Kabir ke Shabdमेरे पिया बिना दर्द कालजे होय।।दिन नहीं चैन, रैन नहीं निन्द्रा जी।नैन गंवाए रो रोय।।आधी सी रात का, पिछला पहरवा जी।तड़फ तड़फ गई सोय।।पांचों मार पचीसों वश कर जी।इन मे से कोय भी होय।।कह कबीर सुनो भई साधो जी।इन मे से कोय भी होय।।
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