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कबीर सोवनिया उठ जाग रे। 292

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    सोवनिया उठ जाग रे तेरी गांठ कटै सै।
    सो गया चादर ताण रे, तेरी उम्र घटै सै।।
साहूकार की बरते पूंजी, खुला पड़ा तेरा ताला कुंजी।
    चोर रहे तेरे लाग रे, तेरा माल लूटै सै।।
साहूकार का आवै हरकारा, मूल ब्याज देना हो सारा।
           डिग्री हो निरभाग रे, एक दिन रोज घटै सै।।
ये तन समझो पूर्ण खजाना, धर्म रीत का सीख निभाना।
           कटे चौरासी की लाग रे जब तनै खबर पटै सै।।
हरिदास की बुद्धि खोटी, कदे न लाई ज्ञान कसौटी।
           उठ सत्संग में लाग रे, उड़ै हरि प्रेम बंटे सै।।

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