Kabir Ke Shabd
रै तनै बेरा कोन्या, बात बिगड़गी तेरी।।
नो दस मास गर्भ में झूला, मूत की नदियां बह रही
छोरा जाया द्रव लुटाया, बेटा बेटा कह रही।।
बालापन हंस खेल बिताया, निर्मल बुद्धि तेरी।
आई जवानी बढ़ी दीवानी, छाय गई अंधेरी।।
हरि ना ध्याया जन्म गंवाया, कर रहा मेरा मेरी।
जिनको आज तूँ प्यारा लागै, वे हैं पक्के वैरी।।
बूढा हुआ कफ वायु ने घेरा, घर में ममता गहरी।
हाथ पाँव चालन तैं रहगे, मन की मन मे रह रही।।
चुन चुन लकडी चिता बनाई, चोगिरदे दई घेरी।
किशनदास सद्गुरु समझावै, जल बुझ हो गई ढेरी।।

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