे मालिक ! मेरा तन, मन, धन सब आपका है । हे मालिक ! मेरे मन को अपने चरणों की प्रीति की डोर मे बांध कर अपने साथ हमेशा जोडे रहिये । और मेरा मन भजन, सुमिरन, ध्यान के रस में हमेशा हमेशा सराबोर किये रहिये । इससे मेरे मन में शान्ति व आनन्द प्राप्त हो जायेगा । माया और भक्ति दोनों इकट्ठी नहीं रह सकतीं । यह मेरा दिल मालिक का मन्दिर है । इष्टदेव का उपासना स्थल है । इसी उपासना स्थल में मालिक के नाम का भजन, मालिक के स्वरूप का ध्यान करें । और इसी भजन और ध्यान के रस में सदा डूबे रहें । यह श्री सदगुरू महाराज की महती दया है । और सभी साधकों को इसे बनाये रखने के लिये भजन भक्ति का अभ्यास करना अति आवश्यक है । ऐसा करने से शान्ति का अनुभव होता है । ऐसी दशा में जितनी देर तबियत चाहे । उतनी देर भजन ध्यान करता रहे । और मन में शान्ति की भावना लेकर उठे ।
सन्त सदगुरू जीवों के परम हितैषी होते हैं । वे संसार में आकर सदा परमार्थ एवं परोपकार में संलग्न रहते हैं । और अपने भक्तों को भक्ति की सच्ची दात प्रदान कर उनके दुख, कष्ट को हरते हैं । उनकी आत्मा का कल्याण करते हैं । उन्हें चौरासी 84 के चक्कर से मुक्ति दिलाते हैं । अपने सुकोमल तन पर अनेकों कष्ट सहन करके भी वे सदा भक्तों की भलाई करने में सदा लगे रहते हैं ।
जीवों के कल्याण हित । निरत रहे दिन रैन । पावन तन पर कष्ट सहें । देवें सुख और चैन ।
सन्तों महापुरूषों का कहना है- परमारथ के कारने । सन्त लिया औतार ।
सन्त लिया औतार । जगत को राह चलावैं । भक्ति करैं उपदेश । ज्ञान दे नाम सुनावैं ।
प्रीत बढावैं जगत में । धरनी पर डोलौं । कितनौ कहे कठोर वचन । वे अमृत बोलौं ।
उनको क्या है चाह । सहत हैं दुख घनेरे । जीव तारन के हेतु । मुलुक फ़िरते बहुतेरे ।
पलटू सदगुरू पायके । दास भया निरवार । परमारथ के कारने । सन्त लिया औतार ।
73 प्रश्न - अभ्यास करते करते यानी भजन, ध्यान करते करते किसी किसी को नींद आने लगती है । और अभ्यासी सो जाता है । किसी किसी को तो गहरी नींद में नाक बजने लग जाती है । जागने पर सोचता है कि बडी गहरी समाधि लग गयी है । क्या यह सचमुच समाधि की हालत होती है ?
उत्तर - यह धोखा है । भजन । सुमिरन । ध्यान में जब नींद आने लग जाती है । तो वह एक प्रकार का विघ्न है । इसे तन्द्रा कहते हैं । और यह जागृत तथा सोने के बीच की हालत है । प्रारम्भिक अभ्यास में यह दशा किसी किसी को होती है । जब नींद आती मालूम पडे । तो भजन करना छोडकर उठ जाय । और कुछ देर टहल घूम ले । यदि आवश्यकता समझे । तो मुंह हाथ धोकर । कुल्ला कर ले । सिर धो ले । फ़िर अभ्यास में बैठ जाय । ज्यादा खाना खाकर भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना में बैठने से ऐसा अक्सर होता है । खाली पेट भजन । सुमिरन । ध्यान में आन्तरिक स्मरण करता रहे । तो ऐसा अभ्यास करते रहने से कुछ ही समय में सारी विघ्न बाधायें दूर हो जायेंगी ।इसके अतिरिक्त तीन प्रकार के विघ्न और भी हैं । जो अभ्यासी के मार्ग में बाधा डालते हैं । 1 विक्षेप 2 कषाय और 3 रसा स्वाद ।
1 विक्षेप - जब भजन और ध्यान में मन लगता है । तब कभी कभी ऐसा होता है कि झटके के साथ एकदम चित्त उधर से हट जाता है । जैसे किसी ने अचानक आकर पुकारा । या आवाज दी । या हाथ से हिलाकर उठाना चाहा । या मन में अचानक कोई सांसारिक तरंगे ऐसी उठीं । जिसके कारण चित्त चलायमान हो गया । या कोई कीडा । मच्छर । चींटी इत्यादि ने काट लिया । यह केवल कुछ उदाहरण हैं । जिससे विक्षेप का अर्थ स्पष्ट हो जाय । इस प्रकार की अनेक विघ्न बाधायें विक्षेप के अन्तर्गत आती है । और इसके कारण अभ्यासी भजन और ध्यान को एकदम छोड देता है । इसका उपाय यह है कि इन कारणों की पहले से रोक थाम करे । भजन, ध्यान में बैठने के लिये साफ़ सुथरी जगह पर बैठ कर भजन ध्यान करे । घर परिवार के लोगों को समझा दे कि भजन ध्यान के समय कोई जोर से न बोले । इशारे इशारों से काम ले लें । बहुत जरूरी पडने पर धीरे धीरे बोलकर काम चलावें । जिससे कि अभ्यासी के भजन, ध्यान में बाधा न पडे । जब तक भजन ध्यान की एकाग्रता Concentration में परिपक्वता नहीं आ जाती । तब तक यह दशा रहती है । अभ्यास करते करते जब एकाग्रता में दृणता आ जाती है । तब इस प्रकार के विघ्न बाधायें नहीं डालते । फ़िर चाहे कोई सिर पर ढोल बजाता रहे । अभ्यासी के चित्त को डिगा नहीं सकता । महर्षि वाल्मीकि के ऊपर दीमकों ने घर बना लिया था । रामकृष्ण परमहंस जब पंचवटी में ध्यान करने बैठते थे । तो मच्छर उनके शरीर पर इस प्रकार लिपट जाते थे कि जैसे वे कोई कपडा ओढे हों ।
पल पल जो सुमिरन करे । मन में श्रद्धा धार । आधि व्याधि नासे सकल । पावै सुख अपार । 2 कषाय - कभी भजन व ध्यान के समय अभ्यासी के मन में ऐसे विचार उठते हैं । या ऐसे दृश्य सामने आते हैं । जिन्हें उसने वर्तमान जन्म में न देखा है । न सुना है । और न जिनका कोई आधार है । ऐसे विचार पूर्ण जन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप होते हैं । और मन की गुनावन से पैदा होते हैं । बिना थोडी देर अपना प्रभाव दिखाये यह नहीं जाते हैं । जो अभ्यासी गुरू को आगे रखता है । और प्रेम तथा विरह को दृढ़ता से पकडकर चलता है । उसे इस प्रकार के विघ्न कम सताते हैं । जब कभी ऐसे विचार आकर घेरें । उस समय अभ्यासी को चाहिये कि भजन के साथ साथ श्री सदगुरू भगवान के स्वरूप का ध्यान करे । कुछ ही समय में यह विचार हट जायेंगे । और भजन, ध्यान के आनन्द का रस मिलने लग जायेगा । साथ ही साधक का मन उत्साहित होकर और ज्यादा से ज्यादा समय भजन । भक्ति व सेवा । पूजा । दर्शन में लगने लगता है । और आनन्दित भी होता है । तथा अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज को प्रसन्नचित्त व आनन्द विभोर करके सन्तुष्ट कर लेता है । और जब श्री सदगुरू सन्तुष्ट हो जाते हैं । तो वे अपने शिष्य व साधक को अपने दया से मोक्ष प्रदान कर देते हैं ।
गुरू नाम का सुमिरन किये । जन्म यह निश्चय जीता संवर । मोक्ष मिल जाता दास को । दया का हाथ होता सर ।
3 स्वाद से आशय यह है कि जो थोडा बहुत रस भजन व ध्यान में अभ्यासी को प्रारम्भिक दशा में मिलता है । उसे पाकर कभी कभी साधक बहुत मग्न हो जाता है । और भजन, ध्यान के आनन्द में विभोर होकर तृप्त हो जाता है । सन्तुष्ट हो जाता है । इसी सन्तुष्टि के फ़लस्वरूप साधक का मन भजन, सुमिरन, ध्यान में ज्यादा से ज्यादा लगने लगता है । जिससे उसे समय का ज्ञान नहीं रह पाता । उसी भजन, भक्ति में विभोर मन सदगुरू की कृपा व दया का पात्र बन जाता है । जब ऐसी दशा होती है । तो साधक को चाहिये कि अपने साधना को बढाता जाय । तथा आध्यात्मिक चढाई धीरे धीरे चढता जाय । ऐसा करने से धीरे धीरे सारी विघ्न बाधायें समाप्त हो जाती हैं । और भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में मग्न होकर मन श्री सदगुरू की दया का अमृत पान कर मस्त व मगन हो उठता है । ये सब श्री सदगुरू की कृपा की ही देन है । ऐसी स्थिति में श्री सदगुरू की चरण शरण ग्रहण किये रहे । सन्त सदगुरू के जो उपकार हैं । उनका बदला जीव क्या दे सकता है ? संत सदगुरू के उपकारों के बदले यदि जीव तीन लोक की सम्पदा भी भेंट कर दे । तो भी वह मन में यह सोचकर सकुचाता है कि मैंने कुछ भी तो भेंट नहीं किया । कथन है कि - सदगुरू के उपकार का । बदला दिया न जाय । तीन लोक की सम्पदा । भेंटत मन सकुचाय ।
- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
3 स्वाद से आशय यह है कि जो थोडा बहुत रस भजन व ध्यान में अभ्यासी को प्रारम्भिक दशा में मिलता है । उसे पाकर कभी कभी साधक बहुत मग्न हो जाता है । और भजन, ध्यान के आनन्द में विभोर होकर तृप्त हो जाता है । सन्तुष्ट हो जाता है । इसी सन्तुष्टि के फ़लस्वरूप साधक का मन भजन, सुमिरन, ध्यान में ज्यादा से ज्यादा लगने लगता है । जिससे उसे समय का ज्ञान नहीं रह पाता । उसी भजन, भक्ति में विभोर मन सदगुरू की कृपा व दया का पात्र बन जाता है । जब ऐसी दशा होती है । तो साधक को चाहिये कि अपने साधना को बढाता जाय । तथा आध्यात्मिक चढाई धीरे धीरे चढता जाय । ऐसा करने से धीरे धीरे सारी विघ्न बाधायें समाप्त हो जाती हैं । और भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में मग्न होकर मन श्री सदगुरू की दया का अमृत पान कर मस्त व मगन हो उठता है । ये सब श्री सदगुरू की कृपा की ही देन है । ऐसी स्थिति में श्री सदगुरू की चरण शरण ग्रहण किये रहे । सन्त सदगुरू के जो उपकार हैं । उनका बदला जीव क्या दे सकता है ? संत सदगुरू के उपकारों के बदले यदि जीव तीन लोक की सम्पदा भी भेंट कर दे । तो भी वह मन में यह सोचकर सकुचाता है कि मैंने कुछ भी तो भेंट नहीं किया । कथन है कि - सदगुरू के उपकार का । बदला दिया न जाय । तीन लोक की सम्पदा । भेंटत मन सकुचाय ।
- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।








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