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| Kabir Ke Shabd |
कबीर के शब्द
कर्म भर्म ओर मां बड़ाई, या में नहीं भटकी।
नाम के चुके ठौर न पावै,जैसे कला नट की।।
जागत सोवत सोवत जागत,लाग रही चटसी।
चाहवै पपीहा स्वांति बून्द को,वह लगावै रटसी।।
चाहवै पपीहा स्वांति बून्द को,वह लगावै रटसी।।
भर्म की मटकी सिर के ऊपर, सो मटकी पटकी।
हम तो अपनी चाल चलत हैं, लोग कहें उल्टी।।
हम तो अपनी चाल चलत हैं, लोग कहें उल्टी।।
प्रीत पुरानी नई लागत है, या दिल में खटकी।
जैसे सरिता सिंध समावै, फेर नहीं पलटी।।
जैसे सरिता सिंध समावै, फेर नहीं पलटी।।
नाम ही नाम खोज हृदय में, सूझ पड़ै घट की।
कह कबीर सुनो भइ साधो, फेर नहीं भटकी।।
कह कबीर सुनो भइ साधो, फेर नहीं भटकी।।
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