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आत्मा पर मन लगाइए और जीवित रहिए!-Keep your mind on the soul and stay alive!

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आत्मा पर मन लगाइए और जीवित रहिए!
आत्मा पर मन लगाना जीवन है।

1, 2. बाइबल किस तरह “शरीर” और “आत्मा” के बीच का अंतर साफ बताती है?

आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब समाज का पूरी तरह पतन हो चुका है और हर कहीं शरीर की लालसाओं को पूरा करने पर ज़ोर दिया जाता है। ऐसे में परमेश्वर की नज़रों में चालचलन शुद्ध बनाए रखना हमारे लिए इतना आसान नहीं है। लेकिन बाइबल हमें “शरीर” और “आत्मा” के बीच का अंतर बताते हुए साफ चेतावनी देती है कि पापी शरीर की अभिलाषाओं के आगे झुक जाने का परिणाम बहुत भयानक होता है मगर परमेश्वर की पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर चलने से आशीषें मिलती है।
परमात्मा आत्मा और मन क्या है : What is god, soul and mind - New Feature Blog
Keep your mind on the soul and stay alive! 

2 उदाहरण के लिए, यीशु मसीह ने कहा था: “आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कही हैं वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं।” (यूहन्ना 6:63) और गलतिया में रहनेवाले मसीहियों को प्रेरित पौलुस ने लिखा: “शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं।” (गलतियों 5:17) पौलुस ने यह भी कहा: “जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।”—गलतियों 6:8.
3. बुरी इच्छाओं और प्रवृत्तियों के शिकंजे से छूटने के लिए क्या करना ज़रूरी है?

3 परमेश्वर की पवित्र आत्मा यानी उसकी सक्रिय शक्ति, “शारीरिक वासनाओं” को जड़ से उखाड़ फेंक सकती है और पापपूर्ण शरीर को हम पर हक जमाने से रोक सकती है ताकि हम विनाश से बच सकें। (1 पतरस 2:11, NHT) अपनी बुरी प्रवृत्तियों के शिकंजे से छूटने के लिए ज़रूरी है कि हम परमेश्वर की आत्मा से मदद लें क्योंकि जैसा पौलुस ने लिखा: “शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।” (रोमियों 8:6) लेकिन आत्मा पर मन लगाने का मतलब क्या है?

“आत्मा पर मन लगाना”
4. ‘आत्मा पर मन लगाने’ का मतलब क्या है?

4 ‘आत्मा पर मन लगाने’ का ज़िक्र करते हुए पौलुस ने जिस यूनानी शब्द का इस्तेमाल किया, वह “सोचने का तरीका, मन लगाना, . . . लक्ष्य, आकांक्षा या संघर्ष” को सूचित करता है। इसी से संबंधित एक क्रिया का मतलब है, “किसी खास तरीके से सोचना या मन लगाना।” तो आत्मा पर मन लगाने का मतलब है, यहोवा की सक्रिय शक्ति के काबू में रहना, उसके अधीन रहना और उससे प्रेरित होना। इससे यही सूचित होता है कि हम अपने सोच-विचार, अपनी प्रवृत्तियाँ और अपनी आकांक्षाएँ परमेश्वर की पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के मुताबिक ढालने के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

5. हमें किस हद तक पवित्र आत्मा के अधीन रहना चाहिए?

5 हमें किस हद तक पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन रहना चाहिए, इस बारे में ज़ोर देते हुए पौलुस ने बताया कि हमें ‘आत्मा के सेवक’ बन जाना चाहिए। (रोमियों 7:6) यीशु के छुड़ौती बलिदान में विश्वास करने से मसीहियों को पाप के दासत्व से छुटकारा मिल गया है यानी वे पाप के दासों के तौर पर ‘मर चुके।’ (रोमियों 6:2,11) इस तरह वे लाक्षणिक रूप से मर चुके हैं मगर शारीरिक तौर पर ज़िंदा हैं। अब वे ‘धार्मिकता के दासों’ के नाते स्वतंत्र होकर मसीह का अनुकरण करते हैं।—रोमियों 6:18-20.
एक ज़बरदस्त बदलाव

6. “धर्म के दास” बननेवाले किस तरह का बदलाव करते हैं?

6 जो लोग पहले पाप के दास थे, वे ‘धार्मिकता के दास’ बनकर परमेश्वर की सेवा करने के लिए जो बदलाव करते हैं, वह सचमुच ज़बरदस्त और गौरतलब होता है। ऐसे बदलाव कर चुके कुछ लोगों के बारे में पौलुस ने लिखा: “तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।”—रोमियों 6:17,18; 1 कुरिन्थियों 6:11.

7. हमें यहोवा का नज़रिया अपनाना क्यों ज़रूरी है?

7 लेकिन अपने अंदर ऐसे ज़बरदस्त बदलाव लाने के लिए सबसे पहले हमें यहोवा के नज़रिए के बारे में सीखना ज़रूरी है। सदियों पहले, भजनहार दाऊद ने परमेश्वर से तहेदिल से यह बिनती की: “हे यहोवा अपने मार्ग मुझ को दिखला . . . मुझे अपने सत्य पर चला और शिक्षा दे।” (भजन 25:4,5) यहोवा ने दाऊद की प्रार्थना सुनी थी और आज भी अगर उसके सेवक ऐसी प्रार्थना करें, तो वह उनकी भी ज़रूर सुनेगा। परमेश्वर के मार्ग और उसकी सच्चाई के वचन बिलकुल शुद्ध और पवित्र हैं इसलिए अगर हम उन पर मनन करें तो हम शरीर की बुरी इच्छाओं को पूरा करने के प्रलोभन को ठुकरा सकेंगे।
परमेश्वर के वचन की अहमियत

8. बाइबल का अध्ययन करना इतना आवश्यक क्यों है?

8 परमेश्वर का वचन, बाइबल उसकी आत्मा की प्रेरणा से लिखी गई थी। अगर हम चाहते हैं कि परमेश्वर की आत्मा हम पर काम करे, तो एक ज़रूरी कदम है, बाइबल को पढ़ना और उसका अध्ययन करना, हो सके तो हर रोज़। (1 कुरिन्थियों 2:10,11; इफिसियों 5:18) ऐसा करने पर हमारे दिलो-दिमाग, बाइबल में लिखी सच्चाइयों और सिद्धांतों से भर जाएँगे और इससे हमें अपनी आध्यात्मिकता पर होनेवाले हर हमले का सामना करने की ताकत मिलेगी। जी हाँ, जब हम पर अनैतिक काम करने का प्रलोभन आता है तब परमेश्वर की आत्मा हमें बाइबल की ऐसी चितौनियाँ और सिद्धांत याद दिला सकती है, जिनसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार काम करने का हमारा इरादा मज़बूत हो सकता है। (भजन 119:1,2,99; यूहन्ना 14:26) तब हम गलत मार्ग की ओर नहीं बहकेंगे।—2 कुरिन्थियों 11:3.

9. किस तरह बाइबल का अध्ययन करने से यहोवा के साथ अपने रिश्ते को बरकरार रखने का हमारा इरादा मज़बूत रहता है?

9 अगर हम बाइबल पर आधारित किताबों की मदद से बाइबल का गहरा अध्ययन करते रहेंगे, तो परमेश्वर की आत्मा हमारे दिलो-दिमाग पर असर करेगी। इससे यहोवा के स्तरों के लिए हमारा आदर और भी बढ़ेगा। तब परमेश्वर के साथ एक अच्छा रिश्ता बनाए रखना हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाएगा। और गलत काम करने का प्रलोभन आने पर हम कभी नहीं सोचेंगे कि इसमें कितना मज़ा आएगा। इसके बजाय, हमें सबसे ज़्यादा इस बात की फिक्र होगी कि किसी भी हाल में मुझे यहोवा का वफादार बने रहना है। परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते को अगर हम दिल में संजोए रखते हैं, तो हम ऐसी हर प्रवृत्ति पर काबू पाने की कोशिश करेंगे जो उसके साथ हमारे रिश्ते को बिगाड़ सकती है या तोड़ सकती है।
“अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं!”

10. आत्मा पर मन लगाने के लिए हमें यहोवा के नियमों को मानना क्यों ज़रूरी है?

10 लेकिन आत्मा पर मन लगाने के लिए सिर्फ परमेश्वर के वचन का ज्ञान होना काफी नहीं है। राजा सुलैमान के पास यहोवा के स्तरों की अच्छी समझ थी, फिर भी वह अपने जीवन के आखिरी सालों में उन स्तरों के मुताबिक जीने में असफल रहा। (1 राजा 4:29,30; 11:1-6) अगर हम आध्यात्मिक बातों पर मन लगानेवाले हैं, तो हम समझ सकते हैं कि केवल बाइबल की जानकारी रखना काफी नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ परमेश्वर के नियमों को खुशी-खुशी मानकर चलना भी ज़रूरी है। ऐसा करने के लिए चाहिए कि हम यहोवा के स्तरों का बहुत ध्यान से अध्ययन करें और उनका पालन करने के लिए कड़ा यत्न करें। भजनहार ने ऐसा ही किया था। उसने एक भजन में गाया: “अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है।” (भजन 119:97) अगर हमें परमेश्वर के नियमों पर चलने का सचमुच ध्यान रहता है, तो हम परमेश्वर के गुण दिखाने के लिए प्रेरित होंगे। (इफिसियों 5:1,2) पाप करने का प्रलोभन आने पर हम लाचार होकर उसकी तरफ खिंचे चले जाने के बजाय, आत्मा के फल दिखाएँगे। हम यहोवा को नाराज़ नहीं करना चाहेंगे इसलिए हम ‘शरीर के कामों’ से बिलकुल दूर रहेंगे।—गलतियों 5:16,19-23; भजन 15:1,2.

11. आप किस तरह समझाएँगे कि व्यभिचार से दूर रहने के बारे में यहोवा का नियम हमारी सुरक्षा के लिए है?

11 यहोवा के नियमों के लिए हम अपने दिल में गहरा आदर और प्यार कैसे बढ़ा सकते हैं? एक तरीका है, इस बात पर अच्छी तरह विचार करना कि यहोवा के नियमों को मानने के फायदे क्या-क्या हैं। मिसाल के तौर पर, यहोवा ने यह नियम दिया है कि लैंगिक संबंध सिर्फ पति-पत्नी के बीच होने चाहिए और परगमन और व्यभिचार से दूर रहना चाहिए। (इब्रानियों 13:4) क्या इस नियम को मानने से हम खुशी से वंचित रह जाते हैं? स्वर्ग में रहनेवाला हमारा पिता, जो हमसे बेहद प्यार करता है, क्या वह ऐसा कोई भी नियम बनाएगा जिससे हमारी खुशियाँ छिन जाएँ। नहीं, हरगिज़ नहीं। ज़रा देखिए कि यहोवा के नैतिक आदर्शों के खिलाफ जीनेवालों की कैसी हालत होती है। कुछ लोगों को नाजायज़ संबंधों से जब गर्भधारण हो जाता है, तो गर्भपात करवाने की नौबत आती है या कच्ची उम्र में ही शादी करनी पड़ती है और फिर शादी-शुदा ज़िंदगी दुःखों से भरी रहती है। कई लोगों को जीवन-साथी के बगैर ही अपने बच्चे को पालना पड़ता है। इतना ही नहीं, जो व्यभिचार करने में लगे रहते हैं, वे यौन-संबंधी बीमारियों के भी शिकार हो जाते हैं। (1 कुरिन्थियों 6:18) और अगर यहोवा का कोई सेवक व्यभिचार करे, तो उसकी भावनाओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। उसका विवेक उसे बार-बार अपनी गलती का एहसास दिलाते हुए कचोटता रहेगा। अपने विवेक की आवाज़ दबाने की कोशिश में उसकी रातों की नींद उड़ सकती है और गहरी मानसिक पीड़ा हो सकती है। (भजन 32:3,4; 51:3) तो व्यभिचार से परे रहने के लिए यहोवा ने जो नियम दिया है, क्या वह हमारी सुरक्षा के लिए नहीं है? जी हाँ, नैतिक शुद्धता बनाए रखने से सचमुच हमें बहुत सारे फायदे होते हैं!
यहोवा से मदद के लिए प्रार्थना कीजिए

12, 13. जब हम पापी इच्छाओं से पूरी तरह घिरे हुए होते हैं, तब प्रार्थना करना क्यों उचित होगा?

12 आत्मा पर मन लगाने के लिए सच्चे दिल से प्रार्थना करना बेहद ज़रूरी है। परमेश्वर की आत्मा की मदद के लिए बिनती करना उचित है क्योंकि यीशु ने कहा था: “जब तुम . . . अपने लड़केबालों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा।” (लूका 11:13) प्रार्थना में हम यहोवा को बता सकते हैं कि अपनी कमज़ोरियों पर जीत पाने के लिए हम उसकी आत्मा की मदद पर ही निर्भर हैं। (रोमियों 8:26,27) अगर हमें लगता है कि पापपूर्ण इच्छाएँ या मनोवृत्तियाँ हम पर हावी हो रही हैं या अगर कोई भाई या बहन उन्हें हमारे ध्यान में लाता है, तो अपनी प्रार्थनाओं में उस समस्या का खास ज़िक्र करना और उस पर काबू पाने के लिए परमेश्वर से मदद माँगना अक्लमंदी होगी।

13 यहोवा हमें उचित, पवित्र, सद्‌गुण और प्रशंसा की बातों पर मन लगाने में ज़रूर मदद कर सकता है। और यह 
कितना सही होगा कि हम पूरे उत्साह के साथ उससे बिनती करें, ताकि “परमेश्वर की शान्ति” हमारे हृदय और विचारों को सुरक्षित रख सके। (फिलिप्पियों 4:6-8) तो आइए हम यहोवा से प्रार्थना करें कि वह हमें ‘धार्मिकता, भक्तिपूर्ण सेवा, विश्वास, प्रेम, धैर्य और सज्जनता में लगे रहने’ के लिए सहायता करे। (1 तीमुथियुस 6:11-14, ईज़ी-टू-रीड वर्शन) जब स्वर्ग में रहनेवाला पिता हमारी मदद करेगा तो हमारी चिंताएँ और प्रलोभन हम पर इस कदर हावी नहीं होंगे कि उन पर काबू पाना मुश्किल हो जाए। इसके बजाय हमारी ज़िंदगी में परमेश्वर की ओर से मिलनेवाली शान्ति होगी।

आत्मा को शोकित मत कीजिए
14. परमेश्वर की आत्मा शुद्धता बनाए रखने की प्रबल इच्छा क्यों पैदा करती है?

14 यहोवा का हर प्रौढ़ सेवक पौलुस की इस सलाह को अपनी ज़िंदगी में अमल करता है: “पवित्र आत्मा की आग न बुझाओ।” (1 थिस्सलुनीकियों 5:19, नयी हिन्दी बाइबिल) परमेश्वर की आत्मा “पवित्रता की आत्मा” है इसलिए यह पूरी तरह शुद्ध, निष्कलंक और पवित्र है। (रोमियों 1:4) जब यह आत्मा हम पर काम करती है तो यह हमारे अंदर पवित्र या शुद्ध रहने की प्रबल इच्छा पैदा करती है। और परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते हुए पवित्रता के मार्ग पर बने रहने में हमारी मदद करती है। (1 पतरस 1:2) लेकिन अगर हमारे अंदर कोई बुरी आदत होगी तो इससे यही ज़ाहिर होगा कि हम उस आत्मा को नकार रहे हैं और इसका परिणाम बहुत भयानक हो सकता है। वह कैसे?

15, 16. (क) हम किस तरह परमेश्वर की आत्मा को शोकित कर सकते हैं? (ख) हम यहोवा की आत्मा को शोकित करने से कैसे दूर रह सकते हैं?

15 इसे समझने के लिए पौलुस की इस बात पर गौर कीजिए: “परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिस से तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है।” (इफिसियों 4:30) बाइबल बताती है कि यहोवा की आत्मा वफादार अभिषिक्त मसीहियों के लिए एक छाप की तरह है, यानी उन्हें ‘जो देने का वचन किया गया है, उसके लिए बयाने की तरह है।’ उन्हें जो देने का वचन दिया गया है, वह है स्वर्ग में अमर जीवन। (2 कुरिन्थियों 1:22, ईज़ी-टू-रीड वर्शन; 1 कुरिन्थियों 15:50-57; प्रकाशितवाक्य 2:10) परमेश्वर की आत्मा अभिषिक्त जनों और पृथ्वी पर जीने की आशा रखनेवाले उनके साथियों को जीवन भर वफादार रहने और पापमय कार्यों से दूर रहने में मदद कर सकती है।

16 प्रेरित पौलुस ने हमें ऐसी प्रवृत्तियों से दूर रहने की चेतावनी दी जिनकी वजह से हम झूठ बोलने, चोरी करने और बदचलनी जैसे पाप कर सकते हैं। ऐसी बुराइयों की तरफ बहकने का मतलब होगा कि हम बाइबल की सलाह के खिलाफ जा रहे हैं जो परमेश्वर की आत्मा से लिखी गई है। (इफिसियों 4:17-29; 5:1-5) इस तरह कुछ हद तक हम परमेश्वर की आत्मा को शोकित कर रहे होंगे और बेशक हम में से कोई भी यह गलती नहीं करना चाहेगा। अगर हम यहोवा के वचन की सलाह को अनसुना करने लगे हैं, तो धीरे-धीरे हमारे अंदर ऐसा रवैया पैदा हो सकता है जिसकी वजह से हम बाद में जान-बूझकर पाप करने लगेंगे और परमेश्वर की आशीष पूरी तरह खो बैठेंगे। (इब्रानियों 6:4-6) शायद अभी हम कोई पाप न करते हों, मगर हो सकता है कि हम पाप के रास्ते पर निकल पड़े हों। और जब आत्मा हमें ऐसे रास्ते से दूर रहने का निर्देशन देती है, तब उसे अगर हम लगातार ठुकराते रहेंगे, तो हम आत्मा को शोकित कर रहे होंगे। ऐसा करके हम पवित्र आत्मा के देनेवाले यहोवा को ठुकराकर उसे भी शोकित कर रहे होंगे। हम नहीं चाहते कि हमसे ऐसी गलती कभी हो क्योंकि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं। तो यह अच्छा होगा कि हम यहोवा से मदद के लिए प्रार्थना करें कि हम उसकी आत्मा को किसी भी तरह दुःख न पहुँचाएँ और हमेशा आत्मा पर मन लगाकर उसके पवित्र नाम की महिमा करते रहें।
आत्मा पर मन लगाना मत छोड़िए

17. हम कौन-से आध्यात्मिक लक्ष्य रख सकते हैं और उन्हें पाने के लिए मेहनत करना क्यों बुद्धिमानी होगी?

17 आत्मा पर मन लगाने का एक बहुत ही बढ़िया तरीका है, कुछ आध्यात्मिक लक्ष्य रखना और उन्हें पाने के लिए मेहनत करना। अपनी ज़रूरतों और हालात के मुताबिक हम अलग-अलग लक्ष्य रख सकते हैं, जैसे बाइबल का अध्ययन करने की आदतों में और सुधार लाना, प्रचार काम में ज़्यादा हिस्सा लेना, पायनियर सेवा, बेथेल सेवा या मिश्नरी काम जैसे पूर्ण समय की सेवा के लिए अपने अंदर काबीलियत बढ़ाना, वगैरह-वगैरह। ऐसे लक्ष्य रखने से हमारा मन हमेशा आध्यात्मिक बातों पर लगा रहेगा। हम मानवी कमज़ोरियों के शिकार होने से बचेंगे, और धन-दौलत कमाने की इच्छा या ऐसी दूसरी अभिलाषाओं की तरफ नहीं खिंचे जाएँगे जो बाइबल के खिलाफ हैं और इस बुरे संसार में बहुत आम हैं। आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने के लिए मेहनत करना सचमुच बुद्धिमानी की बात है क्योंकि यीशु ने आग्रह किया था: “अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्‌ठा न करो; जहां कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर सेंध लगाते और चुराते हैं। परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्‌ठा करो, जहां न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।”—मत्ती 6:19-21.

18. इन अंतिम दिनों में आत्मा पर मन लगाना क्यों इतना ज़रूरी है?

18 इन “अन्तिम दिनों में” आत्मा पर मन लगाना और सांसारिक अभिलाषाओं को काबू में रखना सचमुच बुद्धिमानी की बात है। (2 तीमुथियुस 3:1-5) क्योंकि “संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा।” (1 यूहन्ना 2:15-17) मिसाल के लिए, अगर एक मसीही जवान, पूरे समय की सेवा करता है तो यह सेवा उसके लिए एक दीपक की तरह मार्गदर्शक साबित होगी, जिससे वह किशोरावस्था या जवानी में आनेवाली चुनौतियों का सामना कर पाएगा। जब ऐसे जवान पर यहोवा के नियमों को तोड़ने का दबाव आएगा, तो वह उसके आगे झुकेगा नहीं क्योंकि उसे अपनी मंज़िल साफ नज़र आएगी कि यहोवा की सेवा में उसे क्या-क्या करना है। आध्यात्मिक बातों पर मन लगानेवाला ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक लक्ष्यों को त्यागकर धन-दौलत के पीछे भागना या पापी इच्छाओं को पूरा करना मूर्खता की बात समझेगा। मूसा को याद कीजिए जो हमेशा आध्यात्मिक बातों पर मन लगाता था। “उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और उत्तम लगा।” (इब्रानियों 11:24,25) हम चाहे जवान हों या बूढ़े, अगर हम पापी शरीर के बजाय आत्मा पर मन लगाएँगे, तो हम मूसा की तरह सही फैसला कर पाएँगे।

19. अगर हम आत्मा पर मन लगाते रहें तो हमें कौन-से फायदे होंगे?

19 “शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है” जबकि “आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है।” (रोमियों 8:6,7) अगर हम हमेशा आत्मा पर मन लगाएँगे, तो हमें ऐसी शांति मिलेगी जिसकी कीमत नहीं आँकी जा सकती। हमारे हृदय और मन सुरक्षित रहेंगे जिससे हमारे पापी स्वभाव का उन पर इतनी आसानी से असर नहीं होगा। गलत काम करने के प्रलोभन को ठुकराने का हमारा इरादा और भी मज़बूत होगा। साथ ही, शरीर और आत्मा के बीच हमेशा चलनेवाले इस युद्ध का सामना करने के लिए परमेश्वर से भी मदद मिलती रहेगी।

20. हम यह पूरे भरोसे के साथ क्यों कह सकते हैं कि शरीर और आत्मा की अपनी लड़ाई में जीत पाना मुमकिन है?

20 आत्मा पर हमेशा मन लगाने के ज़रिए हम जीवन और पवित्र आत्मा के देनेवाले, यहोवा के साथ एक संबंध बनाए रखेंगे जो कि बहुत महत्वपूर्ण है। (भजन 36:9; 51:11) आज यहोवा के साथ हमारे रिश्ते को तोड़ने के लिए शैतान और उसके साथी हर तरह का हथकंडा अपना रहे हैं। वे हमारे मनों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर हम हार मान लें, तो हम धीरे-धीरे परमेश्वर के शत्रु बन जाएँगे और सीधे मौत के मुँह में जा गिरेंगे। लेकिन शरीर और आत्मा के इस युद्ध में जीत पाना हर हाल में मुमकिन है। पौलुस ने भी जीत पाई थी। उसने अपने युद्ध के बारे में लिखते हुए सबसे पहले यह सवाल किया: “मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” फिर यह बताते हुए कि छुटकारा पाना मुमकिन है, उसने कहा: “मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं।” (रोमियों 7:21-25) हम भी मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद कर सकते हैं, जिसने मानवी कमज़ोरियों का सामना करने और हमेशा आत्मा पर मन लगाने के लिए मदद प्रदान की है ताकि हम अनंत जीवन की शानदार आशा पा सकें।—रोमियों 6:23.

क्या आपको याद है?
• आत्मा पर मन लगाने का मतलब क्या है?
• अगर हम चाहते हैं कि यहोवा की आत्मा हम पर काम करे, तो हमें क्या करना चाहिए?
• यह समझाइए कि पाप के खिलाफ अपनी लड़ाई में जीतने के लिए बाइबल का अध्ययन करना, यहोवा के नियमों को मानकर चलना और उससे प्रार्थना करना क्यों बहुत ज़रूरी है।
• आध्यात्मिक लक्ष्य रखने से किस तरह हमें जीवन के मार्ग पर बने रहने में मदद मिल सकती है?

बाइबल का अध्ययन करने से हमें अपनी आध्यात्मिकता पर होनेवाले हमलों का सामना करने की ताकत मिलती है

पापी इच्छाओं पर काबू पाने के लिए यहोवा से प्रार्थना के ज़रिए मदद माँगना उचित है

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