आत्म प्रचार से विमुखता
इतना जानते हुए भी गुणग्राही और उदारहृदय दत्त महाशय ने मुक्त कण्ठ से उनसे कहा - ' ऋषिवर ! मैंने भी यह अनुवाद किया है । मौर लंदन की ' एवरमिन्स लाइब्रेरी ' को प्रकाशनार्थ जा है । बहुत दिन हो गये , शायद वह छप भी गया होगा , परंतु आपका यह अनुवाद इतना सुन्दर हुआ है कि मेरे उस अनुवाद को प्रकाशित कराने में मैं अब लज्जा का अनुभव कर रहा हूँ । ' सर रमेशचन्द्र के मुख से यह बात सुनकर यदि अन्य कोई होता तो फूला न समाता । परंतु श्रीअरविन्द तनिक भी उल्लसित नहीं हुए , बल्कि शील भाव से बोले - यह सब मैंने छपाने के हेतु नहीं लिखा है और न मेरे जीवन - काल में यह छप सकेगा।
फिर भी दत्त महाशय अपने लोभ का संवरण नहीं कर सके। वे बार - बार मुक्त कण्ठ से कहते रहे इस अमूल्य सामग्री का प्रकाशन तो हो ही जाना चाहिये। परंतु श्री अरविन्द किसी प्रकार भी राजी नहीं हुए । कहना गलत नहीं होगा कि श्रीअरविन्द ने अपने जीवन में न जाने कितनी अमूल्य सामग्री का निर्माण किया होगा । वह सब यदि प्रकाश में आ जाती तो आज साहित्य की कितनी अभिवृद्धि हुई होती ।

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