धोखे बाजी
धोखे बाजी में फंसे सभी लोग चकराव।
एक गधे की औरत पर दाढ़ी मूंछ मुडाय॥
एक शहर में एक चतुर धोबी रहता था। वह कपड़े साफ करने में बढ़ा चतुर था, इसलिए शहर के अधिक निवासी उससे ही अपने कपड़े धुलवाने लगे। कपड़ों को मात्रा अधिक बढ़ जाने के कारण उन्हें लाने ले जाने के लिए उसने एक गधा खरीद लिया। जब वह कपड़े पछाड़ने के लिए आंछी-आंछी करता था तब वह गधा भी बोलने लगता था। यह देखकर धोबी ने सोचा कि यह क्यों बोलता है। अन्त में उसने मन में स्थिर किया कि यह गाता है। गाने की वजह से उसने गधे का नाम गन्धर्वसेन रखा ।
कुछ समय व्यतीत हो जाने पर धोबी एक दिन बाजार गया । वह किसी दुकान पर सामान खरीद रहा था। चौधरी धोबी से बोला -क्यों रे धोबी! पहले तो तीसरे दिन कपड़े दे दिया करता था, परन्तु अब की बार आज अठारह दिन हो गये परन्तु तू अभी तक हमारे कपड़े क्यों नहीं लाया? यह सुनकर धोबी रोने लगा और रोते-रोते बोला गन्धर्वसेन मर गये। चौधरी ने सोचा कि जैसे तानसेन बड़े गुणी थे, इसी प्रकार गन्धर्वसेन भी कोई बड़े गुणी महात्मा होंगे।
यह समझकर चौधरी ने पूछा कि महात्मा गन्धर्वसेन! धोबी महात्मा का अर्थ न समझ सका, इसलिए उसने कह दिया-जी हाँ! चौधरी बोला -बड़ा बुरा हुआ! संसार का एक महात्मा चल बसा । चौधरी ने इस गम में अपना मुण्डन करवा लिया। चौधरी के सिर को देखकर बाजार में खलबली मच गई कि चौधरी के यहाँ आज किसी की मूत्यु हो गई है। दस बारह आदमी इकट्ठे होकर चौधरी के पास गये और पूछा क्या बात है? उन्हें देखकर चौधरी को बड़ा गुस्सा आया और बोला- आज संसार का एक सबसे बड़ा महात्मा गन्धर्वसेन की मृत्यु हो गई और तुमसे इतना भी न हुआ कि उसका रंज भी मना लें। चौधरी की यह बात सुनकर और लोगों ने भी अपना सिर का मुण्डन करा डाला।
सांय काल को उस राजधानी के दीवान हाथी पर बैठकर सैर करने को निकले। बाजार में सभी के मुंडे हुए सिरों को देखकर आश्चर्य करने लगे। दीवान साहब ने चौधरी से , पूछा कि आज क्या बात है? चौधरी बोला- दीवान साहब आज संसार का सवोपरि पूज्य महात्मा चल बसे। सारा शहर उनका रंज मना रहा है। दीवान बोले कि फिर तो हमें भी रंज मनाना चाहिए। घर पहुँचकर दीवान साहब ने भी नाई को बुलाकर सिर मुंडवा लिया। कार्य वश दीवान साहब को राजा के पास जाना पड़ा। दीवान के मुँडे हुए सिर को देखकर राजा बोले -यह क्या है? दीवान ने राजा साहब को बताया हुजूर आज संसार का प्रथम श्रेणी का विद्वान महात्मा का स्वर्गवास हो गया है। सारे संसार ने सिर मुंडवा कर शोक मनाया है। राजा ने भी यह सुनकर अपना सिर मुँडवा लिया। रात्री में जब राजा महल में गये तो रानी ने उन्हें सिर मुंडा देखकर पूछा क्या बात है? किसका मातम मना रहे हैं?
राजा ने कहा कि आज संसार के उच्च श्रेणी के महात्मा को बैकुण्ड वास हो गया है, समस्त संसार ने उनका मातम
मनाया है, इसलिए हमें भी मातम मनाना पड़ा। रानी कहने लगी कि आपने इसी बात की खबर हमें नहीं दी। हम भी स्त्रियों के व्यवहारानुकूल शोक मनाती । आप अब यह बताइये कि महात्मा तुम्हारे बाप लगते थे जो तुमने मुंडन संस्कार करा लिया। ये कौन थे? राजा ने बताया हमें यह तो पता नहीं है कि वह कौन थे? राजा भोजन करके बाहर आये और चोबदार से दीवान को बुलवाया। दीवान ने भी पूछने पर बताया कि स्वामी यह तो मुझे भी मालूम नहीं कि वे कौन थे? इस सबका हाल चौधरी साहब को पता है। राजा ने चोबदार द्वारा चौधरी को बुलवाया और पूछा यह महात्मा गन्धर्वसेन कौन थे?
चौधरी बोला कि सरकार इसका मुझे पता नहीं है। इसका हाल तो बुद्धु धोबी जानता है। अब बुद्धु धोबी को बुलवाया गया। उससे पूछा -महात्मा गन्धर्वसेन कौन थे? यह सुनकर धोबी रोने लगा। वह रोता-रोता बोला स्वामी उसके मरने से कपड़े धोते-धोते मेरी कमर छिल गई। गन्धर्वसेन मेरे गधे का नाम था ।यह सुनते ही सन्नाटा छा गया।
दीवान बोले गजब हो गया कुछ भी विचार न किया। गधे के मरने पर मुडन संस्कार करवा लिया। सब पछताने लगे पर पछताये क्या होता है।
सांसारिक घटनाओं में धोखा खाने पर व्यक्ति मूर्ख बनता और उसको पछताना पड़ता है। परन्तु जब धर्म के सम्बन्ध हें मनुष्य धोखा खाता है तो वह दीन दुनिया में कहीं का भी नहीं रहता। श्रोताओं ! इस अनायास विपत्ति से बचो। विद्या बुद्धि के द्वारा सच्चे ज्ञान की उपलब्धि प्राप्त कर उसके चरणों में जा पड़ो, मनुष्य शरीर मिलने का यही फल है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें