Kabir ke Shabd
अटल फकीरी धुन लाए, छोड़ दे लटक सारी।।
जमना नहाए हरि मिले तो, मैं गंगा नहावन जां।
मिंडक मछली जल में रहते,
उनको भी क्यूँ ना मिल जाए।।
लटा बढाए हरि मिले तो, मैं भी लऊँ बढाए।
लाम्बी लटा मोर की हो सै,
उनको भी क्यूँ न मिल जाए।।
मूँड़ मुंडाए हरि मिले तो मैं भी लऊँ मुंडाए।
छटे महीने भेड़ मूंडै सैं,
उनको भी क्यूँ न मिल जाए।।
पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पहाड़ पूजन जां
घर की चाकी पुजै क्यूँ ना,
जिसका तूँ पीसा खाए।।
माला फेरे हरि मिले तो, मैं फेरूं शहतीर।
मन का मनिया फेरै क्यूँ ना,
कह गए दास कबीर।।

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