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कबीर चरखा नहीं निगोड़ा। 308

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चरखा नहीं निगोड़ा चलता।
पाँच तत्व का बना है चरखा, तीन गुणों में गलता।।
    टूटी माल तीन भए टुकड़े, तक़वा हो गया टेढ़ा।
    माँजत-२ हार गई मैं, धागा नहीं निकलता।।
चतुर बढैईया दूर बसत है, किसके घर मैं जाऊं।
ठोकत-२ हार गई मैं, हब भी नहीं सम्भलता।।
    कह कबीर सुनो भई साधो, जले बिना नहीं छूटै।
    जलते वक़्त में सुआ गीता, धधक-२ के जलता।।

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