नि:स्वार्थ प्रेम
एक बार एक ग्वालन दूध बेच रहीं थी और सबको दूध नाप - नाप कर दे रहीं. उसी समय एक नौजवान दूध लेने आया तो ग्वालन ने बीना नापे ही उस नौजवान का बरतन दूध से भर दिया. वहीं थोड़ी दूर पर एक साधु हाथ में माला
लेकर मनके गिन-गिन कर माला फेर रहा था.
तभी उसकी नज़र ग्वालन पर पड़ीं और उसने ये सब देखा और पास ही बैठे व्यक्ति को सारी बात बताकर इसका कारण पूछा ....!?
उस व्यक्ति नें बताया कि जिस नौजवान को उस ग्वालन बिना नाप के दूध दिया हैं....., वह उस नौजवान से *प्रेम करतीं हैं। ईसलिए उसने उसे बिना नाप के दूध दे दिया .
तभी उसकी नज़र ग्वालन पर पड़ीं और उसने ये सब देखा और पास ही बैठे व्यक्ति को सारी बात बताकर इसका कारण पूछा ....!?
उस व्यक्ति नें बताया कि जिस नौजवान को उस ग्वालन बिना नाप के दूध दिया हैं....., वह उस नौजवान से *प्रेम करतीं हैं। ईसलिए उसने उसे बिना नाप के दूध दे दिया .
मुझसे तो अच्छी़ वो ग्वालन ही हैं . और उसने वो माला
जीवन भी ऐसा ही हैं. जहाँ *प्रेम होतां हैं वहाँ हिसाब - किताब नहीं होता हैं .., और जहाँ हिसाब - किताब होता हैं, वहाँ *प्रेम नहीं होता, सिर्फ व्यापार होता हैं .
अतः प्रेम भले ही वो पत्नी से हो, भाई से हो, बहन से हो, पड़ोसी से हो, रिश्तेदार से हो, दोस्त से हो या भगवान से......!
अतः प्रेम भले ही वो पत्नी से हो, भाई से हो, बहन से हो, पड़ोसी से हो, रिश्तेदार से हो, दोस्त से हो या भगवान से......!
*नि: स्वार्थ* प्रेम कीजिए जहाँ कोई गिनती न हो, बस प्रेम हो!

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