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धार्मिक वचन - Devotional Quotes

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धार्मिक वचन

१. तुम सोचते हो कि अपनी चतुराई में तुम आपदाओं से बचने के उपाय कर रहे हो। तुम आपदाओं से बचने का इंतज़ाम नहीं, आपदाओं को इकट्ठा करते हो। जीवन भर खट-खट कर तुम अपने बुढ़ापे के कैंसर के लिए पैसा इकट्ठा करते हो, और देख नहीं पाते कि खट-खट कर तुमने कैंसर ही इकट्ठा कर लिया है।

२. निर्लज्ज, बेशर्म जियो। फूलों की तरह, सूरज और चाँद की तरह, नदियों, पहाड़ों और पशु-पक्षियों की तरह। अस्तित्व को कोई शर्म नहीं और परमात्मा को कोई पर्दा नहीं। तुमने ही अपनी होशियारी में अपने को शर्मनाक और शर्मसार बना लिया है।

परम निर्विकार, निर्विशेष, निराकार और निरंजन ही नहीं, निर्लज्ज भी है।

३. विज्ञापन से बचो। विज्ञापन मनोरंजन नहीं, तुम्हारे मन पर आक्रमण हैं।  विज्ञापन बुद्धि के साथ धोखा और कामना के लिए न्यौता हैं।

४. दिमाग ठीक रखो सब ठीक रहेगा।

५. मुक्ति का विचार उठ रहा है, यह तो ठीक है, पर यह विचार भी करो कि मुक्ति की कीमत क्या है। क्या वो कीमत देने को तैयार हो?

६. जो तुम्हें बार-बार ध्यान से हटा दे, तुम उस वस्तु या व्यक्ति को ही हटा दो। और कुछ न करते बने तो उस स्थान से ही हट जाओ।

७. भागने का नाम मन है, चाहे वो किसी भी तरफ भागे।

८. वही जो हमें भोग के लिए ललचाते हैं, वही नैतिकता के माध्यम से भोग को बुरा बताते हैं।

९. तुम्हारे मन को कोई विचलित करे, ये अन्याय है तुम्हारे साथ। रिझाने वालों को धोखेबाज़ जानना, खुश नहीं होना; रिझाना प्रेम नहीं चालबाज़ी है।

१०. जहां स्वार्थ सिद्ध हो वहां कभी आलस नहीं आता; आलस मन की स्वयं को बनाए रखने की चाल है। हमने सत्य, मुक्ति को बहुत पीछे की प्राथमिकता दी है, जहाँ सत्य और मुक्ति होंगे वहां हमें आलस आ जाएगा। नींद, आलस अहंकार का कवच हैं।

११. जितने आतुर हो तुम उससे मिलने के लिए उससे दुगनी प्यास है उसे तुमसे मिलने के लिए। दोनो की भूख एक है: एक हो जाऊं।

१२. परम से परम को मांगना, सो है प्रार्थना: कि तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस तुम ही आ जाओ।

१३. गरीब रह पाना बहुत अमीरों का काम है। गरीब होता तो गरीब थोड़े ही होता। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होता तब तुम धन इकट्ठा करते हो। धन्य वो जो वास्तविक धन को उपलब्ध हो जाता है।

१४. आम मन समाज और नैतिकता से भरा होता है। इसी कारण उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होती।
प्रेम न सामाजिक होता है न नैतिक होता है। प्रेम बस आध्यात्मिक होता है।

१५. जिन तक मौत की ख़बर पहुँच गई, वो जीना सीख जायेंगे ।

१६. साधु का आदर करने के लिए आपने अंदर साधुता चाहिए ।
साधु से प्रेम आत्मा से प्रेम है , परम से प्रेम है ।

१७. आप जिस तल पर हो दुनिया आपको उसी तल पर दिखाई देगी ।
बस आत्मा के तल पर आपको असली साधु का दर्शन हो सकता है ।

१८. साधु तुम्हारे द्वार भिक्षा नहीं, तुम्हें मांगने आता है । साधु अगर असली होगा तो वो तुमसे धन नहीं तुम्हें मांगेगा ।

१९. जिस इंसान की धन इकट्ठा करने में बड़ी रूचि है, वो अंदर से दरिद्र है। आतंरिक दरिद्रता ही उससे धन इकट्ठा करवा रही है ।

२०. जब तक दिल में गहरी अमीरी न हो तब तक तुम ग़रीब भी नहीं हो सकते। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होते तब पैसा इकट्ठा होता है ।

२१. धन्यता – जो धन्य हो गया है। जिसे वास्तविक धन प्राप्त हो गया है।
मन का आत्मा से एक हो जाना – यही धन्यता है ।

१. यह मत पूछो कि गुस्सा आने पर क्या करें। पूछो कि जीवन कैसा हो जिसमें कुंठा और क्रोध के बीज ही न हों।

२. जीवन के जिन पहलुओं को देखने का आपका मन नहीं करता हो, उधर ही देखिये। वहीँ देखना समाधान है।

३. बौद्धिक उछाल से उठते काल्पनिक प्रश्न न दागें। सवाल वो पूछिये जो व्यक्तिगत हो, क्योंकि अहंकार व्यक्तिगत होता है। आप स्वयं से ही तो त्रस्त हैं। अपने को न छुपाएँ – अपने सवाल में अपने मन और जीवन को सामने लाएँ।

४. याद करने का सही समय क्या है? याद करने का सही समय है जब याद न आ रही हो।

५. जो बोया है सो काटोगे। छोटे से छोटे बीज का भी फल ढ़ोना पड़ेगा। बच नहीं सकते।

६. सपना जितना सुन्दर होता है, उतना उससे उठना मुश्किल।

७. आत्मबल इच्छाशक्ति नहीं है।

इच्छा नहीं होती आत्मबल में। जब तक इच्छा का ज़ोर लगाओगे, तब तक आत्मबल की असीम ताक़त को नहीं पाओगे।
इच्छाशक्ति है मन की अकड़, आत्मबल है मन का समर्पण। जब व्यक्तिगत इच्छा को ऊर्जा देना छोड़ते हो तब समष्टि का बल तुम्हारे माध्यम से प्रवाहित होता है-  वह आत्मबल है।

८. हम बारिश को रिझाने के लिए श्रृंगार करते है। ज़िन्दगी बारिश है- वो धो देती है।

९. आध्यात्मिकता क्या है? आध्यात्म का अर्थ है अपने आप को जानना। पूरा जानना।

जो ज़रा भी जानने को उत्सुक है, वो आध्यात्मिक है। बस ज़रा सा आध्यात्मिक है।

१०. अहम् भाव जब प्रकृति से जुड़ जाता है तो शरीर कहलाता है।

११. तुम्हारे लिये जो भी उपयोगी है वो तुम्हारे उपयोग का नहीं है।

१२. यह बात कि संतो को माया से कोई मतलब नहीं, यह बात बहुत मायावी है। संत तुम्हारी किसी छवि जैसा नहीं होता! वह माया से खेलता है, माया उसकी बांदी है।

१३. खेल तो चलता रहेगा – सवाल यही है कि जीवन तुमसे खेल रहा है या तुम जीवन से?

१४. समर्पण कैसे?

– समर्पण है किसी चीज़ की मूल्यहीनता को जान लेना। समर्पण ऐसे जैसे पेड़ से पत्तों का गिरना, या हाथ से जलता हुआ कोयला छोड़ देना ।

– पकड़ने के लाखों तरीके हैं पर छोड़ने का एक ही तरीका है। बस छोड़ दो ।

– जब हम पूछते हैं, ‘समर्पण किसको?’ तो हम अपने अहंकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, उसका पता-ठिकाना याद रखना चाहते हैं, ताकि एक दिन उसे वापस ले सकें। समर्पण किसी को नहीं किया जाता। बस समर्पण किया जाता है।

– समर्पण तुम्हें करना है। गुरु मात्र एक विधि है, जिसके सामने तुम अपनी बीमारियाँ रख सको – समर्पित कर सको। तुम बीमारी से मुक्त हो जाओ और गुरु बीमारी से अप्रभावित रह जाए।

१. भूल का कोई सुधार नहीं होता। कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे। आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है।

भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।

२. शुद्धतम रूप से गुरु बोध मात्र है। आत्मज्ञान, आत्मविचार ही आत्मबोध बन सकता है। आत्मविचार में जब तुम अपने आप को देखते हो, तभी संभव होता है गुरु का तुम्हारे लिए कुछ कर पाना। जो स्वयं को देखने को राज़ी नहीं, गुरु उसके लिए कुछ नहीं कर पायेगा।

गुरु ही प्रेरणा देता है आत्मविचार की, और आत्मविचार का आखिरी फल होता है आत्मबोध – यानि गुरु की प्राप्ति। गुरु से ही आदि, गुरु पर ही अंत; गुरु ही है आत्मा अनंत।

३. जो संसार में गुरु ढूंढता है उसे ढूंढ ढूंढ के भी कुछ नहीं मिलेगा। वो संसार में ढूंढेगा, और संसार में ही भटकेगा। बिरला ही होता है जो संसार को छोड़ अपने आप को देखता है, – ऐसे सुपात्र को गुरु स्वयं ही पास बुला लेता है।

स्वयं को जिसने भी ईमानदारी से देखा है, उसने अपनी क्षुद्रता और अक्षमता को ही देखा है। जब तुम स्वीकार कर लेते हो कि तुमसे नहीं होगा, तब तुम विराट को मौका देते हो तुम्हारे लिए कुछ कर पाने का।

समर्पण का अर्थ होता है अपने कर्ताभाव का समर्पण, इस भावना का समर्पण कि तुम अपना हित ख़ुद कर लोगे।

४. जगत का विचार, इधर-उधर की सूचनाएं और प्रचार, मैं, मेरा, और अहम् का विस्तार – ये  सब कुविचार हैं। एक मात्र सुविचार यही है कि ‘इतना उत्पात करने वाला मैं हूँ कौन?’ – कोहम्। और तुम्हारे लिए कोहम् प्रश्न का उत्तर आत्मा नहीं हो सकता। तुम पूछो कोहम्, तो उचित उत्तर है – मूढ़ता।

तुम तो बस ईमानदारी से अपने मन और जीवन पर निगाह डालो। आत्मा की बात मत करो, उसे तुम नहीं खोज सकते; अगर निश्छल हो तो आत्मा स्वयं प्रकट हो जायेगी।

आत्मविचार वो जो बाकी सब विचारों को मिटा कर अंततः स्वयं भी मिट जाए। जादू है ।

५. जो शब्द मौन से उठे वो संगीत है। जो गीत मौन से न उठे वो गीत नहीं विकृति है।

जब तुम गाते हो तो सिर्फ़ कर्कशता होती है; जब तुम चुप हो जाते हो तो मौन गाता है, उसमें मधुरता होती है।

सुनो, मौन को गाने दो।

६. तुम बार-बार आनंद की ही तलाश करते हो क्योंकि तुम्हारे मर्मस्थल में याद बसी है उसकी। जैसे कोई बचपन में ही घर से बिछुड़ गया हो, और उसे घर की, माँ की, धुंधली-सी स्मृति बुलाती हो। आनंद की तलाश तुम्हें इसलिए है क्योंकि आनंद तुम्हारा घर है, स्वभाव है। उसके बिना चैन कैसे पाओगे तुम? पैसा, इज्ज़त, उपलब्धियाँ – इनके साथ भी विकलता बनी ही रहेगी।

माँ का विकल्प खिलौने नहीं हो सकते।

७. विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते। बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें।

यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान। और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।१. दुनिया पैसे की अंधी दौड़ है। उसकी वजह ज़रूरतें नहीं हैं, बल्कि यह क़ि जो मैं खरीदना चाहता हूँ वह पैसे से मिलता नहीं, पर मुझे लगता है कि शायद और पैसा कमाने से ख़रीदा जा सके। ध्यान से देखो तुम्हें वास्तव में किसकी चाहत है, और क्या उसे पैसे से खरीदा जा सकता है।

२. सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही न करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।

३. जो बीमार है वही स्वस्थ होने की इच्छा करता है। जैसे-जैसे आप स्वस्थ होते जाते हैं, वैसे-वैसे आपकी ये इच्छा क्षीण होती जाती है। स्वस्थ इंसान स्वास्थ्य की कामना नहीं करता।

४. जहाँ ध्यान नहीं, वहीं माया है। ध्यान के अभाव में लीला ही माया बन जाती है।

५. बोध होने में है, ज्ञान में नहीं। जानने और न जानने के पार जो है, वह बोध है। बोध एक शक्ति है, जागृति है।

६. जो इन्द्रियों को रुचे और अहम् को ऊर्जा दे वही मन को पसंद आता है। सामान्यतः जो भी मन को अस्वीकार हो वो मन के लिए दवा साबित हो सकता है।

७. जब आत्मा का नूर चहरे पर चमकता है, तब उसे सुंदरता कहते हैं। वही है वास्तविक सौंदर्य – सत्यं शिवं सुन्दरम्।

८. मन को तुम चाहे जितना अँधेरे से भर लो, हृदय में तो प्रकाश ही है। तुम जितना भी भागोगे, ‘उससे’ कैसे बचोगे। अपने आप से दूरी बना कर कौन जी सकता है? तुम जिससे से भाग रहे हो, वही भागने की ऊर्जा देता है।

९. निकटता का अर्थ है एक ऐसा जीवन जिसमें निकटता संभव है। निकटता का अर्थ है पहचानों का मिटना, जैसे पानी का पानी से मिलना, जैसे बूंदों का अनंत सागर से एक होना। हम एक के नहीं, इसीलिए हम किसी के भी करीब नहीं जा पाते हैं।

१०. कर्तव्य जब समझ से प्रस्फुटित होता है, तो धर्म कहलाता है।

११. सत्य को ‘तुम’ नहीं समझ सकते हो। सत्य ही सत्य को समझ सकता है।

१२. जो एक कदम भी नहीं बढ़ा सकता, वो सौ मील का सफ़र कैसे तय करेगा? जो एक-एक कदम बढ़ाते हैं, उन्हें पता भी नहीं लगता कि वो कब चाँद तक पहुंच गए ।

१३. संसार कितना भी हावी हो जाए, तुम उससे बचने की ताकत मांगो, ‘वो’ देगा।

१४. अहंकार को कभी आश्वस्ति नहीं होती और अहंकार से ज़्यादा कोई आश्वस्त होना नहीं चाहता।

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