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सच्ची शोभा -True beauty of Goddess Laxmi is Donation

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सच्ची शोभा 

श्री रामशास्वी अपनी न्यायप्रियता के लिये महा राष्ट्रइतिहास में अमर हो गये हैँ। वे पेशवा माधव राव जी के गुरु थे मची थे और राज्य के प्रधान न्यायाधीश भी थे । इतना सब होकर भी अपनी रहन-सहन में वे केवल एक ब्राह्मण थे। एक साधारण घर में रहते थे, जिसमें नहीं थी कोई तड़क-भड़क, और नहीं था कोई वैभवा 

किसी पर्व के समय श्रीराम शास्वी जी को पली राजभवन में पधारी। रानी तो अपने गुरु को फ्लो कौ देखते ही चकित हो गयी । राजगुरु को पली और उनके शरीर पर सोना तो दूर, कोई चाँदी तक का आभूषण नहीं। पहनने की साडी भी बहुत साधारणा रानों कौ लगा कि इसमें तो राजकुल की निन्दा है। जिस गुरै हें घर पेशवा प्रतिदिन नियमपूर्वक प्रणाम काने जाय, उस गुरु कौ पली इस प्रकार दरिद्र-वेश में रहें तो लोग दृशण कौ ही कृपण वतलायेंगे । 

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True beauty of Goddess Laxmi is Donation
रानी ने गुरु पबी को बहुमूल्य वस्त्र पहिचाने, रत्नजटित सोने के आभूषणों से अलंकृत किया । जज उनके विदा होंने का समय आया तब पालकी में बैठाकर उन्हें विदा किया। पालकी राम शास्वी के द्वार पर पहुँची। कहारों ने द्वार खटखटाया। द्वार खुला और झट बंद हो गया। अपनी स्वी को इस वेश मैं राम शास्वीजी ने देख लिया था । कहारों ने फिर पुकारा-'शास्वी जी ! आपकी धर्मपत्नी आयी हैं, द्वार खोलें 

शास्वीजी ने कहा- बहुमूल्य वस्वा भूषणों में सजी ये कोई और देबी हैं । मेरी ब्राह्मणी ऐसे वस्त्र और गहने नहीं पहन सकतीं । तुम लोग भ्रूल से इस द्वार षर आये हो ।' 

शास्वी जी की पत्नी अपने पतिदेव के स्वभख को जानती थी। उन्होंने कहारों को लौट चलने को कहा । राजभवन जाका उन्होंने ये वस्त्र और आभूषण उतार दिये । अपनी साडी पहन ली । रानी क्रो उन्हींने बता दिया…'इन वस्त्र और आभूषणों ने तो मेरे लिये मेरे घर का ही द्वार बंद करा दिया है । 

पैदल ही घर लौटी वे देवी । द्वार खुला हुआ था । शास्वीजी ने घर में आ जाने पर उनसे कहद्ध-'बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण या तो राजपुरुषों को शोधा देते है या मूर्ख उनके द्वारा अपनी अज्ञता छिपाने का प्रयत्न करते हैं । सत्युरुषों का आभूषण तो सादगी ही है । वही सच्ची शोभा है ।

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