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कबीर प्रीत उसी से कीजिए। 370

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प्रीत उसी से कीजिये, जो ओड़ निभावै।
बिना प्रीत का मानवा, कहीं, ठौर न पावै।।
     नाम स्नेही जब मिले, तब ही सत्त पावै।
     अजर अमर घर ले चलो, भँव नहीं आवै।।
जो पानी दरयाव का दूजा न कहावै।
हिल मिल एकै हो रहा, सद्गुरु समझावै।।
     दास कबीर विचार कै कह कह समझावै।।

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