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न किताब उपयोगी है न ज्ञान। Neither book is useful nor knowledge.

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न किताब उपयोगी है न ज्ञान।

रेत पर खींची गई लकीरों की तरह ये जिंदगी है। हवाएं आएंगी औऱ रेत उड़ जाएगी। कितने लोग पहले रहे हैं इस पृथ्वी पर? जहाँ हम बैठे हैं वहां उस जमीन पर न जाने कितने लोगों की कब्र बन गई होगी? जिस रेत पर हम बैठे हैं वह रेत ना जाने कितनी जिन्दगियों की राख का हिस्सा है। कितने लोग इस पृथ्वी पर रह रहे हैं, और कितने खो गए हैं? यहाँ आज कौन सा उनका निशान है? कौन सा उनका ठिकाना है? उन्होंने क्या नहीं सोचा होगा? क्या नहीं किया होगा?
बाहर की जिंदगी बेमानी है। बाहर की जिंदगी का बहुत अंतिम अर्थ नहीं है। मैं सुनता हूँ कि द्वारिका सात बार बनी औऱ बिगड़ी। सात करोड़ बार बन बिगड़ गई होगी। कुछ पता नहीं है। इतना अंतहीन है विस्तार यह सब। इसमें सब रोज बनता है और बिगड़ता है। लेकिन कितने सपने देखे होंगे उन लोगों ने, कितनी इच्छाऍ की होंगी? ये बनाएं और वो बनाएँ। सब राख औऱ रेत हो गया, सब खो गया। हम भी खो जाएंगे कल। हमारे भी बड़े सपने हैं। हम भी क्या क्या नहीं कर लेना चाहते हैं। लेकिन समय की रेत पर सब पुछ जाता है।
हवाएं आती हैं और सब बह जाता है। बाहर की जिंदगी का बहुत अंतिम अर्थ नहीं है। बाहर की जिंदगी खेलने से ज्यादा नहीं है। हाँ, ठीक से खेल लें यही बहुत है। क्योंकि ठीक से खेलना भीतर ले जाने में सहयोगी बनता है। लेकिन बाहर की जिंदगी का कोई बहुत मूल्य नहीं है। तो कुछ लोग बाहर की जिंदगी में खो कर भटक जाते हैं। फिर कुछ लोग भीतर की तरफ चलने लगते हैं तो वहाँ एक गलत रास्ता बनाया हुआ है। वहां धर्म के नाम पर दुकानें लगीं हैं। वहां धर्म के नाम पर हिन्दू मुसलमान, ईसाइयों के पुरोहित बैठे हैं। वहां आदमी के बनाए हुए ईश्वर, आदमी के बनाए हुए देवता, आदमी की बनाई हुई किताबें बैठी हैं। वे घर का भेदी हैं। बाहर से आदमी किसी तरह बचता है , कुँए से बचता है और खाई में गिरता है। उस भटकन में चल पड़ता है। उस भटकन से कुछ लोगों को मजा आता है। कुछ लोग शोषण कर रहे हैं। हजारों साल से कुछ लोग इसी का शोषण कर रहे हैं। आदमी की इस कमजोरी का, आदमी की इस नासमझी का,आदमी की इस असहाय अवस्था का। आदमी जब बाहर से भीतर की तरफ मुड़ता है तो वह अनजान होता है। उसे कुछ पता नहीं होता कि कहाँ जाऊं। वहां गुरुवर खड़े होते हैं, वे कहते हैं आओ हम तुम्हें रास्ता बताते हैं। हमारे पीछे चलो। हम जानते हैं। और ध्यान रहे, जो आदमी कहता है मैं जानता हूँ, मेरे पीछे आओ। यह आदमी बेईमान है। क्योंकि धर्म की दुनिया में जो आदमी प्रविष्ट होता है। उसका, "मैं" ही मिट जाता है। वह यह कहने की हिम्मत ही नहीं कर सकता कि मैं जानता हूँ। सच तो यह है कि वहाँ कोई जानने वाला नहीं बचता। वहाँ कुछ जाना जाने वाला नहीं होता। वहां जानने वाला भी मिट जाता है। जो जाना जाता है, वह भी मिट जाता है। वहां न ज्ञाता होता है और ना ही ज्ञेय। इसलिए जो जान लेता है वह ये नहीं कहता कि मैं जानता हूँ। आओ मैं तुझे ले चलूँगा। ओर जो जान लेता है, वह ये भी जान लेता है कि कोई कभी किसी दूसरे को नहीं ले गया है। हर एक को स्वयं ही जाना पड़ता है। धर्म की दुनिया में कोई गुरु नहीं होते। लेकिन जहां पाखण्ड का धर्म है, वहां गुरुओं के अड्डे हैं। इसलिए ध्यान रहे, जो गुरुओं के पीछे जाएगा वह कभी परमात्मा तक नहीं पहुंचता। क्योंकि वे गुरुओं की दुकानें अपने पीछे ले जाती हैं। और आदमी के बनाए हुए जाल में उलझा देती हैं। करोड़ों करोड़ों लोग चींटियों की तरह यात्रा करते रहते हैं पीछे एक दूसरे के। यह सारी की सारी यात्रा व्यर्थ है। न कोई धर्म का तीर्थ है न कोई मन्दिर है, न कोई धर्म की किताब है, न कोई धर्म गुरु है। और जब तक हम इन बातों में भटके रहेंगे तब तक हम कभी धर्म को नहीं जान सकते। लेकिन आप कहेंगे, फिर हम क्या करें? यदि हम गुरुओं के पीछे न जाएं तो हम कहाँ जाएं। एक सीख के पीछे मत जाओ, ठहर जाओ, रुक जाओ। तुम वहां पहुंच जाओगे जहां पहुंचना जरूरी है।
कुछ चीजें हैं जहाँ चल कर पहुंचा जाता है, औऱ कुछ चीजें ऐसी हैं जहां रुक कर पहुंचा जाता है। धर्म ऐसी ही चीज है वहां चल कर नहीं पहुँचना पड़ता। यह शायद कभी सोचा नहीं होगा। मैं द्वारिका तक आया तो मुझे यात्रा करके आना पड़ा। क्योंकि मेरे औऱ आपके बीच में फासला था। उस फासले को पूरा करना पड़ा। अगर अब मैं आपके पास आऊँ तो मुझे उठकर चलना पड़ेगा। क्योंकि आपके औऱ मेरे बीच में दूरी है। दूरी को पार करना पड़ेगा।लेकिन आदमी और परमात्मा के बीच में कोई दूरी नहीं है। इसलिए चलने का सवाल ही नहीं उठता वहां। वहां जो चलेगा वह भटक जाएगा। वहां जो ठहर जाता है, वह पहुंच जाता है। इसलिए पहले बात ठीक से समझ लेना, वहां चल कर नहीं पहुँचना है। इसलिए किसी गुरु की जरूरत नहीं है। किसी वाहन की जरूरत नहीं है। किसी यात्रा की जरूरत नहीं है। वहां तो वे पहुचते हैं जो सब जगह से रुक जाते हैं और ठहर जाते हैं।
धन्यवाद।
संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंगल।

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